पेट्रोल के बाद अब डीजल की बारी! सरकार कर रही आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग की तैयारी; जानें कैसे करता है काम

पेट्रोल में एथेनॉल के बाद अब भारत सरकार डीजल में आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग को अनिवार्य बनाने की तैयारी कर रही है. यह बायोफ्यूल डीजल के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है, जिससे प्रदूषण कम करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है. सरकार का मानना है कि डीजल की अधिक खपत को देखते हुए यह कदम देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा.

आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग Image Credit: ai/canva

Isobutanol Blending: भारत सरकार जल्द ही डीजल में आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग को अनिवार्य बना सकती है. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, इस दिशा में तेजी से काम चल रहा है और वर्ष 2026 के भीतर इस पर बड़ा फैसला लिया जा सकता है. सरकार का मानना है कि यह कदम देश की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने और प्रदूषण कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है. शुक्रवार को सीआईआई शिखर सम्मेलन में बोलते हुए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव वी. उमाशंकर ने कहा कि आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग को अनिवार्य बनाने के मुद्दे को गंभीरता से लिया जा रहा है और इस वर्ष के अंत तक इसे लागू किए जाने की उम्मीद है.

क्या होती है आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग

आइसोब्यूटेनॉल एक प्रकार का बायोफ्यूल है, जिसे मुख्य रूप से एथेनॉल की तरह फर्मंटेशन प्रक्रिया के जरिए तैयार किया जाता है. जब इस ईंधन को डीजल में एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है, तो इसे आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग कहा जाता है. सरल शब्दों में कहें तो यह उसी तरह की प्रक्रिया है, जैसे वर्तमान में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाया जाता है, लेकिन यहां डीजल में आइसोब्यूटेनॉल का मिश्रण किया जाएगा.

सरकार क्यों दे रही है इस पर जोर

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव वी. उमाशंकर के अनुसार, देश में डीजल की खपत पेट्रोल की तुलना में लगभग दोगुनी है. ऐसे में यदि डीजल में वैकल्पिक जैव ईंधन का उपयोग बढ़ता है, तो इसका प्रभाव कहीं अधिक बड़ा होगा. इससे विदेशी मुद्रा की बचत होने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी.

क्या वाहन मालिकों को कराना होगा बदलाव

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह माना जा रहा है कि इसके उपयोग के लिए वाहनों के इंजन या एग्जॉस्ट सिस्टम में बड़े बदलाव की जरूरत नहीं होगी. यही कारण है कि इसे व्यावहारिक और तेजी से लागू किए जा सकने वाले विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. सरकार और उद्योग जगत दोनों इस संभावना पर काम कर रहे हैं कि मौजूदा डीजल वाहनों में भी इस मिश्रित ईंधन का उपयोग आसानी से किया जा सके.

100 फीसदी आइसोब्यूटेनॉल से चलने वाले इंजन पर भी रिसर्च

सरकार ने ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई) को ऐसे फ्लेक्स-फ्यूल इंजन पर अध्ययन करने की जिम्मेदारी सौंपी है, जो 100 फीसदी तक आइसोब्यूटेनॉल पर चल सकें. इसके तहत विभिन्न वाहनों का परीक्षण किया जाएगा और यह देखा जाएगा कि लंबे समय तक इस ईंधन के उपयोग का प्रदर्शन और रखरखाव पर क्या असर पड़ता है.

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