रिकॉर्ड लो लेवल पर रुपया! डॉलर के मुकाबले पहुंचा 92.49, जानें पिछले 5 साल में कब-कब फिसली भारतीय करेंसी
अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव की वजह से ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता बनी हुई है. खासतौर पर Strait of Hormuz पर सभी की नजर है, क्योंकि दुनिया की करीब 20 प्रतिशत ऊर्जा सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. हालांकि भारत के लिए राहत की बात यह रही कि भारत आने वाले दो एलपीजी टैंकर इस समुद्री मार्ग से सुरक्षित गुजर गए.
डॉलर के मुकाबले रुपया का गिरना फिर चिंता का विषय माना जा रहा है. सोमवार 16 मार्च को भारतीय रुपया रिकॉर्ड लो पर पहुंच गया. कारोबार के दौरान रुपया 92.49 प्रति डॉलर पर पहुंच गया. हालांकि, बाजार बंद होने तक यह 92.42 पर आ गया. पिछले हफ्ते रुपये पर लगातार दबाव बना रहा और यह कई बार नए निचले स्तर पर पहुंचा. जानकारों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें जल्दी नहीं घटतीं तो मार्च के अंत तक रुपया 93 प्रति डॉलर के स्तर तक कमजोर हो सकता है.
कच्चे तेल की कीमतें बनी चिंता
ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं. अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड करीब 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है. 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 40 प्रतिशत की तेजी आ चुकी है, जिससे भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर दबाव बढ़ गया है.
होर्मुज जलडमरूमध्य पर नजर
अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी तनाव के कारण ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता बनी हुई है. खासतौर पर Strait of Hormuz पर सभी की नजर है, क्योंकि दुनिया की करीब 20 प्रतिशत एनर्जी सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. हालांकि भारत के लिए राहत की बात यह रही कि भारत आने वाले दो एलपीजी टैंकर इस समुद्री मार्ग से सुरक्षित गुजर गए. यह रास्ता भारत के लिए बेहद अहम है क्योंकि भारत की 40 प्रतिशत से ज्यादा कच्चे तेल की सप्लाई और करीब 80 प्रतिशत गैस सप्लाई इसी मार्ग से आती है.
RBI के हस्तक्षेप से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव
रुपये को ज्यादा गिरने से बचाने के लिए Reserve Bank of India लगातार बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है. केंद्रीय बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार 6 मार्च को खत्म हुए हफ्ते में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 716.81 अरब डॉलर रह गया, जो इससे पहले वाले हफ्ते में 728.49 अरब डॉलर था.
93 के स्तर तक जा सकता है रुपया
जानकारों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें जल्दी नहीं घटतीं तो मार्च के अंत तक रुपया 93 प्रति डॉलर के स्तर तक कमजोर हो सकता है.
क्या है जानकारों की राय?
HDFC Securities के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट, दिलीप परमार के अनुसार, हफ्ते की शुरुआत में रुपये को घरेलू शेयर बाजार में रिकवरी और डॉलर में नरमी से थोड़ी मजबूती मिली है. हालांकि आयात करने वालों की लगातार डॉलर मांग और विदेशी निवेश की निकासी के कारण रुपया अब भी निचले स्तर के आसपास बना हुआ है. टेक्निकल लेवल की बात करें तो आने वाले सत्रों में USDINR में 92.60 के आसपास रेजिस्टेंस और 92.05 के आसपास सपोर्ट देखने को मिल सकता है.
वहीं, LKP Securities के वीपी रिसर्च एनालिस्ट (कमोडिटी और करेंसी) जतीन त्रिवेदी के मुताबिक, भारतीय रुपया फिलहाल दबाव में बना हुआ है और डॉलर के मुकाबले करीब 92.33 के आसपास कारोबार कर रहा है. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी इसकी बड़ी वजह है, क्योंकि तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ जाता है और इससे रुपये पर दबाव पड़ता है. उन्होंने कहा कि बाजार के निवेशक इस हफ्ते आने वाले US Federal Reserve के ब्याज दर फैसले को लेकर भी सतर्क हैं. इस फैसले का असर वैश्विक डॉलर की चाल और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ सकता है. इसके अलावा Strait of Hormuz के रास्ते तेल और गैस की सप्लाई में संभावित बाधा को लेकर भी चिंता बनी हुई है, जिससे बाजार का माहौल थोड़ा नाजुक है. अगर जियो पॉलिटिकल टेंशन जारी रहता है तो रुपये पर आगे भी दबाव बना रह सकता है.
पिछले 5 साल में कब-कब कमजोर हुआ रुपया?
साल 2020 (कोविड का दौर)
कोरोना महामारी के दौरान वैश्विक अनिश्चितता और विदेशी पूंजी के आउटफ्लो के कारण भारतीय रुपया कमजोर हुआ. उस समय यह करीब 75.39 प्रति डॉलर तक फिसल गया, जबकि 2019 में यह लगभग 72–73 प्रति डॉलर के आसपास था.
साल 2022
अमेरिकी केंद्रीय बैंक Federal Reserve की आक्रामक ब्याज दर बढ़ोतरी और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के चलते रुपये पर दबाव बढ़ा. इस दौरान रुपया गिरकर करीब 82.86 प्रति डॉलर तक पहुंच गया.
साल 2023
2023 में भी रुपये पर दबाव बना रहा, हालांकि इसमें अपेक्षाकृत स्थिरता देखने को मिली. इस दौरान रुपया लगभग 81 से 83 प्रति डॉलर के दायरे में कारोबार करता रहा.
साल 2024
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय मुद्रा ने कुछ मजबूती दिखाई और साल के दौरान रुपया करीब 82.78 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया.
साल 2025
2025 की पहली छमाही में रुपया 82.80 से 83.60 प्रति डॉलर के बीच बना रहा. हालांकि साल के अंत तक इसमें तेज गिरावट देखने को मिली और दिसंबर 2025 तक रुपया 90 प्रति डॉलर के पार निकल गया.
रुपये की गिरावट रोकने के लिए RBI ने बेचे डॉलर
साल 2025 में रुपये में तेज उतार-चढ़ाव को देखते हुए Reserve Bank of India ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगस्त 2025 में केंद्रीय बैंक ने करीब 7.7 अरब डॉलर बेचे, ताकि रुपये में अत्यधिक गिरावट और अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सके. इस कदम का मकसद विदेशी मुद्रा बाजार को स्थिर रखना और रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम करना था.
रुपये के कमजोर होने से किन्हें होता है नुकसान
रुपये की कमजोरी का सबसे ज्यादा असर उन कंपनियों पर पड़ता है जो आयात (इंपोर्ट) पर ज्यादा निर्भर होती हैं. ऐसी कंपनियों को डॉलर में अधिक भुगतान करना पड़ता है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है और मुनाफे पर दबाव आता है. इसका प्रभाव खासतौर पर तेल कंपनियों (OMCs), एयरलाइंस, इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल आयात करने वाली कंपनियों, कैपिटल गुड्स या मशीनरी इंपोर्ट करने वाली कंपनियों और सोना आयात करने वाली ज्वेलरी कंपनियों पर पड़ता है. रुपये की कमजोरी का असर आम लोगों पर भी पड़ता है. इसके कारण पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और विदेश यात्रा जैसी चीजें महंगी हो जाती हैं.
