परदा उठा लेकिन अभी सामने केवल अर्ध सत्य, अमेरिकी ट्रेड डील ऐसे बदलेगी किसानों का फ्यूचर, इन्हें सीधी चुनौती
वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत के किसान पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं. ऐसे में जब पर्दा पूरी तरह उठेगा और समझौते की बारीकियां सामने आएंगी, तब यह और साफ होगा कि यह समझौता भारत के लिए अवसर है या भारतीय कृषि के लिए एक कठिन परीक्षा.
India-USA Trade Agreement Impact On Agriculture: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापार वार्ताओं का एक और परदा उठ गया है. शनिवार 7 फरवरी को तड़के सुबह 6 बजे के करीब केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने X पर पोस्ट कर भारत-अमेरिका के अंतरिम समझौते का फ्रेमवर्क साझा किया, ठीक उसी समय अमेरिका ने भी साझा बयान को शेयर किया. फ्रेमवर्क शेयर होते ही, सबसे पहली सबकी नजरें कृषि क्षेत्र को लेकर किए समझौते को खोज रहीं थी.
अर्ध सत्य है फ्रेमवर्क की शर्तें
आखिरकार किसका दावा सही हुआ , यानी ट्रंप जो 3 फरवरी को ट्रूथ पर पोस्ट कर यह दावा कर चुके थे कि भारत ने कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोल दिया है या फिर भारत सरकार का दावा जो बार-बार यह कह रही थी कि सरकार किसानों के हितों से समझौता नहीं करेगी. खैर अंतरिम समझौता अब सामने आ चुका है. जो विवरण अब तक सार्वजनिक हुए हैं, वे संकेत देते हैं कि अमेरिका ने इस समझौते का इस्तेमाल भारत के कृषि बाजार में गहरी पैठ बनाने के लिए किया है. सरकार का यह दावा कि कृषि को संरक्षित रखा गया है, वह काफी हद तक सही लगता है, क्योंकि भारतीय किसानों के एक बहुत बड़े वर्ग पर इसका निगेटिव असर नहीं होगा. लेकिन इसके बावजूद सरकार का दावा एक अर्ध-सत्य ही लगता है.
कृषि क्षेत्र में भारत का ट्रेडसरप्लस नहीं रह जाएगा ?
हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि क्योंकि फ्रेमवर्क कृषि क्षेत्र के जहां-जहां दरवाजे खोले गए हैं. उससे यह तो साफ है कि भारत का कृषि क्षेत्र में अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस अब खत्म हो सकता है. क्योंकि अभी कृषि और उससे जुड़े उत्पादों में भारत अमेरिका को करीब 6 अरब डॉलर का निर्यात करता है, जबकि करीब 3 अरब डॉलर का आयात करता है. यानी यहां पर भारत करीब 3 अरब डॉलर के सरप्लस में है. अमेरिका की असली परेशानी यही असंतुलन है. इसी वजह से वह ट्रेंड डील के लिए भारत के कृषि क्षेत्र को खोलने की मांग करता रहा है.
| उत्पाद श्रेणी | स्थिति |
|---|---|
| ट्री नट्स (बादाम, पिस्ता, अखरोट) | टैरिफ लगभग समाप्त / बेहद कम |
| खाद्य तेल (सोयाबीन ऑयल) | बाजार खोला गया |
| फ्रेश व प्रोसेस्ड फ्रूट्स | ब्लूबेरी, ब्लैकबेरी, एप्पल |
| ज्वार | आयात के लिए खोला गया |
| वाइन व स्पिरिट | टैरिफ में कटौती |
| DDGS (एनिमल फीड) | आयात को मंजूरी |
अमेरिकी बादाम-पिस्ता-अखरोट के लिए खुला दरवाजा
अमेरिका के हित में सबसे स्पष्ट असर प्लांटेशन क्रॉप्स और प्रीमियम कृषि उत्पादों पर दिखता है. अमेरिका के बादाम, पिस्ता और अखरोट के लिए भारत ने अपने बाजार को लगभग खोल चुका है. पहले से ही मौजूदा वित्त वर्ष में इन उत्पादों का आयात 34 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1.3 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. इसके अलावा फ्रेश और प्रोसेस्ड फलों, खास तौर से वॉशिंगटन सेब, ब्लूबेरी और ब्लैकबेरी के लिए भारतीय बाजार में और जगह बनती दिख रही है. हिमाचल, उत्तराखंड और कश्मीर के सेब किसानों को अभी तक प्रोटेक्शन मिलता रहा है. ऐसे में फाइनल एग्रीमेंट का इंतजार है. क्योंकि जब वह डिटेल सामने आएगा तो हमें पता चलेगा कि वॉशिंगटन सेब को लेकर भारतीय किसामों के हित कैसे सुरक्षित हुए हैं.
आत्मनिर्भर खाद्य तेल मिशन का क्या होगा
खाद्य तेलों के मामले में विरोधाभास और गहराता दिखता है. भारत पहले ही अपनी जरुरत का 61 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है और इसे कम करने के लिए आत्मनिर्भरता मिशन चला रहा है. इसके बावजूद इस समझौते के तहत अमेरिका से सोयाबीन तेल के आयात का रास्ता खोल दिया गया है. साफ है कि जब अमेरिकी खाद्य तेल भारतीय बाजार में पहुंचेंगे तो आत्मनिर्भरता को ही चैलेंज मिलेगा.
DDGS खोलेगा GM फसलों का रास्ता ?
GM और नॉन-GM फसलों का मुद्दा भी इस समझौते में पीछे के दरवाजे से दाखिल होता दिख रहा है. भारत ने अब तक जीएम सोयाबीन और मक्का को अनुमति नहीं दी है, लेकिन अमेरिका से DDGS (डिस्टिलरी ड्राइड ग्रेन्स) के आयात को हरी झंडी दी गई है, जो पशु आहार में इस्तेमाल होता है. अमेरिका में मक्का और सोयाबीन की 95 प्रतिशत से अधिक खेती जीएम वैरायटी की होती है. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह फैसला भारत की जैव-सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करेगा और क्या इसके लिए आवश्यक नियामक मंजूरियां ली जाएंगी.
| क्षेत्र | DDGS आयात का क्या हो सकता है असर |
|---|---|
| ग्रेन-बेस्ड एथेनॉल प्लांट | मांग पर दबाव |
| DDGS घरेलू बाज़ार | कीमतों में गिरावट |
| सोया मील | पहले ही कमजोर, और नुकसान |
| सोयाबीन किसान | MSP से नीचे बिक्री का जोखिम |
इसका घरेलू असर केवल आयात तक सीमित नहीं रहेगा. पिछले कुछ वर्षों में भारत में एथेनॉल उत्पादन तेजी से बढ़ा है और पेट्रोल में ब्लेंडिंग लगभग 19.5 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. इसका बड़ा हिस्सा अनाज आधारित एथेनॉल से आता है, जहां DDGS एक अहम उप-उत्पाद है. अमेरिकी DDGS का आयात घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव डालेगा, जिससे पहले ही कमजोर सोया मील सेक्टर और सोयाबीन किसानों को और नुकसान हो सकता है. यह वही किसान हैं जिन्हें पिछले दो वर्षों में MSP से नीचे फसल बेचनी पड़ रही है.
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सब्सिडी में भारतीय किसान अमेरिकी किसानों के आगे कमजोर
इस पूरी बहस में सबसे अहम तुलना दोनों देशों में किसानों को सरकार से मिलने वाला सपोर्ट या सब्सिडी है. अमेरिका में मात्र 19 लाख किसानों के लिए लगभग 45-48 अरब डॉलर का प्रोड्यूसर सपोर्ट है. इसके मुकाबले भारत में 14 करोड़ से अधिक जोतें हैं, 46 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है. और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारत में कृषि को नेगेटिव प्राइस सपोर्ट का सामना करना पड़ता है. यानी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत के किसान पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं. वहीं भारतीय किसानों को सभी सब्सिडी और अन्य प्राइस सपोर्ट को शामिल कर लें तो करीब निगेटिव कमोडिटी प्राइस सपोर्ट करीब 129 अरब डॉलर का है. यानी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत के किसान पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं. ऐसे में जब पर्दा पूरी तरह उठेगा और समझौते की बारीकियां सामने आएंगी, तब यह और साफ होगा कि यह समझौता भारत के लिए अवसर है या भारतीय कृषि के लिए एक कठिन परीक्षा.




