क्या है VRRR ऑक्शन, जिसे नकदी मैनेज करने के लिए इस्तेमाल करता है RBI, 7 लाख करोड़ रुपये की होगी नीलामी

यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब सिस्टम में लिक्विडिटी (नकदी) की भरमार है. RBI लिक्विडिटी (नकदी) को कम करने के लिए अक्सर VRRR नीलामी का इस्तेमाल करता रहा है. FCNR (B) में भारी निवेश की वजह से 28 अगस्त तक विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 740.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया.

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Highlights

  • सिस्टम में कुल लिक्विडिटी को मैनेज करने के लिए RBI के पास कई तरीके हैं.
  • इस समय सिस्टम में लिक्विडिटी (नकदी) की भरमार है.
  • 28 अगस्त तक विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 740.8 अरब डॉलर.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI), जो ओवरनाइट से लेकर सात दिन तक के वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शन करता रहा है, सोमवार 7 सितंबर को 30 दिन की अवधि वाला 7 लाख करोड़ रुपये का VRRR ऑक्शन करने जा रहा है. यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब सिस्टम में लिक्विडिटी (नकदी) की भरमार है. इसकी मुख्य वजह सेंट्रल बैंक की ओर से पहले घोषित स्पेशल कंसेशनल स्वैप विंडो के दौरान फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (बैंक) FCNR (B) डिपॉजिट के जरिए उम्मीद से कहीं अधिक पैसा आना है.

क्यों होता है VRRR ऑक्शन का इस्तेमाल?

RBI लिक्विडिटी (नकदी) को कम करने के लिए अक्सर VRRR नीलामी का इस्तेमाल करता रहा है. यह तरीका फिर से चर्चा में आ गया है, क्योंकि रुपये की कीमत में गिरावट के दबाव के बीच विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए जून में शुरू की गई स्पेशल विंडो से 127 अरब डॉलर जुटाए गए थे.

यह रकम बाजार की 80-90 अरब डॉलर की उम्मीद से कहीं अधिक थी और 2013 में इसी तरह की विंडो से जुटाए गए 26 अरब डॉलर के मुकाबले बहुत बड़ी थी.

VRRR ऑक्शन क्या है?

सिस्टम में कुल लिक्विडिटी (नकदी की उपलब्धता) को मैनेज करने के लिए RBI के पास कई तरीके हैं. रिवर्स रेपो रेट वह ब्याज दर है, जो सेंट्रल बैंक कमर्शियल बैंकों से पैसे उधार लेने पर उन्हें देता है. इसे बढ़ाने से RBI मार्केट से ज्यादा कैश ऑब्जर्ब कर सकता है.

VRRR लिक्विडिटी ऑब्जर्ब का एक तरीका है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर कम समय के लिए (एक दिन से लेकर कुछ हफ्तों तक) किया जाता है. बैंकों से अतिरिक्त कैश रिजर्व बैंक के पास चला जाता है, जिससे उधार देने वाले बैंकों के पास लोन देने के लिए कम लिक्विडिटी बचती है.

जैसा कि नाम से पता चलता है, ब्याज दर बदलती रहती है और बैंकों के बीच कॉम्पिटिटिव बिडिंग (प्रतिस्पर्धी बोली) से तय होती है. लिक्विडिटी मैनेजमेंट बहुत जरूरी है, क्योंकि सिस्टम में जरूरत से ज्यादा कैश होने से शॉर्ट-टर्म ब्याज दरें कम हो सकती हैं, जिससे खर्च बढ़ सकता है और महंगाई की चिंताएं बढ़ सकती हैं.

लिक्विडिटी मैनेजमेंट क्यों अहम होगा?

FCNR (B) में भारी निवेश की वजह से 28 अगस्त तक विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 740.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया. अगर पश्चिम एशिया में चल रहे टकराव के बीच रुपये पर दबाव आता है, तो ये भंडार काम आएंगे.

FCNR (B) डिपॉजिट और सरकार के लगातार खर्च की वजह से बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी बनी हुई है. वहीं, भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है. जियो-पॉलिटिकल संकट के बावजूद अप्रैल-जून तिमाही में रियल GDP में उम्मीद से बेहतर 7.8% की बढ़ोतरी हुई.

महंगाई बढ़ने की आशंका

दूसरी ओर, महंगाई अप्रैल में 4.45% थी, जबकि जून में यह 4.38% थी. चिंता यह है कि जियो-पॉलिटिकल तनाव और अल-नीनो की वजह से उम्मीद से कम बारिश के कारण अगस्त में यह और बढ़ सकती है. ऐसे हालात में, RBI को लिक्विडिटी को कंट्रोल करते हुए ग्रोथ और महंगाई के बीच सही संतुलन बनाना होगा.

क्या VRRR ही एकमात्र टूल है?

ऐसा नहीं है. रिपोर्ट्स के अनुसार, सेंट्रल बैंक लिक्विडिटी को ऑब्जर्ब करने के लिए कई तरह के टूल्स का इस्तेमाल कर सकता है. इन विकल्पों में VRRR ऑपरेशन्स को जारी रखना, 2-3 महीनों के लिए इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रेश्यो (CRR) में बढ़ोतरी (CRR वह न्यूनतम कैश बैलेंस है जो बैंकों को बनाए रखना होता है), और सेल-बाय स्वैप शामिल हैं.

सेल-बाय स्वैप RBI को कमर्शियल बैंकों को विदेशी मुद्रा बेचने और भविष्य की किसी खास तारीख पर उसे वापस खरीदने पर सहमत होने की सुविधा देता है.

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