कीमत नहीं, अब सप्लाई का संकट! होर्मुज बंद होने से हिला एनर्जी मार्केट; भारत मंगाता है इसी रास्ते से 50% तेल
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से ग्लोबल एनर्जी मार्केट में सप्लाई संकट गहरा सकता है. HSBC Global Investment Research की रिपोर्ट के अनुसार, यदि शिपिंग रूट बाधित होता है तो ब्रेंट क्रूड में तेज उछाल संभव है. होर्मुज से दुनिया की करीब 20 फीसदी पेट्रोलियम और एलएनजी सप्लाई गुजरती है, जबकि भारत का लगभग 50 फीसदी कच्चा तेल आयात इसी मार्ग से होता है.
Hormuz Strait closure: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अब ग्लोबल एनर्जी मार्केट को निर्णायक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने की खबर ने तेल बाजार की दिशा पूरी तरह बदल दी है. अब मामला केवल कीमतों की अस्थिरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सप्लाई संकट की आशंका में बदल चुका है. बाजार एक्सपर्ट के मुताबिक, जब तक यह समुद्री मार्ग खुला था, तब तक जोखिम प्रीमियम की बात थी, लेकिन इसके बंद होते ही स्थिति स्ट्रक्चरल सप्लाई शॉक में बदल सकती है.
कीमतों से आगे बढ़ा संकट
HSBC Global Investment Research की हालिया रिपोर्ट में पहले ही चेतावनी दी गई थी कि यदि संघर्ष शिपिंग रूट को प्रभावित करता है, तो तेजी का जोखिम काफी बढ़ जाएगा. एचएसबीसी ने 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान 65 डॉलर प्रति बैरल रखा था, लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि वास्तविक खतरा सप्लाई में बाधा से जुड़ा है. अब होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद बाजार केवल जोखिम प्रीमियम नहीं जोड़ रहा, बल्कि वास्तविक कमी की आशंका को कीमतों में शामिल कर रहा है.
होर्मुज का वैश्विक महत्व
होर्मुज स्ट्रेट से वैश्विक पेट्रोलियम सप्लाई का लगभग 20 फीसदी और एलएनजी का भी करीब 20 फीसदी गुजरता है. यह मार्ग बंद होने का अर्थ है कि खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा बाजार तक नहीं पहुंच पाएगा. विश्लेषकों का कहना है कि अतिरिक्त उत्पादन क्षमता तब तक बेकार है, जब तक तेल सुरक्षित रूप से उपभोक्ता देशों तक न पहुंचे.
भारत पर संभावित असर
भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 50 फीसदी, यानी करीब 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन, इसी मार्ग से आता है. लंबे समय तक बंद रहने पर लैंडेड कॉस्ट बढ़ सकती है, रिफाइनरियों की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है और चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है. डाउनस्ट्रीम सेक्टर के एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसी स्थिति में बीमा और फ्रेट लागत तेजी से बढ़ेंगी, जिससे ऑपरेशनल जोखिम भी उभर सकता है.
वित्तीय बाजारों में अस्थिरता
एचएसबीसी ने यह भी संकेत दिया था कि यदि संघर्ष कई तेल उत्पादक देशों तक फैलता है, तो वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता तेज हो सकती है. डॉलर निकट अवधि में मजबूत रह सकता है, जबकि उभरते बाजारों की करेंसी और इक्विटी पर दबाव बढ़ सकता है.
फिलहाल स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है. जब तक वैकल्पिक शिपिंग रूट या कूटनीतिक समाधान सामने नहीं आता, तब तक तेल बाजार में असाधारण उतार-चढ़ाव और ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित होने की आशंका बनी रह सकती है.
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