पश्चिम एशिया तनाव: गैस संकट से बंद हुए ढाबे; खाने वाले तेल और चीनी की मांग में आई गिरावट: रिपोर्ट
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत के फूड सेक्टर पर दिख रहा है. कमर्शियल गैस की कमी से ढाबों और छोटे रेस्टोरेंट्स का कामकाज प्रभावित हुआ है, जिससे एडिबल ऑयल और चीनी की मांग में गिरावट आई है.
Edible Oil and Sugar Demand Cut: पश्चिम एशिया में जारी जियो पॉलिटिकल टेंशन अब केवल एनर्जी मार्केट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर भारत की रोजमर्रा की खपत पर भी साफ दिखाई देने लगा है. पेट्रोलियम सप्लाई में आई बाधाओं के बाद देश में कमर्शियल गैस सिलेंडरों की कमी गहराने लगी थी जिसका असर अब फूड सेक्टर पर पड़ता हुआ दिख रहा है. खासतौर पर सड़क किनारे चलने वाले ढाबे, छोटे रेस्टोरेंट और मिठाई-नाश्ते की दुकानों को संचालन घटाने या अस्थायी रूप से बंद करने तक की नौबत आ गई है.
कहां दिख रही कमी?
रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, गैस की कमी के चलते इन आउटलेट्स में उत्पादन घटा है, जिससे एडिबल ऑयल और चीनी जैसी जरूरी वस्तुओं की खपत में गिरावट दर्ज की जा रही है. आमतौर पर समोसा, कचौड़ी, चोले-भटूरे जैसे डीप-फ्राइड फूड आइटम बनाने में बड़ी मात्रा में तेल की जरूरत होती है, लेकिन गैस की कमी ने इस पूरे चक्र को प्रभावित कर दिया है.
इंपोर्ट में आई कमी
इंडस्ट्री बॉडी Solvent Extractors’ Association of India (SEA) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बी.वी. मेहता के अनुसार, सड़क किनारे खाने-पीने के कारोबार में आई सुस्ती के चलते एडिबल ऑयल की खपत घटी है. इसका असर इंपोर्ट पर भी दिखने लगा है. भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा एडिबल ऑयल आयातक है, उसने मार्च महीने में करीब 9 फीसदी कम आयात किया. कुल इंपोर्ट घटकर लगभग 1.2 मिलियन टन पर आ गया, जो पिछले महीने के मुकाबले कम है. गैस सिलेंडर की कमी जमीनी स्तर पर भी महसूस की जा रही है. मनी9लाइव की ग्राउंड रिपोर्ट में कई छोटे कारोबारियों ने बताया कि सिलेंडर की कीमत बढ़ने के साथ-साथ समय पर डिलीवरी नहीं हो रही है.
कहां से शुरू हुई परेशानी?
दरअसल, भारत इस समय दशकों के सबसे बड़े एलपीजी संकट का सामना कर रहा है. सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देने के लिए इंडस्ट्रियल सप्लाई में कटौती की है, जिससे कमर्शियल यूजर्स पर दबाव बढ़ गया है. भारत अपनी कुल एलपीजी जरूरत का करीब 60 फीसदी आयात करता है, जिसमें से लगभग 90 फीसदी सप्लाई मिडिल ईस्ट से आती है. ऐसे में वहां का तनाव सीधे सप्लाई चेन को प्रभावित कर रहा है.
चीनी की डिमांड में कमी
इस संकट का असर केवल तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि चीनी की मांग भी प्रभावित हो रही है. ईटी ने अपनी एक रिपोर्ट में नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (NFCSF) के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से छापा है कि गर्मियों और शादी के सीजन में आमतौर पर चीनी की खपत बढ़ती है, लेकिन इस बार कई चाय की दुकानें और मिठाई की शॉप्स कम उत्पादन कर रही हैं या अस्थायी रूप से बंद हैं.
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