Vedanta vs Adani: ₹14,543 करोड़ JAL डील पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, जानें वेदांता को क्या है दिक्कत
Vedanta ने Adani Group की ₹14,543 करोड़ की JAL डील को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. कंपनी का दावा है कि उसकी ज्यादा बोली के बावजूद उसे नजरअंदाज किया गया. यह मामला अब IBC प्रक्रिया और लेंडर्स के फैसलों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है.
Vedanta और Adani Group के बीच कॉरपोरेट जगत की एक बड़ी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है. जयप्रकाश एसोसिएट्स (JAL) के अधिग्रहण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कानूनी मोड़ ले चुका है, जहां वेदांता ने अडानी एंटरप्राइजेज के ₹14,543 करोड़ के रिजॉल्यूशन प्लान को चुनौती दी है.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक वेदांता ने 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में तब याचिका दाखिल की, जब उसे NCLAT से राहत नहीं मिली. इससे पहले NCLT और NCLAT दोनों ही जगहों पर वेदांता की दलीलें खारिज हो चुकी हैं. अब कंपनी ने शीर्ष अदालत से उम्मीद लगाई है कि उसके पक्ष को सुना जाएगा और फैसले की समीक्षा होगी.
क्या है पूरा विवाद?
इस पूरे मामले की जड़ जयप्रकाश एसोसिएट्स के दिवाला प्रक्रिया में छिपी है. वेदांता का दावा है कि उसने सबसे ज्यादा बोली लगाई थी, फिर भी उसे नजरअंदाज कर दिया गया. कंपनी के मुताबिक, उसका ऑफर नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) के आधार पर ₹12,505 करोड़ से ज्यादा था, जो अन्य बोलीदाताओं से बेहतर था.
लेंडर्स और कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) ने अडानी एंटरप्राइजेज की बोली को मंजूरी दी, जो करीब ₹14,543 करोड़ की थी. उनके मुताबिक, यह प्रस्ताव ज्यादा व्यवहारिक था क्योंकि इसमें करीब ₹6,000 करोड़ का upfront भुगतान और तेजी से भुगतान का प्लान शामिल था.
वेदांता का आरोप और लेंडर्स का पक्ष
वेदांता ने आरोप लगाया है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी. कंपनी का कहना है कि उसे यह नहीं बताया गया कि उसकी बोली क्यों खारिज की गई और उसे अपने प्रस्ताव को स्पष्ट करने का मौका भी नहीं दिया गया. साथ ही, उसका कहना है कि उसका संशोधित ऑफर लेंडर्स के लिए ज्यादा फायदेमंद था.
लेंडर्स ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि IBC के तहत फैसले सिर्फ सबसे ऊंची बोली पर नहीं होते, बल्कि कई पहलुओं जैसे feasibility, viability और execution capability पर आधारित होते हैं. उनका कहना है कि वेदांता का संशोधित ऑफर देर से आया था, इसलिए उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता था.
दोनों ट्रिब्यूनल ने लेंडर्स के फैसले को सही ठहराया और कहा कि CoC की ‘commercial wisdom’ सर्वोपरि होती है. जब तक कोई स्पष्ट कानूनी उल्लंघन न हो, अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती.
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क्यों अहम है JAL डील
जयप्रकाश एसोसिएट्स के पास करीब 4,000 एकड़ जमीन, बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स, होटल्स और सीमेंट बिजनेस है. यही वजह है कि यह डील इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए काफी अहम मानी जा रही है.
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है. अगर अदालत इस मामले में दखल देती है, तो यह IBC प्रक्रिया के लिए एक बड़ा उदाहरण बन सकता है. वहीं, अगर मौजूदा फैसले को बरकरार रखा जाता है, तो यह लेंडर्स के अधिकारों को और मजबूत करेगा.
