BHEL और SAIL से छिन सकता है ‘महारत्न’ का ताज, सरकार ने दिया 1 साल का अल्टीमेटम, कहां हो रही चूक?

देश की दो प्रमुख सरकारी कंपनियां BHEL और SAIL अपने महारत्न दर्जे को बचाने की चुनौती का सामना कर रही हैं. सरकार ने दोनों कंपनियों को एक साल के भीतर वित्तीय प्रदर्शन सुधारने का अल्टीमेटम दिया है. यदि वे तय मुनाफे के मानकों को पूरा नहीं कर पातीं, तो उनका दर्जा महारत्न से घटाकर नवरत्न किया जा सकता है.

रिस्क पर दोनों कंपनियों का महारत्न दर्जा Image Credit: Money9 Live

सरकारी कंपनियों में धाक जमाने वाली दो बड़ी ‘महारत्न’ कंपनियां, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) संकट में हैं. ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने इनके खराब वित्तीय प्रदर्शन को देखते हुए इन्हें एक साल का कड़ा नोटिस थमा दिया है.

साफ चेतावनी दी गई है कि अगर एक साल के भीतर इन्होंने अपना परफॉर्मेंस नहीं सुधारा, तो इनसे ‘महारत्न’ का दर्जा छीनकर इन्हें ‘नवरत्न’ कैटेगरी में डाल दिया जाएगा. देश में ऐसा पहली बार हो रहा है जब किसी महारत्न कंपनी पर डाउनग्रेड होने की तलवार लटकी है.

क्यों छिन सकता है महारत्न का दर्जा?

रिपोर्ट के मुताबिक, कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय कमेटी ने सरकारी कंपनियों के कामकाज की समीक्षा के बाद यह सख्त सिफारिश की है. कुल 14 महारत्न कंपनियों में से सिर्फ भेल और सेल ही तय मानकों पर खरी नहीं उतरीं.

नियम के मुताबिक, महारत्न बने रहने के लिए कंपनी का पिछले तीन सालों का औसत सालाना शुद्ध लाभ (PAT) ₹5,000 करोड़ से अधिक होना चाहिए. भेल और सेल दोनों ही इस मोर्चे पर फेल साबित हुई हैं. हालांकि, सेल (SAIL) का औसत टर्नओवर ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा और नेटवर्थ ₹53,976 करोड़ है, लेकिन मुनाफे के मामले में वह पिछड़ गई. सेल ने आखिरी बार वित्तीय वर्ष 2022-23 में मुनाफे का यह आंकड़ा छुआ था.

दर्जा घटने से क्या नुकसान होगा?

  • अगर ये कंपनियां डाउनग्रेड होती हैं, तो इनके बोर्ड की वित्तीय स्वायत्तता काफी कम हो जाएगी.
  • महारत्न कंपनियां बिना सरकारी मंजूरी के किसी भी प्रोजेक्ट में ₹5,000 करोड़ तक का निवेश कर सकती हैं.
  • नवरत्न कंपनियां बनने के बाद यह सीमा घटकर सिर्फ ₹1000 करोड़ रह जाएगी. यानी छोटे-बड़े निवेश के लिए भी इन्हें सरकार के चक्कर काटने पड़ेंगे.

नियमों में सख्ती और 2025 के हिसाब से नया पैमाना

सरकार अब ‘रत्न’ स्टेटस को हल्के में लेने के मूड में नहीं है. नीति आयोग का मानना है कि महारत्न के लिए टर्नओवर (₹25,000 करोड़), नेटवर्थ (₹15,000 करोड़) और मुनाफे के जो पैमाने तय हैं, वे 2010 के हैं. कैबिनेट सचिव ने भारी उद्योग विभाग (DPE) को निर्देश दिया है कि इन पैमानों को साल 2025 की कीमतों के हिसाब से रिवाइज किया जाए, ताकि आज की मार्केट वैल्यू का सही अंदाजा लग सके. इसके अलावा CSR फंड खर्च न करने, MSME का भुगतान रोकने और उत्तराधिकारी योजना न बनाने पर कंपनियों के नंबर काटे जाएंगे.

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क्या है बचाने का प्लान?

सरकार ने भारी उद्योग मंत्रालय और इस्पात मंत्रालय को दोनों कंपनियों को उबारने के लिए एक विस्तृत टर्नअराउंड प्लान पेश करने को कहा है. भेल के मामले में नीति आयोग ने माना है कि इसकी ‘मानव संसाधन नीतियां’ इसके विकास में बड़ी बाधा हैं, जिन्हें बदलने की जरूरत है. भारी उद्योग मंत्रालय ने कमेटी को भरोसा दिया है कि भेल की माली हालत सुधारने के लिए एक्शन प्लान तैयार कर लिया गया है. अब देखना होगा कि ये दोनों दिग्गज कंपनियां एक साल में खुद को साबित कर पाती हैं या नहीं.