IPO मार्केट में होने वाला है बड़ा बदलाव! Sebi लाने जा रहा नया प्राइस डिस्कवरी रूल

सेबी ने आईपीओ और री-लिस्टेड स्टॉक्स में प्राइस डिस्कवरी प्रोसेस को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए नए नियमों का प्रस्ताव दिया है. रेगुलेटर ने डमी प्राइस बैंड, बेस प्राइस और प्री-ओपन कॉल ऑक्शन मैकेनिज्म में बदलाव सुझाए हैं, ताकि लिस्टिंग के दौरान होने वाली असामान्य वोलैटिलिटी और गलत प्राइस डिस्कवरी को रोका जा सके. नए प्रस्तावों के तहत री-लिस्टेड स्टॉक्स के लिए इंडिपेंडेंट वैल्यूएशन, आईपीओ प्राइस बैंड फ्लेक्सिंग और एसएमई आईपीओ में भी फ्लेक्सिबिलिटी लागू करने की बात कही गई है.

सेबी का नया फ्रेमवर्क. Image Credit: Getty image

Sebi New Rules: सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया यानी Sebi ने IPOs और रि-लिस्टेड स्टॉक्स में प्राइस डिस्कवरी प्रोसेस को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा है. Sebi का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में कई कमियां हैं, जिसकी वजह से लिस्टिंग के शुरुआती घंटों में शेयरों की कीमतों में तेजी से उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है. यही कारण है कि रेगुलेटर अब प्री-ओपन कॉल ऑक्शन मैकेनिज्म में व्यापक सुधार करना चाहता है. Sebi ने कहा है कि मौजूदा “डमी प्राइस बैंड” सिस्टम और बेस प्राइस तय करने की प्रक्रिया सही प्राइस डिस्कवरी में बाधा बन रही है. रेगुलेटर के मुताबिक, कई मामलों में निवेशकों के बाय ऑर्डर्स केवल इसलिए रिजेक्ट हो गए, क्योंकि वे तय प्राइस बैंड के बाहर थे. Sebi ने एक उदाहरण का हवाला देते हुए बताया कि एक मामले में कॉल ऑक्शन सेशन के दौरान करीब 90 फीसदी बाय ऑर्डर्स रिजेक्ट हो गए थे.

रि-लिस्टेड स्टॉक्स के लिए नए नियम

Sebi ने उन कंपनियों के लिए भी नए नियम प्रस्तावित किए हैं, जिनके शेयर लंबे समय बाद दोबारा बाजार में सूचीबद्ध होते हैं. नए प्रस्ताव के मुताबिक, किसी रि-लिस्टेड शेयर का लेटेस्ट ट्रेडेड प्राइस छह महीने से ज्यादा पुराना नहीं होना चाहिए. अगर ऐसा प्राइस उपलब्ध नहीं है, तो बेस प्राइस तय करने के लिए इंडिपेंडेंट वैल्यूएशन एजेंसियों के वैल्यूएशन सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया जाएगा.

इसके अलावा, यदि किसी कंपनी के शेयर छह महीने से ज्यादा समय तक सस्पेंशन के बाद दोबारा लिस्ट होते हैं, तो दो इंडिपेंडेंट वैल्यूअर्स द्वारा तय बुक वैल्यू में से कम कीमत को बेस प्राइस माना जाएगा. Sebi का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निवेशकों को शेयरों की वास्तविक और उचित कीमत मिले.

IPO प्राइस डिस्कवरी में भी बड़ा बदलाव

Sebi ने IPO स्टॉक्स के लिए भी नए फ्लेक्सिंग मैकेनिज्म का प्रस्ताव दिया है. फिलहाल IPO स्टॉक्स में डमी प्राइस बैंड, बेस प्राइस से माइनस 50 फीसदी से लेकर प्लस 100 फीसदी तक होता है. वहीं SME IPOs में प्लस-माइनस 90 फीसदी का बैंड लागू है, लेकिन वहां फ्लेक्सिबिलिटी नहीं है.

अब Sebi चाहता है कि यदि इंडिकेटिव इक्विलिब्रियम प्राइस ऊपरी या निचली सीमा के करीब पहुंचे, तो स्टॉक एक्सचेंजेज प्राइस बैंड को अपने आप 10 फीसदी तक बढ़ा सकें. इसके अलावा, यदि केवल ऊपरी या निचली सीमा पर ही बाय या सेल ऑर्डर्स जमा होते हैं, तो एक्सचेंजेज कम से कम पांच अलग-अलग PAN आधारित निवेशकों के ऑर्डर्स की पुष्टि के बाद प्राइस बैंड को और विस्तारित कर सकेंगे.

SME IPOs पर भी फोकस

रेगुलेटर ने SME IPO सेगमेंट में भी फ्लेक्सिंग मैकेनिज्म लागू करने का प्रस्ताव रखा है. Sebi का मानना है कि SME सेगमेंट में वोलैटिलिटी काफी अधिक रहती है, इसलिए वहां प्राइस डिस्कवरी को ज्यादा मजबूत और पारदर्शी बनाने की जरूरत है.

सफल ऑक्शन के लिए नई शर्त

Sebi ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि किसी कॉल ऑक्शन सेशन को तभी सफल माना जाएगा, जब प्राइस डिस्कवरी कम से कम पांच अलग-अलग PAN आधारित बायर्स और सेलर्स के ऑर्डर्स के आधार पर हो. अगर रि-लिस्टेड स्टॉक्स या कॉरपोरेट रिस्ट्रक्चरिंग वाले मामलों में प्राइस डिस्कवरी नहीं हो पाती है, तो कॉल ऑक्शन अगले ट्रेडिंग सेशंस में भी जारी रहेगी, जब तक कि सही इक्विलिब्रियम प्राइस तय नहीं हो जाता.

फिलहाल IPOs और रि-लिस्टेड सिक्योरिटीज के लिए लिस्टिंग के पहले दिन सुबह 9 बजे से 10 बजे तक एक घंटे का प्री-ओपन कॉल ऑक्शन सेशन आयोजित किया जाता है. इसी दौरान शेयरों की शुरुआती कीमत तय होती है. Sebi ने इन प्रस्तावों पर 11 जून तक आम जनता और बाजार सहभागियों से सुझाव मांगे हैं.

यह भी पढ़ें: जियोपॉलिटिकल टेंशन के बीच फार्मा स्टॉक्स ने किया कमाल, एक महीने में आई 31% तक की तेजी; इन कंपनियों ने मचाया धमाल