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चीन का निकलेगा ‘तेल’, हर तरफ से घिरा ड्रैगन; पहले वेनेजुएला अब ईरान, कहां से लेगा सस्ता तेल

वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई और ईरान-इजरायल तनाव के बीच चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है. सस्ते तेल के लिए वेनेजुएला और ईरान पर निर्भर बीजिंग अब सप्लाई अनिश्चितता, अमेरिकी प्रतिबंधों और होर्मुज स्ट्रेट के जोखिम से जूझ रहा है. ऐसे में रूस चीन के लिए वैकल्पिक सप्लायर के तौर पर उभर रहा है, लेकिन जियो पॉलिटिकल स्तर पर रिस्क अभी भी बरकरार हैं. ऐसे में चीन के पास क्या विकल्प?

चीन और तेल संकट! Image Credit: @AI

China Oil Supply Crisis After Iran-Israel War: दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन आज जिस सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती से जूझ रहा है, वह है उसकी ऊर्जा सुरक्षा. बीते कुछ वर्षों में बीजिंग ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से जूझ रहे देशों- वेनेजुएला, ईरान और रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी इंपोर्ट कॉस्ट यानी आयात लागत में अरबों डॉलर की बचत की. लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं. पहले वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई से सप्लाई बाधित हुई और अब ईरान-इजरायल तनाव के साथ अमेरिकी प्रतिबंधों ने चीन की ऊर्जा रणनीति पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

वेनेजुएला: चीन का पुराना और भरोसेमंद साझेदार

लैटिन अमेरिका में वेनेजुएला लंबे समय से चीन का करीबी सहयोगी रहा है. ह्यूगो शावेज के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के रिश्ते तेजी से गहरे हुए. 2023 में संबंधों को “ऑल-वेदर स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” का दर्जा दिया गया, जो राजनीति, व्यापार, ऊर्जा और रक्षा सहयोग तक फैला हुआ है. चीन ने वेनेजुएला को भारी कर्ज दिया और उसके तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना.

वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात पर निर्भर है और उसमें चीन की भूमिका अहम रही है. लेकिन हालिया समुद्री नाकेबंदी और राजनीतिक घटनाक्रम के बाद वेनेजुएला से चीन को होने वाली सप्लाई बाधित हो गई. इसका सीधा असर चीनी रिफाइनरियों पर पड़ा, खासकर उन छोटे निजी रिफाइनरों पर जिन्हें “टीपॉट” कहा जाता है.

ईरान: सस्ता लेकिन जोखिम भरा विकल्प

वेनेजुएला के बाद चीन की नजर ईरान पर टिकी रही. ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में शामिल है और ओपेक का प्रमुख उत्पादक भी है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरानी तेल के खरीदार सीमित हैं, लेकिन चीन ने इसी मौके का फायदा उठाया. रायटर्स ने 2025 के आंकड़ों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ईरान से निर्यात होने वाले तेल का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा चीन खरीदता रहा है. पिछले साल चीन ने औसतन 13.8 लाख बैरल प्रतिदिन ईरानी तेल आयात किया, जो उसके कुल समुद्री आयात का लगभग 13 फीसदी था. ईरान चीन को ब्रेंट क्रूड के मुकाबले 8 से 10 डॉलर प्रति बैरल तक सस्ता तेल दे रहा था.

हाल के महीनों में यह छूट और बढ़कर 10–11 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. लेकिन जोखिम भी उतना ही बड़ा है. अमेरिकी प्रतिबंधों की नई खेप, टैंकरों पर कार्रवाई और सैन्य टकराव ने ईरान से आपूर्ति को अनिश्चित बना दिया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है, किसी भी बड़े युद्ध की स्थिति में बंद हो सकता था. ये बात अभी तक केवल कही जाती थी लेकिन हालिया ईरान और इजरायल-अमेरिका टेंशन ने इस बात को भी सच करार दिया. कई मीडिया रिपोर्ट्स इस ओर इशारा कर रहे हैं कि ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया.

चीनी ‘टीपॉट’ रिफाइनरियों पर दबाव

ईरान और वेनेजुएला से सस्ता तेल मुख्य रूप से चीन की छोटी स्वतंत्र रिफाइनरियों तक जाता है. ये कंपनियां कम मार्जिन पर काम करती हैं और बड़े सरकारी भंडारण संसाधनों के बिना चलती हैं. अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत कुछ टीपॉट रिफाइनरियों पर सीधे कार्रवाई भी हुई है, जिससे कई मध्यम आकार की कंपनियां ईरानी तेल खरीदने से हिचकने लगी हैं. नतीजा यह हुआ कि हाल के महीनों में चीन के बंदरगाहों पर ईरानी तेल की खेप में गिरावट दर्ज की गई. कुछ आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी की तुलना में फरवरी में ईरानी तेल की आवक में एक लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक की कमी आई.

अब कहां जाएगा चीन?

ऐसे माहौल में चीन ने तेजी से रूसी तेल की ओर रुख किया है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस भी पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरा है और उसने चीन व भारत जैसे देशों को भारी छूट पर तेल बेचा. ताजा आंकड़े बताते हैं कि इस महीने चीन ने रूस से औसतन 20 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक तेल आयात किया, जो पिछले महीने से काफी ज्यादा है. यह बढ़ोतरी लगभग उतनी ही है जितनी वेनेजुएला से कम हुई आपूर्ति थी. यानी एक तरह से ‘वन-टू-वन’ रिप्लेसमेंट. रूस चीन के लिए फिलहाल अपेक्षाकृत स्थिर सप्लायर दिख रहा है. हालांकि छूट का स्तर ईरान के बराबर है, लेकिन जियो पॉलिटिकल मोर्चे पर जिस तेजी से तस्वीर बदल रहे हैं वह किसी देश की स्थिरता पर बड़ा सवालिया निशान है.

अमेरिका की रणनीति और चीन की दुविधा

अमेरिका ने 2018 से ईरान पर कड़े प्रतिबंध दोबारा लागू किए और हाल के वर्षों में इन्हें और सख्त किया है. टैंकरों पर कार्रवाई, व्यापारिक साझेदारों पर टैरिफ की धमकी और 2026 से 25 फीसदी तक का प्रस्तावित शुल्क, ये सब चीन पर दबाव बढ़ा सकते हैं. चूंकि चीन का अमेरिका को निर्यात सैकड़ों अरब डॉलर का है, इसलिए वह खुली टकराव की स्थिति से बचना चाहेगा. बीजिंग सार्वजनिक रूप से एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है और ईरान के साथ व्यापार को वैध बताता है. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वह अब कीमत से ज्यादा सप्लाई की स्थिरता को प्राथमिकता देता दिख रहा है.

क्या सचमुच घिर गया ‘ड्रैगन’?

वेनेजुएला में राजनीतिक उथल-पुथल और ईरान-इजरायल तनाव ने चीन की ऊर्जा आपूर्ति के दो अहम स्तंभों को हिला दिया है. ऐसे में रूस फिलहाल सबसे बड़ा विकल्प बनकर उभरा है. लेकिन सवाल यह है कि अगर पश्चिमी प्रतिबंध और कड़े हुए या वैश्विक संघर्ष बढ़ा, तो क्या चीन की रणनीति टिकाऊ रह पाएगी? चीन ने सस्ते तेल के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाया, लेकिन अब उसे जियो पॉलिटिकल रिस्क की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है. ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर ड्रैगन हर तरफ से दबाव में है और आने वाले महीनों में यह तय होगा कि वह इस संकट से कैसे निकलता है.

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