पर्सनल लोन के लिए कितनी होनी चाहिए सैलरी? सिर्फ ₹20-25 हजार का सच पूरा नहीं; जानें असली कसौटी

पर्सनल लोन लेते वक्त सिर्फ न्यूनतम सैलरी देखना काफी नहीं होता. बैंक आपकी EMI, नौकरी की स्थिरता, क्रेडिट हिस्ट्री और खर्च करने की क्षमता को ज्यादा अहमियत देते हैं. जानिए क्यों एक जैसी सैलरी वालों को अलग-अलग फैसला मिलता है और असली न्यूनतम इनकम टेस्ट क्या है.

पर्सनल लोन और सैलरी Image Credit: @AI

Personal Loan and Salary Eligibility: जब अचानक कोई खर्च सिर पर आ खड़ा होता है- मोबाइल टूट जाए, मेडिकल इमरजेंसी आ जाए या महीने के आखिर में बजट पूरी तरह गड़बड़ा जाए तो पर्सनल लोन सबसे आसान रास्ता लगने लगता है. ऐसे वक्त में लोग सीधे गूगल पर टाइप करते हैं, “पर्सनल लोन के लिए न्यूनतम सैलरी कितनी होनी चाहिए?” जवाब अक्सर एक लाइन में मिल जाता है कि 15,000 रुपये, 20,000 रुपये या 25,000 रुपये. लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा पेचीदा है.

न्यूनतम इनकम सिर्फ शुरुआत है, फैसला नहीं

बैंक और फाइनेंस कंपनियां वाकई एक मिनिमम इनकम तय करती हैं. मेट्रो शहरों में नौकरीपेशा लोगों के लिए यह आमतौर पर 20000 से 25000 रुपये महीना होती है, जबकि छोटे शहरों में थोड़ी कम हो सकती है. खुद का काम करने वालों से अक्सर 30,000 रुपये या उससे ज्यादा की इनकम मांगी जाती है. लेकिन इस रकम तक पहुंच जाना सिर्फ इतना तय करता है कि आपका आवेदन सीधे कूड़ेदान में नहीं जाएगा. इसके बाद असली जांच शुरू होती है.

बैंक यह देखता है कि आपकी जेब कितनी खाली है

सबसे अहम सवाल यह होता है कि सैलरी आने के बाद आपके पास बचता कितना है? होम लोन, कार लोन, क्रेडिट कार्ड EMI, BNPL ऐप्स, सब कुछ जोड़कर देखा जाता है. अगर आपकी कमाई का आधा हिस्सा पहले से किस्तों में जा रहा है, तो बैंक को रिस्क दिखने लगता है. यही वजह है कि एक जैसी सैलरी वाले दो लोगों में से एक को लोन मिल जाता है और दूसरे को मना कर दिया जाता है. फर्क सिर्फ मौजूदा कर्ज का होता है.

स्थिर नौकरी, ऊंची सैलरी से ज्यादा कीमती

बैंक को ज्यादा सैलरी से ज्यादा भरोसेमंद सैलरी पसंद होती है.
30,000 रुपये की ऐसी नौकरी जो दो साल से एक ही कंपनी में चल रही हो, बैंक के लिए ज्यादा सुरक्षित है, बजाय 50,000 रुपये की उस सैलरी के जिसमें बार-बार नौकरी बदली गई हो या बीच-बीच में गैप रहा हो. बैंकों को रिस्क से सख्त एलर्जी होती है. उन्हें स्थिरता चाहिए.

खुद का काम? तो जांच और कड़ी

सेल्फ-एम्प्लॉयड लोगों के लिए लोन पाना थोड़ा मुश्किल होता है. बैंक आपके सबसे अच्छे साल को नहीं, बल्कि पिछले 2–3 साल की औसत कमाई को देखता है.अ गर इनकम कभी ज्यादा, कभी कम है, या टैक्स में बहुत ज्यादा कटौती दिखाई गई है, तो बैंक मान लेता है कि आगे भी उतार-चढ़ाव हो सकता है भले ही असल में कैश फ्लो ठीक हो.

क्रेडिट हिस्ट्री: यहीं खेल बिगड़ता है

कई लोगों का आवेदन यहीं चुपचाप खत्म हो जाता है. पिछली EMI मिस होना, देर से भुगतान, क्रेडिट कार्ड पूरी लिमिट तक इस्तेमाल करना या पुराने लोन को “सेटल” करना ये सब रेड फ्लैग बन जाते हैं. 35,000 रुपये कमाने वाला लेकिन साफ रिकॉर्ड रखने वाला व्यक्ति, बैंक को 80,000 रुपये कमाने वाले लेकिन खराब हिस्ट्री वाले व्यक्ति से ज्यादा सुरक्षित लग सकता है.

उम्र और शहर भी असर डालते हैं

अगर आप रिटायरमेंट के करीब हैं, तो बैंक लोन की अवधि घटा देता है. अवधि कम होगी तो EMI बढ़ेगी, और बढ़ी EMI आपको अचानक अयोग्य बना सकती है. इसके अलावा, मेट्रो शहर और छोटे शहर में एक ही सैलरी को अलग नजर से देखा जाता है. जहां एक जगह यह “ठीक” लगती है, वहीं दूसरी जगह “कम” मानी जा सकती है.

अगर आप सीमा पर खड़े हैं, तो ये काम आएगा

लोन के लिए अप्लाई करने से पहले कुछ छोटे कदम बड़ा फर्क डाल सकते हैं-

NBFC से लोन जल्दी मिल सकता है, लेकिन वहां ब्याज और नियम दोनों सख्त होते हैं.

आखिर असली कसौटी क्या है?

बैंक की बताई न्यूनतम सैलरी को एक पल के लिए भूल जाइए. अपनी संभावित EMI निकालिए और खुद से ईमानदारी से पूछिए कि क्या मैं इसे हर महीने बिना दबाव के चुका सकता हूं? अगर जवाब “नहीं” है, तो बैंक भी देर-सबेर उसी नतीजे पर पहुंचेगा. फर्क बस इतना है कि बैंक कैलकुलेटर चलाता है, आप अपनी जिंदगी. यही पर्सनल लोन की असली न्यूनतम इनकम है.

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