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DDGS क्या है और क्यों खोले गए अमेरिका के लिए दरवाजे, जानें भारत पर इसका असर, सेब-सोयाबीन पर क्या बोली सरकार?

भारत-अमेरिका ज्वाइंट स्टेटमेंट के बाद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि पोल्ट्री सेक्टर को राहत देने के लिए DDGS के आयात को सीमित रूप से अनुमति दी गई है, जबकि सेब और सोयाबीन जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों पर कोटा, न्यूनतम आयात मूल्य और ऊंची ड्यूटी के जरिए घरेलू किसानों के हितों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है.

क्या है DDGs Image Credit: Freepik

India-US Trade Deal on Agriculture: शनिवार यानी 7 फरवरी को भारत और अमेरिका के बीच जारी हुए ज्वाइंट स्टेटमेंट के बाद व्यापार समझौते को लेकर कई सवाल खड़े हुए. खास तौर पर कृषि और पशुपालन से जुड़े उत्पादों को लेकर किसानों और उद्योगों में चिंता थी. इन्हीं आशंकाओं को दूर करने के लिए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एक-एक मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट की. DDGS से लेकर सेब, कपास और सोयाबीन तक, सरकार ने बताया कि कहां बाजार खोला गया है और कहां किसानों के हितों की पूरी तरह से हिफाजत की गई है.

DDGS क्या है और क्यों अहम है?

DDGS यानी डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स, यानी एथेनॉल या शराब (alcohol) बनाने की प्रक्रिया के बाद बचा हुआ उप-उत्पाद होता है. मक्का या अन्य अनाज से जब एथेनॉल बनाया जाता है, तो स्टार्च निकालने के बाद जो पोषक तत्व बचते हैं, उन्हें सुखाकर DDGS बनाया जाता है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से पशु आहार, खासकर पोल्ट्री और डेयरी सेक्टर में होता है. इसमें प्रोटीन, फाइबर और ऊर्जा अच्छी मात्रा में होती है, इसलिए यह सोयाबीन मील या मूंगफली खली का सस्ता विकल्प बन चुका है.

अमेरिका में DDGS का उत्पादन बेहद बड़े पैमाने पर होता है. US Grains Council के मुताबिक, अमेरिकी एथेनॉल प्लांट्स हर साल 15 अरब गैलन से ज्यादा एथेनॉल और करीब 44 मिलियन मीट्रिक टन DDGS बनाने की क्षमता रखते हैं. 2009 में जहां DDGS का निर्यात 5 मिलियन टन था, वहीं 2022-23 तक यह बढ़कर 10 मिलियन मीट्रिक टन से ज्यादा हो गया, जो 58 देशों को भेजा गया.

DDGS पर भारत ने क्यों खोला बाजार?

प्रेस कॉन्फ्रेस में पीयूष गोयल ने साफ किया कि DDGS के लिए बाजार पूरी तरह नहीं, बल्कि सीमित रूप से खोला गया है. इसकी मांग पशुपालन विभाग की ओर से आई थी, क्योंकि पोल्ट्री इंडस्ट्री को सस्ते और प्रोटीन युक्त चारे की जरूरत है. मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत ने इसके इंपोर्ट के लिए मिनिमम इंपोर्ट प्राइस तय की है.

सरकार का मानना है कि इससे पोल्ट्री सेक्टर की लागत घटेगी और उपभोक्ताओं को भी फायदा मिलेगा. हालांकि, बड़े पैमाने पर आयात से घरेलू DDGS के दाम गिरने का खतरा है, क्योंकि भारत में भी ग्रेन-बेस्ड एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से DDGS का उत्पादन तेजी से बढ़ा है.

DDGS के बढ़ते इस्तेमाल का असर पहले ही सोयामील और सोयाबीन पर दिख चुका है. बीते कुछ वर्षों में पशु आहार में DDGS के विकल्प के तौर पर आने से सोयामील की मांग और कीमतों में गिरावट आई है. सोयाबीन के दाम भी कई बार न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे रहे हैं.

सेब-कपास और सोयाबीन पर क्या बोली सरकार

मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, सेब और कपास दोनों ऐसे उत्पाद हैं जिनका भारत में भारी मात्रा में आयात होता है. अकेले सेब का आयात करीब 6 लाख टन सालाना है.

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि फिलहाल सेब 50 रुपये के न्यूनतम आयात मूल्य पर आता है, जिस पर 50 फीसदी ड्यूटी लगती है. पीयूष गोयल ने कहा कि किसानों को सुरक्षा देने के लिए अमेरिका को दिया गया आयात कोटा मौजूदा आयात से कम रखा गया है. इस कोटे पर न्यूनतम आयात मूल्य 80 रुपये तय किया गया है और 25 फीसदी ड्यूटी लगेगी. इसका मतलब है कि कुल फ्लोर प्राइस करीब 100 रुपये बैठता है, जो मौजूदा 75 रुपये के स्तर से काफी ज्यादा है. इसलिए देश के सेब किसानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है.

सोयाबीन तेल पर भी सरकार ने साफ किया कि आयात पर कोटा और ऊंची ड्यूटी संरचना रहेगी. कच्चे सोयाबीन तेल पर करीब 27.5 फीसदी और रिफाइंड तेल पर लगभग 36 फीसदी ड्यूटी लगती है. इससे घरेलू तेल उद्योग और किसानों को संरक्षण मिलता रहेगा.

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किन कृषि उत्पादों को नहीं मिली एंट्री

प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी स्पष्ट किया गया कि कई कृषि उत्पादों को डील के दायरे से बाहर रखा गया है. अमेरिका से आने वाली फ्रोजन सब्जियां जैसे आलू, मटर, बीन्स को अनुमति नहीं दी गई है. इसी तरह प्रोविजनली प्रिजर्व्ड सब्जियां, डिब्बाबंद सब्जियां, सूखी सब्जियां, दालें, कंद और जड़ वाली फसलों की भी एंट्री नहीं होगी. हालांकि संतरे, मौसमी और ग्रेपफ्रूट जैसे सिट्रस फलों को अनुमति दी गई है, जबकि स्ट्रॉबेरी अभी भी बाहर है.