Moody’s ने भारत का घटाया ग्रोथ अनुमान, महंगाई दर 4.5% पहुंचने की आशंका; इन सेक्टर्स को भुगतना होगा अंजाम

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट संकट को लेकर Moody’s ने भारत के लिए बड़ी चेतावनी दी है. रिपोर्ट के अनुसार भारत समेत बड़े तेल आयातक देशों को ऊर्जा सप्लाई बनाए रखने के लिए ईरान के साथ अलग ट्रांजिट कॉरिडोर समझौते करने पड़ सकते हैं. एजेंसी ने भारत की 2026 GDP ग्रोथ अनुमान घटाकर 6 फीसदी कर दिया है और महंगाई बढ़ने का भी खतरा जताया है.

Moody’s रिपोर्ट Image Credit: News9

Moody’s India GDP Forecast: पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और एनर्जी मार्केट पर गहरा असर डालने लगा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी Moody’s ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि भारत समेत दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों को अब एनर्जी सप्लाई बनाए रखने के लिए ईरान के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय समझौते करने पड़ सकते हैं. रिपोर्ट के अनुसार होर्मुज स्ट्रेट में सामान्य स्थिति जल्द लौटने की संभावना बेहद कम है और वर्ष 2026 तक भी प्री-वॉर स्तर का समुद्री ट्रैफिक बहाल होना मुश्किल दिख रहा है. Moody’s के मुताबिक भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े तेल आयातक देश ईरान के साथ विशेष ट्रांजिट कॉरिडोर समझौते कर सकते हैं, ताकि कच्चे तेल और LNG की सप्लाई पूरी तरह बाधित न हो. रिपोर्ट में लारक द्वीप और ओमान के समुद्री क्षेत्र के पास उभरते संभावित ट्रांजिट रूट्स का भी जिक्र किया गया है.

क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज स्ट्रेट?

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री ऊर्जा मार्गों में शामिल है. सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के कुल समुद्री कच्चे तेल और LNG सप्लाई का लगभग 20 फीसद हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. हालांकि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर संयुक्त हवाई हमलों के बाद शुरू हुए संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया.

इसके जवाब में ईरान की प्रतिक्रिया के बाद होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुईं. Moody’s के अनुसार इस मार्ग से गुजरने वाला समुद्री ट्रैफिक अब प्री-कॉन्फ्लिक्ट स्तर से 90 फीसद तक गिर चुका है. ज्यादा बीमा लागत, समुद्री माइंस का खतरा और सुरक्षा चिंताओं के कारण कई शिपिंग कंपनियां इस रूट से दूरी बना रही हैं.

भारत पर क्यों बढ़ सकती है सबसे ज्यादा मार?

Moody’s ने भारत को सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल किया है. रिपोर्ट के अनुसार भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 46 फीसद हिस्सा मीडिल ईस्ट देशों से आयात करता है. ऐसे में यदि तेल सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है और ब्रेंट क्रूड की कीमतें 90 से 110 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी रहती हैं, तो भारत पर कई तरह का आर्थिक दबाव बढ़ सकता है.

Moody’s ने अनुमान लगाया है कि ऊंची तेल कीमतों का असर भारत की GDP ग्रोथ, चालू खाते के घाटे, रुपये की कमजोरी और सरकारी वित्तीय प्रबंधन पर दिखाई दे सकता है. एजेंसी ने वर्ष 2026 के लिए भारत की GDP ग्रोथ अनुमान को 0.8 प्रतिशत अंक घटाकर 6 फीसदी कर दिया है.

महंगाई और ब्याज दरों पर भी असर

रिपोर्ट में कहा गया है कि लगातार ऊंची ऊर्जा कीमतें दुनिया भर में महंगाई बढ़ा सकती हैं. भारत में भी 2026 के दौरान औसत महंगाई दर 4.5 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है, जो एजेंसी के पिछले अनुमान से 1 प्रतिशत अंक ज्यादा है. ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा.

इससे परिवहन, मैन्युफैक्चरिंग, एविएशन, केमिकल्स और बिजली जैसे कई सेक्टर्स की लागत बढ़ सकती है. Moody’s ने कहा कि बढ़ती महंगाई के कारण दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरों में कटौती करना भी मुश्किल हो सकता है. इससे कंपनियों के लिए फाइनेंसिंग महंगी हो सकती है और उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है.

तेल बाजार में बनी रह सकती है भारी अस्थिरता

Moody’s के अनुसार ब्रेंट क्रूड की कीमतें इस वर्ष ज्यादातर समय 90 से 110 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकती हैं. हालांकि भू-राजनीतिक घटनाओं के आधार पर इसमें तेज उतार-चढ़ाव भी देखने को मिल सकता है. एजेंसी का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट में मौजूदा संकट अब केवल अस्थायी सप्लाई शॉक नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर एक “स्ट्रक्चरल कंस्ट्रेंट” बन चुका है. यही वजह है कि आने वाले महीनों में दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों को ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई रणनीतियां अपनानी पड़ सकती हैं.

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