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10 और 20 रुपये के ही प्लास्टिक नोट क्यों ला रहा RBI, क्या डिजिटल पेमेंट पर पड़ेगा असर? समझें पूरी कहानी

सोमवार को लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए, वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि RBI ने अपने सेंट्रल बोर्ड की सिफारिश पर फील्ड ट्रायल के लिए ₹10 और ₹20 के एक-एक अरब पॉलीमर नोट लाने का प्रस्ताव दिया था. यह ताजा कदम 2012 में घोषित एक विचार को फिर से शुरू करने जैसा है.

10 रुपये और 20 रुपये के पॉलिमर नोट.

भारत सरकार ने फील्ड ट्रायल के लिए ₹10 और ₹20 के RBI पॉलीमर नोट लाने के RBI के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही, सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि मौजूदा भारतीय पेपर करेंसी को RBI के प्लास्टिक नोटों से बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है.

₹10 और ₹20 के RBI के दो अरब प्लास्टिक नोट

यह फैसला RBI की सब्सिडियरी कंपनी, भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) द्वारा टेंडर जारी करने के कुछ हफ्ते बाद आया है. इस टेंडर से पता चला कि सेंट्रल बैंक RBI के पॉलीमर नोटों का नया ट्रायल शुरू करने की तैयारी कर रहा है. ऐसा ही एक प्रस्ताव लगभग 14 साल पहले भी आया था, लेकिन उस पर कभी काम नहीं हो पाया था.

फील्ड ट्रायल

सोमवार को लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए, वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि RBI ने अपने सेंट्रल बोर्ड की सिफारिश पर फील्ड ट्रायल के लिए ₹10 और ₹20 के एक-एक अरब पॉलीमर नोट लाने का प्रस्ताव दिया था. अगर ट्रायल सफल रहे, तो इन्हें रेगुलर तौर पर जारी किया जाएगा. उन्होंने कहा कि सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.

मंत्री के अनुसार, RBI ने सरकार को बताया है कि इंटरनेशनल स्टडीज से पता चलता है कि RBI के पॉलिमर नोट आम पेपर नोटों की तुलना में ज्यादा समय तक चलते हैं, जिससे वे काफी अधिक मजबूत होते हैं.

क्या RBI के प्लास्टिक नोट डिजिटल पेमेंट पर असर डालेंगे?

इस सवाल पर कि क्या RBI के प्लास्टिक नोट डिजिटल पेमेंट पर असर डाल सकते हैं, चौधरी ने कहा कि यह प्रस्ताव अभी शुरुआती स्टेज में है और इनके जारी होने के बाद ही किसी असर का पता चल पाएगा. उन्होंने कहा कि फिजिकल बैंकनोट और डिजिटल पेमेंट सिस्टम एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही जनता के लिए उपलब्ध रहेंगे.

सरकार ने यह भी साफ किया कि RBI के पॉलीमर नोट मौजूदा भारतीय पेपर करेंसी के साथ-साथ चलेंगे. सरकार ने कहा कि पेपर बैंकनोट को पूरी तरह से पॉलीमर-बेस्ड नोट से बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है.

RBI के प्लास्टिक नोट फिर से चर्चा में क्यों हैं?

यह नई पहल BRBNMPL द्वारा हाल ही में जारी ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EOI) के बाद शुरू हुई है. जुलाई में ही BRBNMPL ने बैंकनोट छापने के लिए जरूरी सिक्योरिटी फीचर्स वाले ओपेसिफाइड पॉलीमर सब्सट्रेट के मैन्युफ़ैक्चरर्स और सप्लायर्स से कॉम्पिटिटिव बिड्स (प्रतिस्पर्धी बोलियां) मंगवाई थीं.

RBI की सब्सिडियरी कंपनी ने कहा कि EOI में बताई गई जरूरत सिर्फ तत्काल आवश्यकता के लिए थी. कंपनी ने कहा कि अगर RBI के पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल सफल रहता है, तो वह भविष्य में ‘रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल’ (RFP) या बाद के टेंडर्स के जरिए अलग-अलग मूल्यवर्ग (डिनोमिनेशन) के लिए बड़ी मात्रा में पॉलीमर सब्सट्रेट खरीदने का इरादा रखती है.

सरकार ने प्लास्टिक करेंसी नोटों के बारे में क्या कहा?

यह ताजा कदम 2012 में घोषित एक विचार को फिर से शुरू करने जैसा है. 13 दिसंबर, 2012 की प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की रिलीज के अनुसार, RBI ने भारत सरकार के साथ मिलकर कई विकल्पों पर विचार किया था, जिसमें पॉलीमर सब्सट्रेट पर बैंकनोट छापना भी शामिल था. उस समय, पांच शहरों में फील्ड ट्रायल के आधार पर ₹10 के RBI पॉलीमर नोटों के एक अरब (1 अरब) पीस जारी करने फैसला किया गया था.

PIB की रिलीज में यह भी साफ किया गया था कि पॉलीमर या प्लास्टिक नोट लाने का मुख्य मकसद बैंकनोट की उम्र बढ़ाना था, न कि नकली नोटों की समस्या से निपटना.

इसके बावजूद, दुनिया की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत, ऑस्ट्रेलिया द्वारा पॉलीमर बैंकनोटों की पूरी सीरीज शुरू करने के लगभग तीन दशक बाद भी RBI के प्लास्टिक नोटों का मूल्यांकन कर रहा है. आज, लगभग 60 देश किसी न किसी रूप में पॉलीमर करेंसी का इस्तेमाल करते हैं.

पॉलिमर नोट क्या होते हैं और ये आज की भारतीय करेंसी से कैसे अलग हैं?

RBI के पॉलिमर नोट पारंपरिक बैंकनोट पेपर के बजाय नॉन-फाइब्रस (बिना रेशे वाले) और नॉन-पोरस पॉलिमर बेस पर छापे जाते हैं. मौजूदा भारतीय करेंसी ऐसे पेपर पर छापी जाती है जो पूरी तरह से लंबे कॉटन फाइबर (कपास के रेशों) से बना होता है, जो कॉटन कॉम्बर और लिंटर से मिलते हैं. इसका मतलब है कि पेपर-बेस्ड बैंकनोट और पेड़ों की कटाई के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है.

RBI के पॉलिमर नोट लाने का सबसे बड़ा कारण उनकी लंबी उम्र है, खासकर कम कीमत वाले नोटों के लिए, जो बार-बार हाथों से गुजरते हैं और जल्दी खराब हो जाते हैं. लंबी उम्र का मतलब है कम रिप्लेसमेंट, कम छपाई का खर्च और कम बर्बादी. साथ ही, इससे नकली नोटों पर रोक लगाने में भी मदद मिल सकती है.

कौन से देश प्लास्टिक नोटों का इस्तेमाल करते हैं?

ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और कनाडा जैसे देश पहले से ही टिकाऊ प्लास्टिक फिल्म से बने पॉलिमर बैंकनोट का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये नोट पारंपरिक पेपर बैंकनोट की तुलना में बहुत लंबे समय तक चलते हैं और टूट-फूट के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं, जिससे समय के साथ रिप्लेसमेंट की लागत कम करने में मदद मिलती है.

ऑस्ट्रेलिया 1988 में पॉलिमर बैंकनोट जारी करने वाला पहला देश बना था. मौजूदा समय में 60 से अधिक देश प्लास्टिक करेंसी का इस्तेमाल करते हैं. विकसित अर्थव्यवस्थाओं में, यूके, कनाडा और न्यूजीलैंड ने पॉलिमर नोट अपनाए हैं. भारत के करीब, थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया और सिंगापुर भी प्लास्टिक करेंसी का इस्तेमाल करते हैं, हालांकि जरूरी नहीं कि हर कीमत के नोट के लिए ऐसा हो.

बैंक ऑफ कनाडा ने पेपर और प्लास्टिक बैंकनोट बनाने के पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन करने के बाद 2011 में पॉलिमर बैंकनोट की ओर बढ़ना शुरू किया.

₹10 और ₹20 के नोट ही क्यों?

RBI के पॉलिमर नोटों का सबसे बड़ा फायदा उनकी मजबूती (ड्यूरेबिलिटी) है. कीमत के आधार पर, पॉलिमर नोट पेपर बैंकनोट की तुलना में दो से छह गुना अधिक समय तक चल सकते हैं. कम कीमत वाले नोटों की उम्र आमतौर पर कम होती है क्योंकि वे अधिक बार चलन में रहते हैं. संभवत: इसलिए ही सरकार शुरुआत में ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोट ला रही है.

लंबी उम्र का मतलब है कि एक निश्चित अवधि में कम RBI पॉलिमर नोट छापने की आवश्यकता होती है. हालांकि प्रत्येक पॉलिमर नोट को बनाने में पेपर नोट की तुलना में अधिक लागत आती है. लेकिन पेपर नोटों का प्रोडक्शन, ट्रांसपोर्टेशन, प्रोसेसिंग और फिर आखिर में वे खराब हो जाते हैं. समय के साथ, पॉलिमर करेंसी प्रबंधन की कुल लागत कम हो जाती है और साथ ही पर्यावरणीय प्रभाव भी कम होता है.

करेंसी छापने का खर्च घटा

छपाई की कम आवश्यकताओं के कारण करेंसी छापने पर RBI का अपना खर्च लगभग 24% घटकर FY26 में ₹4,875 करोड़ हो गया. साथ ही, भारतीय करेंसी की मांग मजबूत बनी हुई है. RBI की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 के आखिर में चलन में मौजूद करेंसी की वैल्यू सालाना आधार पर 12% बढ़कर ₹41.23 लाख करोड़ हो गई. चलन में ₹500 के नोटों का दबदबा बना हुआ है और कुल वैल्यू में इनकी हिस्सेदारी 86% है.

रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की स्टडीज से पता चला है कि भले ही पॉलीमर बैंकनोट बनाने में ज्यादा खर्च आता है (क्योंकि पॉलीमर सबस्ट्रेट की कीमत कागज से अधिक होती है), लेकिन इनकी लंबी उम्र के कारण इन्हें बदलने और प्रोसेस करने का खर्च कम हो जाता है, जिससे समय के साथ काफी बचत होती है.

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