2003 जैसा संकेत! DII हिस्सेदारी बढ़ी, FPI हिस्सेदारी 17 साल के निचले स्तर पर, आगे क्या हो सकता है?
रिपोर्ट के मुताबिक FPI निवेशकों ने हाई लिक्विडिटी और भीड़भाड़ वाले NIFTY50 शेयरों में हिस्सेदारी घटाई, जबकि ब्रॉडर इंडेक्स में धीरे-धीरे पोजिशन बनाई. Ace Equity डाटा के अनुसार 25 मार्च 2026 तक FPIs ने लगातार चार तिमाहियों से NIFTY50 की चुनिंदा कंपनियों में ही हिस्सेदारी बढ़ाई है.

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी National Stock Exchange (NSE) की मई महीने की मार्केट पल्स रिपोर्ट सामने आ गई है. इस रिपोर्ट में भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों यानी FPI की हिस्सेदारी को लेकर कई अहम बातें सामने आई हैं. रिपोर्ट बताती है कि भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी अब 17 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. हालांकि इसके पीछे सिर्फ बिकवाली नहीं, बल्कि ग्लोबल निवेश रणनीति में बदलाव भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है.
FY26 में लगातार बिकवाली करते रहे FPI
रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने पूरे FY26 के दौरान भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली की. FY26 में FPIs ने कुल 19 अरब डॉलर के शेयर बेचे. इसमें से करीब 72 फीसदी बिकवाली सिर्फ FY26 की आखिरी तिमाही में हुई. इस भारी बिकवाली के बाद NSE में लिस्टेड कंपनियों में FPI की हिस्सेदारी घटकर 15.8 फीसदी रह गई है. यह लगातार गिरावट के बाद 17 साल का सबसे निचला स्तर है.
आखिर क्यों घट रही है FPI हिस्सेदारी?
- रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे कई ग्लोबल कारण हैं.
- विदेशी निवेशकों को एशिया के दूसरे उभरते बाजार जैसे South Korea, Taiwan, Japan और Hong Kong अपेक्षाकृत सस्ते नजर आए.
- इसके अलावा बॉन्ड यील्ड बढ़ने से निवेशकों ने जोखिम वाले एसेट्स से पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों जैसे अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की ओर रुख किया.
- हालांकि दिलचस्प बात यह है कि भारी बिकवाली के बावजूद 2020 से अब तक FPI निवेश की वैल्यू में 18 फीसदी से ज्यादा CAGR ग्रोथ दर्ज की गई है.
किन सेक्टरों में बिकवाली ज्यादा हुई?
- NSE रिपोर्ट के अनुसार, FPIs ने इंडस्ट्रियल सेक्टर में अपनी हिस्सेदारी घटाई.
- वहीं कंज्यूमर स्टेपल्स और IT सेक्टर में बिकवाली का दबाव थोड़ा कम रहा.
फाइनेंशियल सेक्टर पर भरोसा कायम
FPIs ने फाइनेंशियल सेक्टर में ओवरवेट पोजिशन बनाए रखी, हालांकि मार्च 2026 तक इसमें थोड़ी कटौती जरूर की गई. कम्युनिकेशन सेक्टर में लगातार 17वीं तिमाही तक ओवरवेट पोजिशन जारी रही. वहीं मटेरियल सेक्टर में FPIs ने अंडरवेट रुख बनाए रखा, जबकि एनर्जी सेक्टर में न्यूट्रल पोजिशन बरकरार रही. इसके अलावा कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी, हेल्थकेयर और यूटिलिटीज सेक्टर में भी FPIs का रुख न्यूट्रल रहा.
बड़ी बिकवाली के बावजूद बाजार संभाल रहे DII
रिपोर्ट में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जहां FPIs ने FY26 में 19.7 अरब डॉलर की बिकवाली की, वहीं घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने 95.8 अरब डॉलर की भारी खरीदारी की. यानी DII की खरीदारी FPI बिकवाली से करीब पांच गुना ज्यादा रही. इससे भारतीय बाजार को बड़ी गिरावट से बचाने में मदद मिली.
NIFTY50 से दूरी, मिडकैप में दिलचस्पी
रिपोर्ट के मुताबिक FPI निवेशकों ने हाई लिक्विडिटी और भीड़भाड़ वाले NIFTY50 शेयरों में हिस्सेदारी घटाई, जबकि ब्रॉडर इंडेक्स में धीरे-धीरे पोजिशन बनाई. Ace Equity डाटा के अनुसार 25 मार्च 2026 तक FPIs ने लगातार चार तिमाहियों से NIFTY50 की चुनिंदा कंपनियों में ही हिस्सेदारी बढ़ाई है. दूसरी तरफ 10 कंपनियों में लगातार चार तिमाहियों से हिस्सेदारी घटाई गई है. इससे संकेत मिलता है कि FPIs फिलहाल NIFTY50 और स्मॉलकैप शेयरों को लेकर ज्यादा सतर्क हैं, जबकि मिडकैप शेयरों पर उनका रुख अपेक्षाकृत न्यूट्रल बना हुआ है.
आगे क्या हो सकता है?
- Q4FY26 तक NSE में लिस्टेड कंपनियों में DII की हिस्सेदारी 19.6 फीसदी रही, जो लगातार छह तिमाहियों से FPI हिस्सेदारी से ज्यादा है. ऐसा आखिरी बार 2003 में देखा गया था. उसके बाद विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में जोरदार वापसी की थी और अगले 12 महीनों में बाजार में करीब 70 फीसदी की तेजी आई थी.
- हालांकि इतिहास हर बार खुद को दोहराए, यह जरूरी नहीं है. लेकिन जानकारों का मानना है कि भारतीय बाजार में FPIs की कम हिस्सेदारी भविष्य में उनकी वापसी की मजबूत संभावना बना सकती है, खासकर अगर वैल्यूएशन आकर्षक रहे और कंपनियों की कमाई मजबूत बनी रही.
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