Trump Tariffs on India: न रूसी तेल, न अमेरिकी दूध, भारत की इस बात से मुंह फुलाए बैठे हैं ट्रंप!

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों भारत से खफा हैं. भारत को लेकर उनके बयान, पाकिस्तानी सेना के जनरल से मुलाकात और प्रेस ब्रीफिंग में भारत से जुड़े सवालों पर उनके हावभाव बखूबी इसे बयां करते हैं. सवाल यह है कि क्या वाकई ट्रंप भारत के रूसी तेल खरीदने या अमेरिकी दूध नहीं खरीदने से खफा हैं? इसका जवाब जेफरीज की एक रिपोर्ट में मिला है और वजह तीसरी है.

ट्रंप खुद कई बार शांति के Nobel की मांग कर चुके हैं Image Credit: Money9live

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल में भारत, भारतीय और पीएम मोदी से जितने खुश और करीब थे. अब उतने ही खफा और दूर हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ Howdy Modi और नमस्ते ट्रंप जैसे आयोजनों से जो एक गहरी बॉन्डिंग हुई वह भी अब नजर नहीं आती है. आखिर, क्या वजह है कि ट्रंप भारत से इतने खफा है?

क्या वाकई ट्रंप के लिए अमेरिकी एग्रीकल्चर और डेयरी प्रोडक्ट का भारतीय बाजार में पहुंचना इतना अहम है कि वे भारत-अमेरिका के बीच करीब ढाई दशक में विकसित हुए भरोसे और आर्थिक संबंधों को दांव पर लगाने को तैयार हैं. एक तरफ अमेरिका भारत को अपने प्रमुख नॉन-नाटो साझेदारों जैसा दर्जा देने की बात कर रहा है. क्वाड के जरिये ग्लोबल सप्लाई चेन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की मदद चाहता है. वहीं, दूसरी तरफ ट्रंप भारतीय निर्यात पर 50% टैरिफ लाद देते हैं.

बहरहाल, ट्रंप की तरफ से भारत पर 50% टैरिफ को अक्सर एक “प्रोटेक्शनिस्ट इकोनॉमिक मूव” के तौर पर देखा जाता है. लेकिन Jefferies की हालिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह कदम महज व्यापारिक रणनीति नहीं, बल्कि ट्रंप की निजी नाराजगी और अधूरी महत्वाकांक्षाओं का नतीजा है.

जेफरीज की रिपोर्ट में क्या?

भारत की विदेश नीति का एक स्थायी सिद्धांत रहा है कि कोई भी तीसरा पक्ष भारत-पाक विवादों में दखल नहीं देगा. ट्रंप ने 2025 में पहलगाम हमले और उसके बाद हुए सैन्य तनाव को एक मौके की तरह देखा. उनका मकसद था कि वह खुद को ‘पीस मेकर’ बनाकर वैश्विक मंच पर पेश करें. लेकिन, भारत ने ने इसे सिरे से ठुकरा दिया. Jefferies की रिपोर्ट कहती है कि यही ट्रंप की व्यक्तिगत नाराजगी (Personal Pique) का मूल कारण बना और नतीजतन उन्होंने 50% टैरिफ का हथियार चला दिया.

नोबल की महत्वाकांक्षा पड़ी भारी

ट्रंप बार-बार कहते रहे कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराया. पाकिस्तान ने ट्रंप के बयान की सराहना की, लेकिन भारत ने ट्रंप के इस नैरेटिव को मान्यता देने से इन्कार कर दिया. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के रुख ने न सिर्फ ट्रंप को आहत किया, बल्कि उनकी Nobel Peace Prize की महत्वाकांक्षा को भी झटका दिया, जिसे वे महीनों से साध रहे थे. जुलाई में व्हाइट हाउस तक ने यह कहा कि ट्रंप को नोबेल मिलना चाहिए. लेकिन भारत की सख्ती ने उन्हें वह राजनीतिक पूंजी नहीं दी, जिसकी उन्हें तलाश थी.

दूध-तेल सिर्फ कवर स्टोरी

Jefferies का मानता है कि ट्रंप प्रशासन की तरफ से भारत पर 50% टैरिफ के लिए रूसी तेल और अमेरिकी कंपनियों के एग्रो और डेयरी प्रोडक्ट के भारतीय बाजार में जगह को असली वजह को छिपाने के लिए एक कवर स्टोरी की तरह इस्तेमाल किया है. क्योंकि, भारत हमेशा से अपने कृषि सेक्टर को आयात के लिए खोलने से मना करता आया है. यहां तक कि भारत ने अब तक जितने भी FTA किए हैं, किसी में भी भारत ने इस सेक्टर को शामिल नहीं किया है. क्योंकि, यह भारत के करोड़ों लोगों की आजीविका का सवाल है.

इसके अलावा भारत के रूस से तेल की खरीद को भी अमेरिका से समर्थन मिलता रहा है. यहां तक कि खुद अमेरिका इस तेल का खरीदार रहा है. इसके अलावा वॉशिंगटन में बैठे नीति निर्माता यह समझते हैं कि भारत जैसे ही रूस से तेल खरीदना बंद करेगा, ग्लोबल ऑयल मार्केट में भूचाल आ जाएगा. लिहाजा, असली वजह भारत का सीजफायर वाली कहानी को समर्थन नहीं देना है.

मनमर्जी से चल रही विदेश नीति

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस पूरे एपिसोड से एक पैटर्न सामने आता है. ट्रंप की आर्थिक नीतियां अक्सर उनके व्यक्तिगत स्वभाव और राजनीतिक आकांक्षाओं से प्रभावित रही हैं. व्यापार नीति को उन्होंने कई बार कूटनीतिक दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल किया. लेकिन भारत जैसे देश के सामने यह रणनीति उलटी पड़ गई, जहां ‘नो थर्ड-पार्टी’ पॉलिसी किसी भी सूरत में लचीली नहीं हो सकती.