एक ही SIP, एक ही म्यूचुअल फंड, फिर भी लाखों रुपये का फर्क! जानें एक्सपेंस रेशियो का यह गणित
एक ही म्यूचुअल फंड, एक ही एसआईपी और 10 साल का निवेश, फिर भी एक निवेशक ने 3 लाख रुपये से ज्यादा की अतिरिक्त संपत्ति कैसे बनाई? इसकी सबसे बड़ी वजह एक्सपेंस रेशियो है. जानिए डायरेक्ट और रेगुलर प्लान में क्या अंतर होता है, एक्सपेंस रेशियो आपके रिटर्न को कैसे प्रभावित करता है और Quant Small Cap Fund, Nippon India Small Cap Fund समेत कई फंड में डायरेक्ट प्लान ने कैसे बेहतर रिटर्न दिया.
Highlights
- एक्सपेंस रेशियो का छोटा अंतर, 10 साल में लाखों रुपये का बड़ा फर्क.
- डायरेक्ट प्लान में रेगुलर प्लान के मुकाबले ज्यादा रिटर्न की संभावना होती है.
- फंड चुनते समय सिर्फ एक्सपेंस रेशियो नहीं, प्रदर्शन भी देखें.
Mutual Fund: अगर दो निवेशक एक ही म्यूचुअल फंड में हर महीने एक समान SIP करें, दोनों 10 साल तक निवेश बनाए रखें और दोनों को बाजार से लगभग समान रिटर्न मिले, तो क्या दोनों की कमाई भी बराबर होगी? आमतौर पर ज्यादातर लोगों का जवाब ‘हां’ होगा. लेकिन हकीकत इससे अलग है. सिर्फ एक छोटी-सी लागत यानी एक्सपेंस रेशियो दोनों निवेशकों की अंतिम कमाई में लाखों रुपये का अंतर पैदा कर सकती है. दरअसल, डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड प्लान के बीच सबसे बड़ा अंतर एक्सपेंस रेशियो का होता है. यह देखने में भले ही सालाना 0.5 फीसदी से 1 फीसदी के आसपास का छोटा अंतर लगे, लेकिन लंबी अवधि में यही अंतर कंपाउंडिंग के कारण लाखों रुपये की अतिरिक्त संपत्ति बना सकता है.
क्या होता है एक्सपेंस रेशियो
एक्सपेंस रेशियो वह शुल्क है, जिसे एसेट मैनेजमेंट कम्पनी (AMC) किसी म्यूचुअल फंड का प्रबंधन करने के लिए निवेशकों से वसूलती है. इसमें फंड मैनेजमेंट, रिसर्च, प्रशासन, रजिस्ट्रार फीस, मार्केटिंग और अन्य ऑपरेशनल खर्च शामिल होते हैं. यह शुल्क निवेशकों से अलग से नहीं लिया जाता, बल्कि हर दिन फंड की कुल संपत्ति से थोड़ा-थोड़ा काटकर नेट एसेट वैल्यू में समायोजित कर दिया जाता है.
इसलिए अधिकांश निवेशकों को इसका असर सीधे दिखाई नहीं देता, लेकिन समय के साथ यह रिटर्न को प्रभावित करता है. सेबी द्वारा तय अधिकतम सीमा के भीतर एएमसी समय-समय पर एक्सपेंस रेशियो में बदलाव कर सकती हैं. किसी स्कीम का एयूएम बढ़ने पर खर्च अधिक निवेशकों में बंट जाता है, जिससे एक्सपेंस रेशियो कम हो सकता है. इसके अलावा सेबी के नियमों में बदलाव और रेगुलर प्लान में वितरकों को दिए जाने वाले कमीशन में बदलाव भी इसे प्रभावित करते हैं.
डायरेक्ट और रेगुलर प्लान में कितना फर्क
रेगुलर प्लान में निवेशक किसी डिस्ट्रीब्यूटर, फाइनेंशियल एडवाइजर, बैंक या ब्रोकर के जरिए निवेश करता है. इसके बदले एएमसी उन्हें कमीशन देती है, जिसका खर्च एक्सपेंस रेशियो में जुड़ जाता है. वहीं, डायरेक्ट प्लान में निवेशक सीधे एएमसी से निवेश करता है. इसमें किसी बिचौलिये का कमीशन नहीं होता, इसलिए एक्सपेंस रेशियो कम रहता है. यही वजह है कि लंबे समय में डायरेक्ट प्लान का रिटर्न आमतौर पर रेगुलर प्लान से बेहतर होता है.
10 साल में 3 लाख रुपये से ज्यादा का अंतर
इसका सबसे बड़ा उदाहरण Quant Small Cap Fund में देखने को मिलता है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि किसी निवेशक ने 10 साल तक हर महीने 10,000 रुपये की एसआईपी रेगुलर प्लान में की होती, तो उसकी निवेश राशि बढ़कर करीब 43.25 लाख रुपये हो जाती. वहीं, उसी अवधि में डायरेक्ट प्लान में निवेश करने वाले निवेशक का कॉर्पस करीब 46.69 लाख रुपये पहुंच जाता. यानी केवल कम एक्सपेंस रेशियो की वजह से लगभग 3.4 लाख रुपये का अतिरिक्त फायदा मिलता.
इसी तरह Nippon India Small Cap Fund में डायरेक्ट प्लान के निवेशकों ने करीब 2 लाख रुपये से अधिक की अतिरिक्त संपत्ति बनाई. वहीं, Quant Multi Asset Allocation Fund, Bank of India Manufacturing & Infra Fund और Invesco India Mid Cap Fund में भी डायरेक्ट प्लान के निवेशकों को लगभग 3 लाख रुपये तक का अतिरिक्त लाभ मिला.
क्या हमेशा डायरेक्ट प्लान ही बेहतर है
हालांकि, कम एक्सपेंस रेशियो की वजह से डायरेक्ट प्लान बेहतर रिटर्न दे सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर निवेशक के लिए यही सही विकल्प है. यदि किसी निवेशक को म्यूचुअल फंड चुनने, पोर्टफोलियो तैयार करने, समय-समय पर उसकी समीक्षा करने और रीबैलेंसिंग करने का अनुभव नहीं है, तो रेगुलर प्लान उसके लिए बेहतर हो सकता है.
इसमें फाइनेंशियल एडवाइजर की सलाह, निवेश की निगरानी और पोर्टफोलियो प्रबंधन जैसी सुविधाएं शामिल रहती हैं. वहीं, जिन निवेशकों के पास बाजार की अच्छी समझ, रिसर्च करने का समय और निवेश में अनुशासन है, वे डायरेक्ट प्लान चुनकर कम एक्सपेंस रेशियो का लाभ उठा सकते हैं.
केवल एक्सपेंस रेशियो देखकर न लें फैसला
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी म्यूचुअल फंड का चयन केवल कम एक्सपेंस रेशियो के आधार पर नहीं करना चाहिए. निवेशकों को फंड के लगातार प्रदर्शन, जोखिम के मुकाबले मिलने वाले रिटर्न, फंड मैनेजर की रणनीति और अपने वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार ही निवेश का फैसला लेना चाहिए.
यानी एक्सपेंस रेशियो जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन यह अकेला पैमाना नहीं है. सही म्यूचुअल फंड का चुनाव और लंबे समय तक अनुशासित निवेश ही बेहतर संपत्ति निर्माण की सबसे मजबूत रणनीति मानी जाती है.
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डिस्क्लेमर: Money9live किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है. यहां पर केवल स्टॉक्स की जानकारी दी गई है. निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें.
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