हर शेयर का क्यों नहीं होता फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस? कौन से स्टॉक्स F&O में किए जाते हैं शामिल?
Futures and Options: F&O में लेवरेज मिलता है और कम पूंजी में बड़ी पोजिशन ली जा सकती है. आखिर हर शेयर को F&O सेगमेंट में जगह क्यों नहीं मिलती? और किसी कंपनी के शेयर को F&O में शामिल करने के लिए क्या-क्या देखा जाता है?
Highlights
- सिर्फ शेयर का मार्केट कैप बड़ा होना काफी नहीं है.
- F&O में शामिल करने के लिए कई कड़े स्टैंडर्ड को पूरा करना जरूरी.
- कड़े नियम के पीछे बड़ा कारण है निवेशकों और बाजार की सुरक्षा.
शेयर बाजार में आपने अक्सर सुना होगा कि किसी शेयर में फ्यूचर्स & ऑप्शन्स (F&O) की ट्रेडिंग होती है. जबकि किसी दूसरे शेयर में सिर्फ कैश मार्केट में खरीद-बिक्री की जा सकती है. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर हर शेयर को F&O सेगमेंट में जगह क्यों नहीं मिलती? और किसी कंपनी के शेयर को F&O में शामिल करने के लिए क्या-क्या देखा जाता है?
कड़े स्टैंडर्ड और नियम
दरअसल, F&O में शेयरों को शामिल करना सिर्फ कंपनी के बड़ा या लोकप्रिय होने पर निर्भर नहीं करता. इसके पीछे लिक्विडिटी, ट्रेडिंग वॉल्यूम, मार्केट कैपिटलाइजेशन, डिलीवरी वैल्यू और बाजार में पोजिशन लेने की क्षमता जैसे कई मानदंड होते हैं. NSE के मौजूदा नियमों के मुताबिक, किसी नए शेयर को F&O में शामिल करने के लिए कई कड़े स्टैंडर्ड को पूरा करना जरूरी है.
F&O क्या होता है?
F&O यानी Futures and Options, डेरिवेटिव मार्केट का हिस्सा है. इसमें ट्रेडर शेयर को सीधे खरीदने के बजाय उसके भविष्य के भाव पर कॉन्ट्रैक्ट खरीदते या बेचते हैं. फ्यूचर्स में तय कीमत और भविष्य की तारीख पर खरीदने या बेचने का कॉन्ट्रैक्ट होता है, जबकि ऑप्शन में खरीदार को किसी कीमत पर खरीदने या बेचने का अधिकार मिलता है, लेकिन बाध्यता नहीं होती.
इस वजह से F&O में लेवरेज मिलता है और कम पूंजी में बड़ी पोजिशन ली जा सकती है. यही कारण है कि इसमें जोखिम भी कैश मार्केट की तुलना में काफी अधिक हो सकता है.
F&O में किस तरह के शेयर शामिल किए जाते हैं?
सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात ये है कि शेयर का बड़ा और पर्याप्त रूप से एक्टिव मार्केट होना जरूरी है. NSE के मौजूदा सिलेक्शन स्टैंडर्ड के अनुसार, नए F&O शेयर को पिछले छह महीनों के रोलिंग आधार पर एवरेज डेली मार्केट कैपिटलाइजेशन और एवरेज डेली ट्रेडेड वैल्यू के मामले में टॉप 500 शेयरों में होना चाहिए.
शेयर में पर्याप्त ट्रेडिंग होनी चाहिए
F&O के लिए सबसे जरूरी चीजों में से एक लिक्विडिटी है. अगर किसी शेयर में ट्रेडिंग बहुत कम होती है, तो बड़े निवेशक आसानी से अपनी पोजिशन नहीं बना या बंद कर पाएंगे. इससे कीमत में अचानक बड़ा उतार-चढ़ाव आ सकता है. इसलिए एक्सचेंज ऐसे शेयरों को प्राथमिकता देता है जिनमें पर्याप्त ट्रेडिंग गतिविधि हो.
शेयर का साइज और ट्रेडिंग वैल्यू पर्याप्त हो
सिर्फ शेयर का मार्केट कैप बड़ा होना काफी नहीं है. उसके शेयर में लगातार पर्याप्त ट्रेडिंग वैल्यू भी होनी चाहिए. इसीलिए NSE पिछले छह महीनों के औसत डेली मार्केट कैपिटलाइजेशन और ट्रेडेड वैल्यू को देखता है.
मार्केट वाइ़ड पोजिशन लिमिट (MWPL)
यह F&O बाजार का एक बेहद महत्वपूर्ण कॉन्सेप्ट है. MWPL बताता है कि किसी शेयर में पूरे बाजार में डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की कितनी अधिकतम ओपन पोजिशन रखी जा सकती है.
NSE के नियमों के अनुसार किसी नए F&O शेयर का MWPL कम से कम 1,500 करोड़ रुपये होना चाहिए. MWPL की गणना में संबंधित शेयर की फ्री-फ्लोट होल्डिंग का भी इस्तेमाल होता है.
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि डेरिवेटिव बाजार में किसी एक शेयर पर अत्यधिक सट्टेबाजी या पोजिशन का कंसंट्रेशन न हो.
Quarter-Sigma Order Size क्या है?
यह थोड़ा टेक्निकल लेकिन महत्वपूर्ण पैमाना है़. आसान भाषा में समझें तो यह बताता है कि शेयर की कीमत में एक निश्चित स्तर का बदलाव लाने के लिए कितने मूल्य के ऑर्डर की जरूरत पड़ती है. NSE के मौजूदा नियमों में Median Quarter-Sigma Order Size कम से कम 75 लाख रुपये होना चाहिए. इससे एक्सचेंज को शेयर की मार्केट डेप्थ और लिक्विडिटी का अंदाजा लगाने में मदद मिलती है.
डिलीवरी भी महत्वपूर्ण
F&O में शामिल होने के लिए शेयर के कैश मार्केट में एवरेज डेली डिलीवरी योग्य वैल्यू भी कम से कम 35 करोड़ रुपये होनी चाहिए. इसकी गणना पिछले छह महीनों के रोलिंग आधार पर की जाती है. इसका मतलब यह है कि सिर्फ इंट्राडे ट्रेडिंग की भारी मात्रा पर्याप्त नहीं है. शेयर में वास्तविक डिलीवरी आधारित गतिविधि भी होनी चाहिए.
आखिर इतने नियम क्यों?
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण निवेशकों और बाजार की सुरक्षा है.
F&O में लेवरेज के कारण छोटी रकम से बड़ी पोजिशन ली जा सकती है. अगर किसी कम लिक्विड शेयर को F&O में डाल दिया जाए, तो कुछ बड़े ट्रेडर्स की गतिविधि से कीमत में बहुत तेज उतार-चढ़ाव आ सकता है.
F&O में कौन-कौन से शेयर होते हैं?
NSE के इंडिविजुअल सिक्योरिटीज F&O सेगमेंट में 200 से अधिक सिक्योरिटीज पर फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध हैं. इनमें आमतौर पर बड़े, ज्यादा ट्रेड होने वाले और पर्याप्त लिक्विडिटी वाले शेयर शामिल होते हैं. उदाहरण के तौर पर बाजार में बैंकिंग, ऑटो, आईटी, फार्मा, ऑयल एंड गैस, मेटल, FMCG और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे क्षेत्रों के कई प्रमुख शेयर F&O में मिलते हैं.
लेकिन किसी शेयर का किसी खास समय पर F&O में होना या न होना NSE की मौजूदा लिस्ट और उस समय की पात्रता से तय होता है. इसलिए किसी स्टॉक की वर्तमान F&O स्थिति जांचने के लिए NSE की आधिकारिक सूची देखना बेहतर है.
मार्केट की क्वालिटी और ट्रेडिंग क्षमता
F&O में शेयरों का चयन किसी कंपनी की लोकप्रियता के आधार पर नहीं, बल्कि मार्केट की क्वालिटी और ट्रेडिंग क्षमता के आधार पर किया जाता है. मार्केट कैप, ट्रेडिंग वैल्यू, लिक्विडिटी, MWPL, क्वार्टर-सिग्मा ऑर्डर साइज और डिलीवरी वैल्यू जैसे पैमाने यह तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं.
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