कॉपर की ट्रेडिंग कैसे करें? क्यों इसे कहा जा रहा है ‘अगला सिल्वर’ और क्या हैं निवेश के मौके?
कॉपर को बढ़ती मांग और सीमित सप्लाई के कारण “अगला सिल्वर” कहा जा रहा है. इलेक्ट्रिक वाहन, एआई और ग्रीन एनर्जी सेक्टर से मांग बढ़ रही है. MCX फ्यूचर्स, ETF और कॉपर शेयरों के जरिए ट्रेडिंग संभव है. कीमतें हाल में नरम पड़ी हैं लेकिन मजबूत डिमांड से आगे तेजी की उम्मीद बनी हुई है.
वैश्विक बाजार में कॉपर यानी तांबा एक बार फिर निवेशकों और ट्रेडर्स के रडार पर है. इलेक्ट्रिक वाहन, ग्रीन एनर्जी, डेटा सेंटर और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में बढ़ती मांग के बीच इसे अब “अगला सिल्वर” कहा जा रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि सप्लाई दबाव और तेजी से बढ़ती मांग के कारण आने वाले समय में कॉपर की कीमतों में मजबूत रुख देखने को मिल सकता है. कॉपर (तांबा) में ट्रेडिंग का मतलब इस इंडस्ट्रियल मेटल की कीमत में उतार-चढ़ाव पर दांव लगाना होता है. रेटिंग एजेंसी ICRA का मानना है कि भारत में तांबे की मांग आने वाले दो वर्षों में 10-12 फीसदी सालाना की दर से बढ़ सकती है. आइये जानते हैं कि कॉपर की ट्रेडिंग कैसी की जा सकती है.
कॉपर में ट्रेड करने के मुख्य तरीके
कॉपर फ्यूचर्स
कॉपर की ट्रेडिंग मुख्य रूप से मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के जरिए होती है. फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में ट्रेडर भविष्य की तारीख के लिए तय कीमत पर कॉपर खरीदने या बेचने का सौदा करते हैं. कीमतों में उतार-चढ़ाव का फायदा उठाकर ट्रेडर मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं. शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स के लिए यह सबसे सीधा तरीका है जहां लीवरेज के साथ कीमतों पर दांव लगाया जाता है. कॉन्ट्रैक्ट तय साइज (जैसे 1 टन या 250 किलो) में होते हैं.
कॉपर से जुड़े शेयरों में निवेश
इसके अलावा निवेशक कॉपर से जुड़े शेयरों में भी निवेश कर सकते हैं. निवेशक कॉपर माइनिंग या प्रोसेस करने वाली कंपनियों के शेयर खरीदकर अप्रत्यक्ष तरीके से कॉपर में निवेश कर सकते है. जब कॉपर की कीमत बढ़ती है तो इन कंपनियों के मुनाफे और शेयरों में भी तेजी आ सकती है.
कॉपर ETF
कुछ निवेशक कॉपर ETF के जरिए भी निवेश करते हैं, जिससे बिना फ्यूचर्स ट्रेड किए मेटल की कीमत में हिस्सेदारी मिलती है. भारत में अभी कॉपर के लिए कोई ETF नहीं है. ग्लोबली Global X Copper Miners ETF, United States Copper Index Fund और iShares Copper and Metals Mining ETF अलग-अलग तरीके से कॉपर में एक्सपोजर देते हैं. भारतीय निवेशक Liberalised Remittance Scheme (LRS) के तहत ओवरसीज इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म्स के जरिए इन ग्लोबल ETF में निवेश कर सकते हैं. वहीं ऑप्शंस ट्रेडिंग के जरिए भी कीमतों के उतार-चढ़ाव पर दांव लगाया जा सकता है, हालांकि यह नए निवेशकों के लिए थोड़ा जटिल होता है.
कॉन्ट्रैक्ट फॉर डिफरेंस
CFD (कॉन्ट्रैक्ट फॉर डिफरेंस) के जरिए भी कॉपर ट्रेडिंग की जा सकती है. फिजिकल मेटल खरीदे बिना यह कीमतों में उतार-चढ़ाव पर ट्रेड करने का तरीका है.
क्यों कहा जा रहा है ‘अगला सिल्वर’
कॉपर में हाल फिलहाल में कुछ गिरावट देखने को मिली है, लेकिन 1 साल का रिटर्न अभी भी 36 फीसदी है. कॉपर का मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजली के तार, मोटर, पवन टर्बाइन और इलेक्ट्रिक वाहनों में व्यापक इस्तेमाल होता है. चांदी महंगा होने से अब कई इंडस्ट्री अपने प्रोडक्ट बनाने में कॉपर का इस्तेमाल बढ़ा रही हैं. सोलर पैनल, चिप, सेमी कंडक्टर और एआई टूल्स बनाने में भी चांदी और कॉपर का इस्तेमाल होता है. इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक घरेलू उत्पादन में उतार-चढ़ाव और खदानों में गिरती ग्रेड क्वालिटी के कारण सप्लाई पर दबाव बढ़ रहा है. कई खदानों में कॉपर का औसत प्रॉडक्शन सिर्फ 0.4-0.6% रह गई है, जिससे उत्पादन महंगा हो रहा है. वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में मांग तेजी से बढ़ रही है. डेटा सेंटर, पावर केबल, ट्रांसफॉर्मर और कूलिंग सिस्टम में कॉपर की खपत बढ़ रही है. 2025 में कॉपर की कीमतों में सालाना आधार पर करीब 32% की तेजी दर्ज की गई थी. अगर सप्लाई सीमित रहती है और मांग बढ़ती रहती है, तो कॉपर की कीमतें मजबूत रह सकती हैं.
कॉपर की कीमत
कॉपर की कीमतें अपने रिकॉर्ड हाई से काफी नीचे आ चुकी है लेकिन कॉमिक्स पर इसमें तेजी देखने को मिल रही है. कॉमेक्स पर कॉपर $5.7520 प्रति पाउंड पर आ गया है. इसके अलावा मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया यानी एमसीएक्स पर शुक्रवार को कॉपर 1163 रुपये प्रति किलो पर ट्रेड कर रहा था.
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