पुराना घर खरीदने जा रहे हैं? होम लोन लेने से पहले ये डॉक्यूमेंट जरूर करें वेरीफाई; नहीं तो हो सकता है नुकसान
पुराना घर खरीदने की योजना बना रहे हैं और इसके लिए होम लोन लेने वाले हैं, तो सिर्फ प्रॉपर्टी की कीमत और EMI पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है. पुरानी प्रॉपर्टी की कंडीशन, टाइटल, डॉक्यूमेंटेशन, रजिस्ट्रेशन, कंस्ट्रक्शन अप्रूवल और लीगल स्टेटस की जांच करना जरूरी है. रिपेयर और रेनोवेशन कॉस्ट को भी कुल खर्च में शामिल करें.
Highlights
- पुरानी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले टाइटल, डॉक्यूमेंटेशन और लीगल स्टेटस जरूर चेक करें.
- होम लोन से पहले रिपेयर, रेनोवेशन और मेंटेनेंस कॉस्ट को भी कुल बजट में शामिल करें.
- लाल डोरा और अनऑथराइज्ड कॉलोनी की प्रॉपर्टी में लोन लेने से पहले लीगल और अप्रूवल्स की जांच जरूरी है.
Home Loan: पुराना घर खरीदना कई लोगों के लिए नया घर खरीदने के मुकाबले किफायती विकल्प हो सकता है. पुराने घर अक्सर पहले से विकसित इलाके में होते हैं, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी बेहतर मिल सकती है. इसके अलावा, कई मामलों में इसी लोकेशन पर नया प्रोजेक्ट खरीदने के मुकाबले पुराने घर की कीमत भी कम हो सकती है. लेकिन अगर पुराने घर को होम लोन के जरिए खरीदने की योजना है, तो सिर्फ प्रॉपर्टी की कीमत और EMI देखना काफी नहीं है. बैंक के लिए यह भी जरूरी होता है कि जिस प्रॉपर्टी को लोन के बदले सिक्योरिटी के तौर पर रखा जा रहा है, उसका टाइटल, डॉक्यूमेंटेशन, कंस्ट्रक्शन और लीगल स्टेटस स्पष्ट हो.
प्रॉपर्टी की उम्र से ज्यादा जरूरी उसकी कंडीशन
पुरानी प्रॉपर्टी खरीदते समय सिर्फ उसकी उम्र देखकर फैसला नहीं करना चाहिए. 15 साल पुराना घर और 40 साल पुराना घर एक जैसा नहीं होता, लेकिन केवल उम्र के आधार पर भी प्रॉपर्टी का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता. बायर को प्रॉपर्टी की स्ट्रक्चरल कंडीशन, पहले किए गए अल्टरेशन, मेंटेनेंस हिस्ट्री और आने वाले रिपेयर या रेनोवेशन कॉस्ट की जांच करनी चाहिए. अगर घर काफी पुराना है या उसमें बड़े स्तर पर बदलाव किए गए हैं, तो स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी असेसमेंट कराना भी उपयोगी हो सकता है.
मान लीजिए किसी पुराने घर की कीमत 70 लाख रुपये है और उसे रहने लायक बनाने के लिए तुरंत 8 लाख रुपये रिपेयर और रेनोवेशन पर खर्च करने पड़ते हैं. ऐसे में बायर के लिए प्रॉपर्टी की इफेक्टिव एक्विजिशन कॉस्ट 70 लाख रुपये नहीं, बल्कि 78 लाख रुपये हो जाएगी. इसलिए पुराने घर की कीमत तय करते समय सिर्फ सेलर की आस्किंग प्राइस नहीं, बल्कि प्रॉपर्टी को रहने लायक बनाने की पूरी कॉस्ट को ध्यान में रखना चाहिए.
डाउन पेमेंट के साथ रिपेयर कॉस्ट भी समझें
होम लोन लेने वाले बायर के पास अगर 15 लाख रुपये डाउन पेमेंट और अन्य अपफ्रंट कॉस्ट के लिए हैं, तो रिपेयर और रेनोवेशन पर होने वाला अतिरिक्त खर्च फाइनेंसिंग रिक्वायरमेंट को बदल सकता है. यानी होम लोन की प्लानिंग सिर्फ प्रॉपर्टी प्राइस के आधार पर नहीं करनी चाहिए. बायर को EMI, डाउन पेमेंट, रिपेयर, रेनोवेशन, मेंटेनेंस और अन्य ओनरशिप कॉस्ट को मिलाकर पूरी फाइनेंशियल प्लानिंग करनी चाहिए.
रजिस्ट्रेशन के बाद भी जांच जरूरी
पुरानी प्रॉपर्टी खरीदते समय रजिस्ट्रेशन हो जाना ही पूरी जांच का अंत नहीं है. बायर को टाइटल, ओनरशिप हिस्ट्री, एन्कम्ब्रेंस, प्रॉपर्टी टैक्स रिकॉर्ड और अन्य जरूरी डॉक्यूमेंट्स की जांच करनी चाहिए. इसके अलावा, प्रॉपर्टी का मौजूदा कंस्ट्रक्शन सैंक्शन्ड प्लान और लागू अप्रूवल्स के अनुरूप है या नहीं, यह भी देखना जरूरी है.
पुराने घरों में कई बार ओरिजिनल कंस्ट्रक्शन के बाद अतिरिक्त फ्लोर, एक्सटेंशन या एनक्लोज्ड बालकनी जैसे बदलाव किए गए होते हैं. अगर इन बदलावों का डॉक्यूमेंटेशन उपलब्ध नहीं है या प्रॉपर्टी के मौजूदा स्ट्रक्चर से डॉक्यूमेंट्स मेल नहीं खाते हैं, तो होम लोन फाइनेंसिंग में परेशानी आ सकती है. इसलिए बायर को लोन के लिए फाइनेंशियल कमिटमेंट करने से पहले प्रॉपर्टी की पूरी डॉक्यूमेंटेशन जांच लेनी चाहिए.
बैंक भी प्रॉपर्टी की जांच करता है
होम लोन के मामले में बैंक सिर्फ बॉरोअर की इनकम और रिपेमेंट कैपेसिटी नहीं देखता. प्रॉपर्टी भी लोन प्रोसेस का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है. सोर्स के मुताबिक, RBI के हाउसिंग फाइनेंस फ्रेमवर्क के तहत कंस्ट्रक्टेड प्रॉपर्टी खरीदने वाले बॉरोअर को यह घोषणा करनी होती है कि प्रॉपर्टी सैंक्शन्ड प्लान और/या बिल्डिंग बायलॉज के अनुसार बनी है. जहां संभव हो, कंप्लीशन सर्टिफिकेट भी होना चाहिए. इसके अलावा, लोन डिस्बर्समेंट से पहले बैंक को आर्किटेक्ट से कंप्लायंस सर्टिफिकेट भी लेना होता है.
लाल डोरा और अनऑथराइज्ड कॉलोनी में ज्यादा सावधानी
कुछ पुरानी प्रॉपर्टीज का लीगल हिस्ट्री अधिक जटिल हो सकता है. उदाहरण के लिए, लाल डोरा प्रॉपर्टी खरीदते समय बायर को लैंड की नेचर और ओनरशिप से जुड़े डॉक्यूमेंट्स को अच्छी तरह समझना चाहिए. दिल्ली रेवेन्यू डिपार्टमेंट के अनुसार, लाल डोरा सर्टिफिकेट गांव के आबादी एरिया में प्रॉपर्टी या लैंड के ओनरशिप को स्थापित करने से जुड़ा डॉक्यूमेंट है. हालांकि, ऐसे मामलों में भी बायर को कंप्लीट टाइटल और लागू प्रॉपर्टी डॉक्यूमेंट्स की जांच करनी चाहिए.
अनऑथराइज्ड कॉलोनियों में होम लोन लेते समय भी विशेष सावधानी जरूरी है. सोर्स के मुताबिक, RBI के हाउसिंग फाइनेंस फ्रेमवर्क के तहत अनऑथराइज्ड कॉलोनियों में मौजूद प्रॉपर्टीज के लिए हाउसिंग लोन नहीं दिया जाना चाहिए, जब तक कॉलोनी रेगुलराइज न हो जाए और लागू चार्जेस का भुगतान न किया गया हो.
प्रॉपर्टी और Home Loan को अलग-अलग फैसला न मानें
पुराना घर खरीदते समय प्रॉपर्टी और होम लोन को दो अलग-अलग फैसलों के तौर पर नहीं देखना चाहिए. प्रॉपर्टी की कंडीशन, डॉक्यूमेंटेशन और लीगल स्टेटस इस बात को प्रभावित कर सकते हैं कि कितना लोन मिल सकता है और किन टर्म्स पर मिल सकता है. वहीं, लोन स्ट्रक्चर यह तय करता है कि EMI, मेंटेनेंस, रिपेयर और अन्य खर्च जोड़ने के बाद प्रॉपर्टी खरीदना फाइनेंशियली कंफर्टेबल रहेगा या नहीं.
इसलिए पुराने घर की खरीदारी से पहले सबसे पहले ओनरशिप और टाइटल की जांच करनी चाहिए. इसके बाद रजिस्ट्रेशन और एन्कम्ब्रेंस को वेरिफाई करें. फिर कंस्ट्रक्शन, सैंक्शन्ड प्लान और जरूरी अप्रूवल्स की जांच करें. इसके बाद प्रॉपर्टी की फिजिकल कंडीशन और रिपेयर कॉस्ट का असेसमेंट करें. आखिर में यह समझें कि प्रॉपर्टी की वास्तविक स्थिति और टोटल कॉस्ट को देखते हुए कितना लोन और कितनी टेन्योर आपके लिए उपयुक्त होगी.
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