जब-जब अमेरिका करता है हमला, रॉकेट बनते हैं तेल के दाम, वेनेजुएला के पास सबसे ज्यादा ऑयल रिजर्व, क्या दुनिया में बढ़ेगी महंगाई?
दुनिया के ऊर्जा बाजार में एक बार फिर बेचैनी दिख रही है. अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के बीच तेल की आपूर्ति, कीमतों और महंगाई को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं. निवेशकों से लेकर आम उपभोक्ता तक की नजरें अब कच्चे तेल से जुड़े वैश्विक संकेतों पर टिकी हैं.
अमेरिका और वेनेजुएला के बीच लंबे समय से सुलग रहा तनाव अब खुली सैन्य कार्रवाई में बदल गया है. अमेरिका ने वेनेजुएला की राजधानी काराकस में हमला किया है, जिसमें रक्षा मंत्री के घर और नौसैनिक अड्डों को निशाना बनाया गया है. इसी के साथ बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चलाते हुए राष्ट्रपति Nicolas Maduro और उनकी पत्नी को हिरासत में लेकर देश से बाहर भेज दिया है. इस कार्रवाई की जानकारी खुद अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर साझा की. ट्रंप ने साफ कहा है कि वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन तक अमेरिकी दबाव और कार्रवाई जारी रहेगी.
मादुरो पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि अमेरिका का असली मकसद वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर कब्जा जमाना है. वहीं अमेरिका के अधिकारी पलटवार करते हुए कहते हैं कि मादुरो का शासन देश के ड्रग तस्करी नेटवर्क का हिस्सा है और उनका हटना तेल आपूर्ति को लेकर अमेरिकी हितों के लिए जरूरी है. ऐसे में अब सवाल उठने लगे हैं कि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले वेनेजुएला पर इस हमले से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर क्या असर होगा? आइए समझते हैं वेनेजुएला के तेल कारोबार की पूरी तस्वीर और तेल बाजार पर इसके संभावित प्रभाव को.
तेल भंडार में शीर्ष, बावजूद उत्पादन में गिरावट
दुनिया के प्रमुख तेल भंडारों की सूची में वेनेजुएला शीर्ष पर है. इस देश के अनुमानित तेल भंडार लगभग 303 अरब बैरल हैं, जो विश्व में सर्वाधिक है. दूसरे स्थान पर सऊदी अरब (267 अरब बैरल) और ईरान (208 अरब बैरल) हैं.

वेनेजुएला के मुख्य तेल भंडार ओरिनोको नदी के पूर्वी इलाके में फैले हैं. देश के विशाल संसाधन के बावजूद उत्पादन लगातार गिरता आया है. 1970 और 1990 के दशक में यह देश प्रति दिन 250–300 हजार बैरल तक उत्पादन कर पाता था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में गलत प्रबंधन, राष्ट्रीयकरण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के चलते उत्पादन में भारी गिरावट आई है.
उदाहरण के लिए, 2023 में वेनेजुएला का कुल कच्चा तेल निर्यात मात्र $4.05 अरब रहा, जबकि उसी वर्ष सऊदी अरब ने $181 अरब और अमेरिका ने $125 अरब का तेल निर्यात किया.
देश की आर्थिक निर्भरता
तेल देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, यह वेनेजुएला का मुख्य निर्यात है और राष्ट्रीय आय का लगभग 12% कच्चे तेल से आता है. हालांकि विश्व ब्रेंट क्रूड 2025 में करीब 20% तक गिर चुका था, वेनेजुएला को तेल से होने वाली आमदनी पर बड़ा प्रहार लगा है. अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते चीन और अन्य देशों के साथ तेल व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, खबर है कि इन प्रतिबंधों से वेनेजुएला $4.9 अरब रेवेन्यू खो सकता है , यानी अपने जीडीपी का लगभग 10 फीसदी.
भारत, चीन और क्यूबा पहले वेनेजुएला के प्रमुख तेल खरीदार थे, लेकिन जून 2024 में भारत ने लगभग 22 मिलियन बैरल तेल आयात किया था, जो देश की कुल आयात मात्रा का महज 0.92% था. अब अमेरिका के दबाव के कारण भारत-वेनेजुएला तेल व्यापार लगभग बंद हो चुका है.
वैश्विक तेल बाजार पर प्रभाव
जब भी किसी बड़ी तेल उत्पादक देश में तनाव बढ़ता है, वैश्विक तेल आपूर्ति की अस्थिरता के डर से कीमतों पर असर पड़ता है हालांकि वर्तमान में वैश्विक तेल का आपूर्ति-स्तर भरपूर है, फिर भी जो जोखिम भाव (risk premium) बनता है, वह कीमतों को बढ़ा देता है. उदाहरण के लिए, पिछले कुछ महीनों में दुनिया भर में तेल की कीमतें इस साल की खराब मांग और आपूर्ति के चलते गिरकर लगभग पांच साल के निचले स्तर पर आ गई थीं. दिसंबर 2025 में ट्रम्प प्रशासन के वेनेजुएला के जहाजों पर लगे पाबंदी के बाद अमेरिकी क्रूड वायदा भाव 1.3% उछलकर $55.99 तक पहुंच गया था. दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव से जनवरी 2026 की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड $61.03 तक आ गया (WTI $57.59).

फिलहाल वैश्विक बाजार में इस वक्त ब्रेंट क्रूड $61 प्रति बैरल और WTI क्रूड $57 प्रति बैरल पर है. वर्ष 2025 में ओपेक प्लस की कटौती के बावजूद, मांग की कमी से दोनों प्रमुख मार्केट 20% तक गिर चुके थे. अब विश्व भर में तेल की मांग वृद्धि अनिश्चित है, इसलिए सिर्फ जियो-राजनीतिक झटकों (जैसे वेनेजुएला का संकट) की वजह से ही कीमतें ऊपर जा रही हैं. मार्च 2025 में ट्रम्प ने वेनेजुएला से तेल खरीदने वाले देशों पर कड़े शुल्क लगाए जाने की धमकी दी थी, जिससे ब्रेंट $73.79 तक बढ़ गया था. यह दिखाता है कि जब आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ती है तो कीमतें बढ़ जाती हैं.
तेल की वर्तमान कीमत और उतार-चढ़ाव
- वर्तमान कीमत: जनवरी 2026 में ब्रेंट क्रूड लगभग $61.0 प्रति बैरल और अमेरिकी WTI क्रूड लगभग $57.6 प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा है.
- पिछला प्रदर्शन: वर्ष 2025 में दोनों प्रमुख क्रूड लगभग 20% तक गिरे, जो 2020 की महामारी के बाद की सबसे बड़ी गिरावट थी. दिसंबर 2025 में बाजार में रूस यूक्रेन शांति वार्ता के संकेत दिखे तब बेंचमार्क तेल अचानक पांच साल के न्यूनतम ($54-55) पर आ गया. लेकिन ट्रम्प प्रशासन की कड़ी कार्रवाईयों (जैसे प्रतिबंधित तेल टैंकरों को सील करना) ने कीमतों में फिर उछाल ला दी.
- ट्रेंड: पिछले महीनों में तेल बाजार में उतार-चढ़ाव मुख्यत: ओपेक+ उत्पादक देशों के फैसलों, वैश्विक मांग और तनावपूर्ण खबरों पर निर्भर रहा है. अभी आपूर्ति अधिक होने और मांग अनिश्चित रहने के चलते औसतन कीमतें दबाव में हैं.
तनाव से तेल कीमतों का ऐतिहासिक प्रभाव
तेल उत्पादक देशों में राजनीतिक-सैन्य संकट का जल्दी असर बाजार पर दिखता है. तेल और युद्ध के रिश्ते को समझने के लिए इराक सबसे सटीक उदाहरण है. 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला किया और राष्ट्रपति Saddam Hussein की सत्ता समाप्त हुई.
हमले से पहले:
- इराक लगभग 25 लाख बैरल प्रतिदिन तेल निकालता था.
- युद्ध की आशंका के दौरान 2002–03 में कच्चे तेल की कीमतें 30 डॉलर से ऊपर चली गईं.
हमले के बाद:
- शुरुआती वर्षों में तेल उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ.
- पाइपलाइन हमले, राजनीतिक अस्थिरता और गृह संघर्ष के कारण सप्लाई अनियमित रही.
- 2008 तक तेल की कीमतें 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, हालांकि इसके पीछे वैश्विक मांग भी बड़ी वजह थी.

2018 में जब अमेरिका ने ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलकर प्रतिबंध लगाए, तो ईरानी तेल बाजार से बाहर होने लगा. नतीजतन, वैश्विक सप्लाई टाइट हुई और कीमतों में उछाल आया.
इसके अलावा, हाल ही में ईरान और इजराइल की लड़ाई एक ताजा उदाहरण है. जून 2025 में इजराइल द्वारा ईरान पर हमले की खबर मिलते ही कच्चे तेल की कीमतें अचानक 7% बढ़ गईं और ब्रेंट क्रूड $74.23 तक पहुंच गया.
ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध भी इसी कहानी को दोहराते हैं.
इन घटनाओं से स्पष्ट है कि जब कोर तेल आपूर्ति मार्ग या प्रमुख उत्पादकों के बीच युद्ध जैसी चिंताएं बढ़ती हैं, तो वैश्विक बाजार में पैदावार बाधित होने की आशंका से भाव ऊंचे हो जाते हैं और असर पूरी दुनिया पर पड़ता है.
भारत-वेनेजुएला तेल व्यापार
भारत भी पिछले दशक में वेनेज़ुएला से कच्चा तेल आयात करता रहा है, क्योंकि वहां की रिफाइनरी अधिक टैंकरों में एशियाई बाजार के अनुकूल भारी तेल देती हैं. 2024 में भारत ने वेनेजुएला से लगभग 22 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात किया था. यह पूरा आयात में केवल 0.92% का हिस्सा था. लेकिन हालिया अमेरिकी दबाव के चलते भारत ने वेनेज़ुएला से तेल खरीदना लगभग बंद कर दिया है. अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भी शुल्क लगाए हैं, जिससे भारत ने रूस से भी थोड़ा सपोर्ट लिया, लेकिन वेनेजुएला से आयात पूरी तरह बंद हो सकता है.
चूंकि भारत मुख्य रूप से मध्य पूर्व और रूस से तेल लेता है और वेनेजुएला का हिस्सा बहुत छोटा है, इसलिए इस जटिल स्थिति का भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर फिलहाल बहुत बड़ा असर नहीं दिखता.
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