अमेरिका के टैरिफ मार से कैसे बच निकली Waaree Energies, 60 हजार करोड़ का ऑर्डर बुक, जानें स्टॉक का भी हाल
वैश्विक व्यापार में नियम बदलते ही कई कंपनियां मुश्किल में आ जाती हैं, लेकिन कुछ अपने फैसलों से हालात को संभाल लेती हैं. सोलर सेक्टर में भी ऐसी ही एक भारतीय कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अलग रास्ता अपनाया है.
अमेरिका जैसे बड़े और सख्त नियमों वाले बाजार में टिके रहना किसी भी भारतीय कंपनी के लिए आसान नहीं होता. खासकर तब, जब ऊंचे टैरिफ अचानक व्यापार की पूरी गणित बिगाड़ दें. लेकिन भारत की सबसे बड़ी सोलर पैनल एक्सपोर्टर कंपनियों में शामिल वॉरी एनर्जी ने ऐसे ही मुश्किल हालात में अपनी रणनीति से न सिर्फ नुकसान से बचाव किया, बल्कि अमेरिकी बाजार में अपनी पकड़ भी बनाए रखी.
अमेरिकी टैरिफ के मार से कैसे बचा वॉरी
अमेरिका ने सोलर पैनल आयात पर टैरिफ इस आधार पर लगाए कि पैनल में इस्तेमाल होने वाले सोलर सेल किस देश से आए हैं, न कि पैनल कहां असेंबल हुए हैं. भारत से आने वाले सोलर सेल पर भारी टैरिफ लागू हुआ, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका को निर्यात महंगा हो गया. ऐसे में कई कंपनियों को झटका लगा, लेकिन वॉरी एनर्जी ने इस नियम को ठीक से समझकर अपनी रणनीति बदली.
वॉरी एनर्जी ने सोलर पैनल बनाने के लिए जरूरी सोलर सेल भारत की जगह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से मंगाए. कंबोडिया, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों पर अमेरिका का टैरिफ भारत की तुलना में काफी कम है. यही वजह रही कि वॉरी अमेरिकी टैरिफ के बड़े असर से बच सका. कंपनी के मैनेजमेंट ने निवेशकों से बातचीत में साफ कहा कि सेल कहां से खरीदे जा रहे हैं, यह टैरिफ तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है.
अमेरिका में ही असेंबलिंग का फायदा
वॉरी एनर्जी ने अमेरिका में भी सोलर पैनल असेंबली की सुविधा तैयार कर रखी है. वहां कंपनी की सालाना 1.6 गीगावॉट की क्षमता वाली मैन्युफैक्चरिंग लाइन है, जो इंपोर्ट किए गए सोलर सेल पर काम करती है. दिसंबर तिमाही में कंपनी ने अमेरिका में करीब 275 मेगावॉट के लोकल मॉड्यूल और 300 मेगावॉट के आयातित मॉड्यूल बेचे. इस रणनीति से वॉरी को अमेरिकी ग्राहकों के करीब रहने और लॉजिस्टिक्स लागत घटाने में भी मदद मिली.
अमेरिका में ज्यादा मुनाफा
वॉरी एनर्जी के लिए अमेरिका ज्यादा कमाई वाला बाजार है. भारत में जहां कंपनी सोलर मॉड्यूल 18 से 24 रुपये प्रति वॉट के भाव पर बेचती है, वहीं अमेरिका में उसे करीब 25 से 27 रुपये प्रति वॉट तक मिलते हैं. यही वजह है कि कंपनी की कुल आय का लगभग एक-तिहाई हिस्सा विदेशों से आता है, जिसमें सबसे बड़ा योगदान अमेरिका का है. दिसंबर तिमाही में कंपनी की कुल आय 7,565 करोड़ रुपये रही.
वॉरी एनर्जी के पास भारत में सोलर मॉड्यूल बनाने की बड़ी क्षमता है, लेकिन सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता अपेक्षाकृत कम है. आमतौर पर इसे कमजोरी माना जाता है, लेकिन अमेरिकी टैरिफ के दौर में यही बात वॉरी के लिए फायदा बन गई. सेल आयात करने की मजबूरी ने कंपनी को अलग-अलग देशों से सोर्सिंग का विकल्प दिया और टैरिफ का असर सीमित रखा.
बड़ा ऑर्डर बुक और स्टॉक का हाल
कंपनी के मुताबिक उसकी करीब 60,000 करोड़ रुपये की ऑर्डर बुक में से 65 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से है. यह दिखाता है कि वैश्विक ग्राहक वॉरी पर भरोसा कर रहे हैं. विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका में असेंबली प्लांट और लचीली सप्लाई चेन की वजह से वॉरी को न सिर्फ टैरिफ संकट से राहत मिली, बल्कि उसकी प्रति यूनिट कमाई भी बेहतर हुई.
कंपनी के शेयरों की बात करें तो बीते तीन महीने में ये 5 फीसदी तक लुढ़क गए हैं, वहीं पांच वर्षों में इसने 27 फीसदी तक का मुनाफा दिया है. गुरुवार को कंपनी के शेयर मामूली गिरावट के साथ 3171 रुपये पर बंद हुए.
डिस्क्लेमर: Money9live किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है. यहां पर केवल स्टॉक्स की जानकारी दी गई है. निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें.