कैसे होती है अफीम की खेती? बीज से लेकर लाइसेंस तक, जानें क्या है सरकारी नियम और प्रक्रिया

अफीम की खेती भारत में पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में होती है. बिना लाइसेंस इसकी खेती करना अपराध है. बीज से लेकर उत्पादन तक हर चरण पर सरकार की निगरानी रहती है. जानिए अफीम की खेती के लिए लाइसेंस कहां से मिलता है, बीज कैसे मिलता है और इससे जुड़े सभी जरूरी नियम.

अफीम की खेती और नियम-कानून Image Credit: @Money9live

Opium Farming and Process: अफीम की खेती को लेकर आम लोगों के मन में कई तरह के सवाल रहते हैं. इसकी वजह यह है कि अफीम का इस्तेमाल एक तरफ जहां दर्द निवारक और अन्य जरूरी दवाइयों के निर्माण में किया जाता है, वहीं दूसरी ओर इसका दुरुपयोग नशे के रूप में भी होता है. इसी कारण भारत में अफीम की खेती को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रखा गया है. बिना अनुमति अफीम उगाना कानूनन अपराध है और इसके लिए सख्त सजा का प्रावधान भी किया गया है.

अफीम की खेती

भारत में अफीम की खेती सरकार द्वारा तय नियमों और शर्तों के तहत ही की जाती है. न तो इसके बीज खुले बाजार में मिलते हैं और न ही कोई भी किसान अपनी मर्जी से इसकी खेती कर सकता है. खेती से लेकर उत्पादन तक, हर कदम पर सरकार की निगरानी रहती है. ऐसे में अगर आप यह जानना चाहते हैं कि अफीम की खेती कैसे होती है और इसके लिए लाइसेंस कहां से मिलता है, तो पूरी प्रक्रिया को समझना बेहद जरूरी है.

अफीम की खेती के लिए लाइसेंस कहां से मिलता है?

अफीम की खेती का लाइसेंस केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन जारी किया जाता है. यह लाइसेंस पूरे देश में नहीं दिया जाता, बल्कि कुछ चयनित राज्यों और जिलों में ही अफीम उगाने की अनुमति होती है. इसके अलावा, किसान कितनी जमीन पर अफीम की खेती करेगा, इसका फैसला भी सरकार ही करती है. हर किसान को सीमित क्षेत्रफल में ही फसल लगाने की अनुमति मिलती है.

लाइसेंस से जुड़ी सभी शर्तें, नियम और आवेदन की जानकारी क्राइम ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स (CBN) की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध होती है. किसान वहीं से आवेदन प्रक्रिया, पात्रता और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. लाइसेंस मिलने के बाद ही किसान कानूनी रूप से अफीम की खेती कर सकता है.

अफीम का बीज कैसे मिलता है?

अफीम के बीज आम बीजों की तरह बाजार में उपलब्ध नहीं होते. जब किसी किसान को सरकारी लाइसेंस मिल जाता है, तब उसे नारकोटिक्स विभाग से जुड़े संस्थानों के माध्यम से ही बीज उपलब्ध कराया जाता है. यानी बीज से लेकर फसल कटाई तक पूरा सिस्टम सरकार के नियंत्रण में रहता है, ताकि किसी भी तरह के दुरुपयोग को रोका जा सके.

अफीम की खेती की शुरुआत कैसे होती है?

अफीम की खेती रबी सीजन में की जाती है, यानी सर्दियों की फसल के रूप में. इसकी बुवाई आमतौर पर अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है. बुवाई से पहले खेत की अच्छी तैयारी करना बेहद जरूरी होता है. इसके लिए जमीन को करीब 3 से 4 बार अच्छी तरह जोता जाता है, ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए.

खेत में फसल की अच्छी बढ़वार के लिए गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट की पर्याप्त मात्रा डाली जाती है. इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों का विकास बेहतर होता है. आमतौर पर एक हेक्टेयर जमीन में 7 से 8 किलो बीज की जरूरत पड़ती है.

उत्पादन को लेकर क्या हैं नियम?

अफीम की खेती में सिर्फ फसल उगाना ही काफी नहीं होता. अगर किसान को लाइसेंस मिला है, तो उसे सरकार द्वारा तय की गई न्यूनतम पैदावार सीमा को पूरा करना भी जरूरी होता है. अगर किसान निर्धारित मात्रा से कम उत्पादन करता है, तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है या भविष्य में उसे खेती की अनुमति नहीं दी जाती. इसी वजह से अफीम की खेती करने वाले किसानों को फसल की देखभाल में कोई लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. सिंचाई, निराई-गुड़ाई और पौधों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है.

क्यों सख्त नियमों में होती है अफीम की खेती?

अफीम से बनने वाली दवाइयां मेडिकल सेक्टर के लिए बेहद जरूरी हैं, लेकिन इसके गलत इस्तेमाल से समाज को गंभीर नुकसान हो सकता है. इसी वजह से सरकार ने इसकी खेती को लाइसेंस, सीमित क्षेत्र और कड़े नियमों के दायरे में रखा है. इससे एक तरफ दवाओं के लिए जरूरी कच्चा माल मिलता है, तो दूसरी तरफ नशे पर भी नियंत्रण बना रहता है. कुल मिलाकर, अफीम की खेती एक सामान्य फसल नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह सरकारी निगरानी और नियमों के तहत की जाने वाली विशेष खेती है. बिना लाइसेंस इसकी खेती करना भारी कानूनी मुसीबत में डाल सकता है, इसलिए इसमें कदम रखने से पहले पूरी प्रक्रिया को समझना बेहद जरूरी है.

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