आसमान में संकट और दो एयरलाइंस के CEO की विदाई, ऑपरेशनल टर्बुलेंस; जिसने एयर इंडिया और इंडिगो की जमकर ली परीक्षा

दोनों एयरलाइंस पर दबाव ऐसे समय में बढ़ा, जब लागत बढ़ रही है, नियमों में बदलाव हो रहे थे और जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितता का माहौल है. कैंपबेल का जाना घरेलू एयरलाइन इंडिगो में लीडरशिप में बदलाव के कुछ ही हफ्तों बाद हुआ है.

इंडिगो और एयर इंडिया. Image Credit: Money9live

मंगलवार की सुबह खबर आई कि एयर इंडिया के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) कैंपबेल विल्सन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब पिछले एक साल के दौरान टाटा ग्रुप के स्वामित्व वाली इस एयरलाइन को एक जानलेवा विमान दुर्घटना के बाद कई तरह की ऑपरेशनल, रेगुलेटरी और फाइनेंशियल चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. लेकिन, कैंपबेल विल्सन के इस्तीफे के समय को नजरअंदाज करना मुश्किल है.

कैंपबेल का जाना घरेलू एयरलाइन इंडिगो में लीडरशिप में बदलाव के कुछ ही हफ्तों बाद हुआ है. इंडिगो में सीईओ पीटर एल्बर्स ने फ्लाइट्स में बड़े पैमाने पर रुकावटों वाले दौर के बाद इस्तीफा दे दिया था. इस वजह से महीनों के तनाव के बाद भारत की दोनों सबसे बड़ी एयरलाइंस अब बदलाव के दौर से गुजर रही हैं.

परीक्षा के दौर से गुजरी हैं दोनों एयरलाइंस

एयर इंडिया और इंडिगो दोनों एयरलाइंस मिलकर भारत के एविएशन मार्केट पर छाई हुई हैं और पिछले एक साल में इन दोनों की अलग-अलग तरीकों से परीक्षा हुई है.

एयर इंडिया: क्रैश से लेकर कड़ी जांच तक

एयर इंडिया के लिए घटनाओं का सिलसिला जून 2025 में अहमदाबाद में Boeing 787 के क्रैश होने से शुरू हुआ, जिसमें 260 लोगों की जान चली गई. इस घटना के बाद रेगुलेटरों ने कड़ी जांच शुरू कर दी और एयरलाइन के कामकाज पर पैनी नजर रखी जाने लगी. इसके बाद के महीनों में रेगुलेटरी चिंताएं क्रैश से भी आगे बढ़ गईं.

ET की रिपोर्ट के अनुसार, एयर इंडिया को सुरक्षा में चूक के लिए फटकार लगाई गई थी, जिसमें बिना वैलिड एयरवर्थिनेस सर्टिफिकेट के कई बार विमान उड़ाना और इमरजेंसी उपकरणों की जांच किए बिना विमान ऑपरेट शामिल था. एयरलाइन ने बाद में कंप्लायंस और आंतरिक प्रक्रियाओं में सुधार की जरूरत को स्वीकार किया.

इसके साथ ही, एयरलाइन के सुधार के प्रयासों पर बाहरी कारणों का भी दबाव पड़ा. पाकिस्तान द्वारा भारतीय विमानों के लिए अपना एयर स्पेस बंद कर देने के कारण, प्रमुख इंटरनेशनल रूट्स पर विमानों को लंबा रास्ता तय करना पड़ा, जिससे ईंधन की खपत और ऑपरेशन कॉस्ट में बढ़ोतरी हुई.

वित्तीय नुकसान की चेतावनी

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने इस रुकावट को और बढ़ा दिया. मार्च में कर्मचारियों को भेजे एक नोट में विल्सन ने बताया कि एयर इंडिया ने तीन हफ्तों के दौरान इस क्षेत्र के लिए लगभग 2,500 उड़ानें रद्द कर दी थीं. साथ ही, प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र और हवाई अड्डों के बंद होने के कारण, एयर इंडिया अपने सामान्य पश्चिम एशिया शेड्यूल के मुकाबले केवल 30 फीसदी उड़ानों का ही संचालन कर पा रही थी. उन्होंने इसके कारण होने वाले बड़े वित्तीय नुकसान की चेतावनी भी दी.

इन रुकावटों का असर यूरोप और उत्तरी अमेरिका के रूट पर पड़ा, जिसकी वजह से फ्लाइट्स का रास्ता बदलना पड़ा और लागत भी बढ़ गई. आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता रहा. एयर इंडिया और उसकी लो-कॉस्ट आर्म ने 2024-25 में कुल मिलाकर 98.08 अरब रुपये का घाटा दिखाया, जबकि एयरलाइन अपने बेड़े के विस्तार और रिन्यू में निवेश करती रही.

इंडिगो: दिसंबर में रुकावटें और उनके नतीजे

जहां एक तरफ एयर इंडिया सुरक्षा जांच और बाहरी रुकावटों से जूझ रही थी, वहीं साल के आखिर में इंडिगो को भी अपने ही एक संकट का सामना करना पड़ा. दिसंबर 2025 में एयरलाइन को बड़े पैमाने पर रुकावटों का सामना करना पड़ा. महीने के शुरुआती हफ्तों में ही उसने लगभग 4,500 उड़ानें रद्द कर दीं. बाद में एयरलाइन ने बताया कि पायलटों की थकान से जुड़े सख़्त नियमों का पालन करने के लिए वह समय पर क्रू रोस्टर अपडेट नहीं कर पाई थी.

सिस्टम की मजबूती पर जांच-पड़ताल

संसद में सरकार के जवाब में कुछ बुनियादी मुद्दों की ओर इशारा किया गया, जिनमें ऑपरेशन्स का जरूरत से ज्यादा ऑप्टिमाइजेशन, रेगुलेटरी तैयारियों में कमियां और सिस्टम सपोर्ट व ऑपरेशनल कंट्रोल में खामियां शामिल हैं. इसके नतीजतन, निगरानी और कड़ी कर दी गई. अधिकारियों ने एयरलाइन ऑपरेशन्स की मॉनिटरिंग बढ़ा दी और क्रू की उपलब्धता, रोस्टर की विश्वसनीयता और सिस्टम की मजबूती पर जांच-पड़ताल तेज कर दी.

इस उथल-पुथल का असर टॉप लेवल पर भी पड़ा. एयरलाइन की एक रेगुलेटरी फाइलिंग के मुताबिक, एल्बर्स ने मार्च में पद छोड़ दिया और मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल भाटिया ने अंतरिम चार्ज संभाल लिया.

दबावों की एक कड़ी, दो CEO की विदाई

दोनों एयरलाइंस पर दबाव ऐसे समय में बढ़ा, जब लागत बढ़ रही है, नियमों में बदलाव हो रहे थे और जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितता का माहौल है. एयरलाइंस को ईंधन की बढ़ती कीमतों, संघर्ष वाले इलाकों से जुड़े बीमा की बढ़ी हुई लागत और सीमित हवाई क्षेत्र के कारण ऑपरेशनल संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

इन स्थितियों का असर इंडिगो के ऑपरेशन्स पर भी पड़ा, इसके बावजूद उसने दिसंबर में हुई रुकावटों से उबरी और अपना विस्तार जारी रखा. एयर इंडिया के लिए यह लीडरशिप में बदलाव ऐसे समय में आया है जब एयरलाइन टाटा ग्रुप के मालिकाना हक के तहत अपना कायाकल्प जारी रखे हुए है.

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