सोने की तेजी रहेगी जारी, 1.85 लाख तक जाने की उम्मीद, MOFSL ने दिया टारगेट, जानें उछाल की वजह
ब्रोकरेज फर्म Motilal Oswal Financial Services Ltd के मुताबिक वैश्विक अनिश्चितताओं, डॉलर आधारित एसेट्स से दूरी, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव समेत कई दूसरे कारणों की वजह से सोने में लंबी अवधि की तेजी जारी रह सकती है. रिपोर्ट के अनुसार अगले 12 महीनों में सोना 6,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकता है, सकारात्मक रियल रेट के बावजूद सोने की मजबूती इस बात का संकेत है कि निवेशक इसे वैश्विक वित्तीय जोखिमों के खिलाफ सुरक्षित ठिकाने के रूप में देख रहे हैं.
Gold Price Target: वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सोना एक बार फिर सुरक्षित निवेश का सबसे बड़ा सहारा बनकर उभरा है. ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (Motilal Oswal Financial Services Ltd.) ने सोने में तेजी जारी रहने का अनुमान लगाया है. इस सिलसिले में फर्म ने प्रीशियस मेटल्स रिपोर्ट जारी की है. जिसमें 2026 की शुरुआत में सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस के पार पहुंच गया है. यह सिर्फ एक सामान्य तेजी नहीं, बल्कि “स्ट्रक्चरल रिप्राइसिंग फेज” है, जो एक नए सुपर साइकिल की शुरुआत का संकेत देता है. ऐसे में MOFSL ने सोने की कीमत को लेकर नया टारगेट दिया है. साथ ही उछाल की वजह भी बताई है.
क्या है टारगेट?
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रोकरेज का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में कॉमेक्स गोल्ड 6,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकता है, जो भारतीय बाजार में लगभग 1.85 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के बराबर होगा. अगर भू-राजनीतिक तनाव और राजकोषीय दबाव और बढ़ते हैं तो मध्यम अवधि में 7,500 डॉलर प्रति औंस का स्तर भी संभव है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर डॉलर आधारित एसेट्स से धीरे-धीरे दूरी और सीमित भौतिक आपूर्ति सोने को 5,000 डॉलर के ऊपर मजबूती से टिकाए रख सकती है.
पॉजिटिव रियल रेट के बावजूद चढ़ा सोना
2023 से 2025 के बीच जब वास्तविक ब्याज दरें सकारात्मक थीं, तब भी सोने की कीमतों में तेजी बनी रही. आमतौर पर ऐसे माहौल में सोना कमजोर पड़ता है, लेकिन इस बार तस्वीर अलग रही. इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों की चिंता सिर्फ महंगाई तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक कर्ज के बढ़ते बोझ और वित्तीय ढांचे की स्थिरता को लेकर भी है. विश्लेषकों के अनुसार निवेशक अब वास्तविक रिटर्न को अस्थायी और नीति आधारित मान रहे हैं, जिससे सोने को लॉन्ग टर्म के लिहाज से भरोसेमंद माना जा रहा है.
भू-राजनीतिक तनाव ने दी हवा
पूर्वी यूरोप, मिडिल ईस्ट और एशिया में बढ़ते तनाव, व्यापारिक टकराव और टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितताओं ने महंगाई और करेंसी वोलैटिलिटी को बढ़ाया है. ऐसे माहौल में सोना एक न्यूट्रल और भरोसेमंद एसेट के रूप में आकर्षक बन गया है. साथ ही वैश्विक स्तर पर खदान उत्पादन सीमित है, बड़े एक्सचेंजों पर इन्वेंट्री घट रही है और उत्पादन लागत बढ़ रही है. इन कारणों से भी सोने की कीमतों को सपोर्ट मिल रहा है.
घरेलू मांग और सेंट्रल बैंकों की खरीद
भारत में रुपये की कमजोरी और मजबूत रिटेल डिमांड ने भी सोने को सहारा दिया है. गोल्ड ETF में फिर से निवेश बढ़ा है. पिछले चार वर्षों से केंद्रीय बैंक हर साल करीब 1,000 टन सोना खरीद रहे हैं, इससे डॉलर पर निर्भरता कम होगी. रिजर्व बैंक के तेजी से गोल्ड को खरीदने की वजह से भी इसकी कीमतों में उछाल आने की संभावना है.
