हाईवे सेक्टर में बड़ा बदलाव! अब पेंशन फंड सीधे बनाएंगे सड़कें, EPC कंपनियों की लग सकती है लॉटरी
भारत सरकार ने हाईवे सेक्टर में बड़ा नीतिगत बदलाव करते हुए पेंशन फंड और सॉवरेन वेल्थ फंड को सीधे BOT हाईवे प्रोजेक्ट्स में निवेश की अनुमति दे दी है. अब निवेशकों को निर्माण अनुभव की जरूरत नहीं होगी और EPC कंपनियां सड़क निर्माण का काम संभालेंगी. इस फैसले से IRB Infrastructure, KNR Constructions, PNC Infratech, Dilip Buildcon और Larsen & Toubro जैसी कंपनियों को बड़ा फायदा मिल सकता है.
NHAI New Policy: भारत के हाईवे सेक्टर में सरकार ने एक बड़ा नीतिगत बदलाव किया है, जो आने वाले वर्षों में देश के इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल को पूरी तरह बदल सकता है. अब पेंशन फंड, सॉवरेन वेल्थ फंड और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निवेशक सीधे BOT यानी बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर हाईवे प्रोजेक्ट्स में निवेश कर सकेंगे. सबसे बड़ी बात यह है कि इन निवेशकों को अब खुद निर्माण क्षेत्र का अनुभव होना जरूरी नहीं होगा. वे EPC कंपनियों को हायर करके सड़क निर्माण का काम करवा सकेंगे.
यह बदलाव केवल नियमों में मामूली संशोधन नहीं, बल्कि भारत के हाईवे सेक्टर के बिजनेस मॉडल में बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव माना जा रहा है. अब तक BOT प्रोजेक्ट्स में वही कंपनियां हिस्सा ले सकती थीं, जो खुद फाइनेंसिंग, निर्माण, संचालन और टोल कलेक्शन जैसे सभी काम संभालती थीं. इस मॉडल में कंपनियों की बड़ी पूंजी लंबे समय तक फंसी रहती थी, जिससे कई रोड डेवलपर्स पर कर्ज का दबाव बढ़ता गया.
क्या बदला है नई पॉलिसी में
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने नया फ्रेमवर्क जारी किया है, जिसके तहत नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी NHAI द्वारा जारी BOT प्रोजेक्ट्स में अब वित्तीय निवेशक भी सीधे बोली लगा सकेंगे. पहले निर्माण कंपनियों को ही पूरा प्रोजेक्ट संभालना पड़ता था. यानी सड़क बनाने से लेकर कई वर्षों तक उसे ऑपरेट करना और टोल वसूली तक की जिम्मेदारी उन्हीं के पास रहती थी. इससे कंपनियों की बैलेंस शीट पर भारी दबाव बनता था.
नई व्यवस्था में अब दो बड़े हिस्से अलग कर दिए गए हैं –
- कैपिटल ओनरशिप
- कंस्ट्रक्शन एग्जीक्यूशन
यानी निवेशक केवल पूंजी लगाएंगे और निर्माण का काम EPC कंपनियां करेंगी.
क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है यह बदलाव?
दुनिया के कई देशों जैसे कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में यह मॉडल पहले से सफल माना जाता है. वहां पेंशन फंड और सॉवरेन फंड इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट्स के मालिक होते हैं, जबकि निर्माण कंपनियां केवल प्रोजेक्ट बनाती हैं. भारत में भी CPPIB, ADIA, GIC और OTPP जैसे बड़े वैश्विक निवेशक पहले से इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निवेश कर चुके हैं, लेकिन अब तक वे ज्यादातर तैयार टोल रोड और InvITs में पैसा लगाते थे. नई नीति के बाद अब ये निवेशक ग्रीनफील्ड हाईवे प्रोजेक्ट्स में शुरुआती स्तर से निवेश कर सकेंगे, जहां रिटर्न की संभावना ज्यादा मानी जाती है.
किन कंपनियों को मिल सकता है सबसे ज्यादा फायदा?
इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा EPC कंपनियों को मिल सकता है. पहले कई EPC कंपनियां BOT प्रोजेक्ट्स से दूरी बनाकर रखती थीं, क्योंकि इसमें लंबे समय तक पूंजी फंसी रहती थी. अब वित्तीय निवेशक प्रोजेक्ट जीतकर निर्माण का काम अलग से EPC कंपनियों को सौंप सकेंगे.
IRB Infrastructure Developers, KNR Constructions, PNC Infratech और Dilip Buildcon जैसी कंपनियां इस बदलाव से सबसे ज्यादा फायदा उठा सकती हैं. वहीं बड़े प्रोजेक्ट्स में Larsen & Toubro जैसी कंपनियों की भूमिका भी मजबूत हो सकती है.
हाईवे सेक्टर में आ सकता है बड़ा बदलाव
एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत का हाईवे सेक्टर अब धीरे-धीरे बिल्डर-लेड मॉडल से कैपिटल-लेड मॉडल की ओर बढ़ रहा है. यदि नई नीति का सफल क्रियान्वयन होता है, तो आने वाले वर्षों में देश में हाईवे निर्माण के लिए पूंजी जुटाना काफी आसान हो सकता है. इसके अलावा EPC कंपनियों को अब बिना ज्यादा कर्ज उठाए बड़े ऑर्डर मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है, जिससे पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में नई तेजी देखने को मिल सकती है.
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डिस्क्लेमर: Money9live किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है. यहां पर केवल स्टॉक्स की जानकारी दी गई है. निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें.
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