BSE के शेयर धड़ाम, NSE का IPO दे रहा झटका; जेफरीज ने बता दिया दोनों एक्सचेंज में बेस्ट कौन
जेफरीज ने कहा कि NSE, जिसने अपने 30,000 करोड़ रुपये के IPO के लिए SEBI के पास ड्राफ्ट पेपर जमा किए हैं, का प्रोडक्ट मिक्स BSE के मुकाबले अधिक डायवर्सिफाइड है. NSE ने ग्लोबल लेवल की कंपनियों के बराबर एक टेक प्रोडक्ट सुइट बनाया है और वह अपने कमोडिटीज बिजनेस का विस्तार कर रही है.
मंगलवार 7 जुलाई को BSE के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली. शेयर करीब 4 फीसदी टूट गया, क्योंकि ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने कहा कि वह IPO लाने वाली NSE को अधिक ‘डाइवर्सिफाइड’ मानती है. दोपहर 2 बजे बीएसई के शेयर 3.12 फीसदी की गिरावट के साथ 3684.20 रुपये पर कारोबार कर रहे थे.
मार्केट हिस्सेदारी
जेफरीज ने कहा कि NSE, जिसने अपने 30,000 करोड़ रुपये के IPO के लिए SEBI के पास ड्राफ्ट पेपर जमा किए हैं, का प्रोडक्ट मिक्स BSE के मुकाबले अधिक डायवर्सिफाइड है और ज्यादातर सेगमेंट में इसकी मार्केट हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा है. जेफरीज ने आगे कहा कि NSE ने ग्लोबल लेवल की कंपनियों के बराबर एक टेक प्रोडक्ट सुइट बनाया है और वह अपने कमोडिटीज बिजनेस का विस्तार कर रही है.
टेक्नोलॉजी और डेटा
डेटा से पता चलता है कि इंडेक्स ऑप्शन और कमोडिटी F&O को छोड़कर, ज्यादातर कैटेगरी में NSE का मार्केट शेयर 90 फीसदी है. कंपनी की क्लियरिंग कॉर्पोरेशन (NCL) का कैश में 88% और F&O में 91% मार्केट शेयर है. NSE के पास टेक्नोलॉजी और डेटा से जुड़ी कई सर्विस भी हैं, जिनसे उसे FY26 में 13% रेवेन्यू मिला.
इंश्योरेंस कंपनियां बेचेंगी हिस्सेदारी
जेफरीज ने कहा, ‘NSE के ‘ऑफर फॉर सेल’ में बताया गया है कि PSU जनरल इंश्योरेंस कंपनियां 1.1% हिस्सेदारी बेचेंगी. हमने देखा है कि चार में से तीन मल्टी-लाइन जनरल इंश्योरेंस कंपनियों (ओरिएंटल, नेशनल और यूनाइटेड) की सॉल्वेंसी रेगुलेटरी लिमिट (1.5 गुना) से कम है. इससे इन कंपनियों की उपलब्ध सॉल्वेंसी कैपिटल बढ़ सकती है.’
कैश मार्केट टर्नओवर
विदेशी ब्रोकरेज ने बताया कि FY20-26 के दौरान कैश मार्केट टर्नओवर में 19 फीसदी की ग्रोथ के मुकाबले इक्विटी ऑप्शंस में सालाना 56 फीसदी की कंपाउंडेड ग्रोथ हुई है. FY26 में ऑप्शंस प्रीमियम का औसत डेली टर्नओवर (ADTO), डेली कैश मार्केट टर्नओवर का 70 फीसदी था.
डेरिवेटिव्स का हिस्सा
इसलिए, भारतीय एक्सचेंजों के ऑपरेटिंग रेवेन्यू में डेरिवेटिव्स का हिस्सा 70 फीसदी रहा. जेफरीज का कहना है कि इससे एक्सचेंज के रेवेन्यू और मार्केट परफॉर्मेंस साइकल के बीच एक संबंध बन गया है, क्योंकि ऑप्शन ट्रेडिंग कीमत के बजाय वोलैटिलिटी (उतार-चढ़ाव) से गहराई से जुड़ी होती है.
US की तुलना में भारत में भले ही ज्यादा ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स का ट्रेड होता है, लेकिन ऑप्शन प्रीमियम का कुल मूल्य US का सिर्फ पांचवां हिस्सा है.
NSE का ऑपरेटिंग EBITDA मार्जिन
को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामले से जुड़े प्रोविजन FY26 में 1,390 करोड़ रुपये थे. FY25 में TAP मामले में 670 करोड़ रुपये के पेमेंट के साथ-साथ, इन प्रोविजन्स का NSE के FY25 और FY26 के ऑपरेशनल EBITDA पर असर पड़ा. जेफरीज का कहना है कि SEBI सेटलमेंट फीस एक बार होने वाला खर्च है. अगर इसे हटा दिया जाए, तो NSE का नॉर्मलाइज्ड ऑपरेटिंग EBITDA मार्जिन 76-77% के आसपास काफी हद तक स्थिर रहा है.
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