ममता राज में कितना ‘सोनार बांग्ला’! 6688 कंपनियों ने छोड़ा बंगाल, ₹15000 आम आदमी की इनकम, पर कर्ज ₹84447
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 से पहले जानें ममता बनर्जी सरकार के 15 साल का आर्थिक रिपोर्ट कार्ड. क्यों बंगाल से 6,688 कंपनियों ने पलायन किया और जीडीपी में राज्य की हिस्सेदारी क्यों घटी? देखिए प्रति व्यक्ति आय के चौंकाने वाले आंकड़े.

West Bengal Economy: किसी समय भारत की औद्योगिक राजधानी कहा जाने वाला पश्चिम बंगाल आज अपनी आर्थिक पहचान को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 15 साल के शासनकाल के बाद जब हम राज्य की संपन्नता का आकलन करते हैं, तो आंकड़ों की जुबानी एक चिंताजनक कहानी सामने आती है. कभी देश की जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान देने वाला यह राज्य आज राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे छूट गया है. उद्योगों का पलायन और प्रति व्यक्ति आय में आई भारी गिरावट यह बताने के लिए काफी है कि बंगाल का आर्थिक ढांचा अब ‘सर्वाइवल मोड’ पर आ चुका है.
राष्ट्रीय जीडीपी में घटता रसूख
बंगाल की आर्थिक स्थिति का सबसे बड़ा पैमाना देश की जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी है. आंकड़ों के मुताबिक, बंगाल का आर्थिक कद लगातार छोटा हुआ है:
हिस्सेदारी में गिरावट: साल 1960-61 में देश की कुल जीडीपी में बंगाल का हिस्सा 6.8% हुआ करता था, जो 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार घटकर महज 5.6% रह गया है.
धीमी रफ्तार: हालांकि राज्य की जीएसडीपी (GSDP) मौजूदा कीमतों पर ₹20 लाख करोड़ के करीब पहुंचने का अनुमान है, लेकिन गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों की तुलना में बंगाल की विकास दर काफी सुस्त रही है.
प्रति व्यक्ति आय, राष्ट्रीय औसत से 20% का फासला
प्रति व्यक्ति आय किसी भी राज्य की संपन्नता का सबसे सटीक पैमाना होती है. यहां बंगाल की तस्वीर सबसे ज्यादा धुंधली नजर आती है:
- 2022-23 के वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, बंगाल की प्रति व्यक्ति आय ₹1,71,184 है.
- भारत का राष्ट्रीय औसत ₹2,11,725 है. इसका सीधा मतलब यह है कि बंगाल का एक आम नागरिक देश के औसत नागरिक की तुलना में 20% कम कमा रहा है.
- 1960 के दशक में संपन्नता के मामले में ‘टॉप-3’ में रहने वाला यह राज्य आज गिरकर 14वें स्थान पर पहुंच चुका है.
‘इंडस्ट्रियल एग्जिट’ ने उजाड़ा शहर
बंगाल के लिए सबसे बड़ा झटका उसका औद्योगिक आधार खोना रहा है. पिछले 15 सालों में ‘लैंड पॉलिसी’ और राजनीतिक अस्थिरता ने निवेशकों को डराया है:
- कंपनियों का पलायन: 2011 से 2025 के बीच कुल 6,688 कंपनियों ने बंगाल छोड़ दिया है. इन कंपनियों ने अपने मुख्यालय (Head Offices) दूसरे राज्यों में शिफ्ट कर लिए.
- लिस्टेड कंपनियां: पलायन करने वालों में 110 लिस्टेड कंपनियां भी शामिल थीं, जो शेयर बाजार में राज्य की साख का प्रतिनिधित्व करती थीं.
- बुरा दौर: उद्योगों के भागने का सबसे भयावह दौर 2015 से 2018 के बीच देखा गया. टाटा नैनो (सिंगूर) से लेकर जेएसडब्ल्यू जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स का हाथ से निकलना राज्य की औद्योगिक छवि पर गहरा दाग लगा गया.
वो कारक जिन्होंने रोकी बंगाल की रफ्तार
राज्य की संपन्नता को प्रभावित करने वाले मुख्य कारण निम्नलिखित रहे हैं:
जमीन अधिग्रहण नीति: राज्य की सख्त लैंड पॉलिसी के कारण बड़े उद्योगों के लिए जमीन मिलना लगभग असंभव हो गया. ‘अनिवार्य भूमि अधिग्रहण’ पर रोक ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कमर तोड़ दी.
सिंडिकेट और वसूली की राजनीति: निर्माण कार्यों और व्यापारिक गतिविधियों में स्थानीय ‘सिंडिकेट’ के दखल ने बिजनेस की लागत को बढ़ा दिया है, जिससे नए निवेश आने बंद हो गए.
कर्ज का भारी बोझ: लोकलुभावन योजनाओं (जैसे लक्ष्मीर भंडार) और विरासत में मिले कर्ज के कारण राज्य पर आज ₹7.71 लाख करोड़ का भारी कर्ज है. अगर राज्य की आबादी में इस आंकड़े को बांटे तो प्रति व्यक्ति पर 84,447 रुपये का कर्ज बैठता है. अब सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने और सब्सिडी में जा रहा है.
श्रमिकों का पलायन: राज्य में बड़े उद्योग न होने के कारण रोजगार का संकट गहरा गया है. आंकड़ों के अनुसार, करीब 38 लाख से ज्यादा बंगाली श्रमिक आज दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करने को मजबूर हैं.
यह भी पढ़ें: कमाई में किंग हैं सिक्किम के लोग, औसत भारतीय से तीन गुना इनकम, चीन को देते हैं टक्कर
संपन्नता का पैमाना और भविष्य
आज का बंगाल एक विरोधाभास में खड़ा है. एक तरफ राज्य सरकार ‘कन्याश्री’ और अन्य सामाजिक योजनाओं के जरिए गरीबी कम करने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी ढांचा और औद्योगिक निवेश शून्य की ओर बढ़ रहा है. बिना बड़े उद्योगों के वापसी के, बंगाल के लिए अपनी पुरानी संपन्नता हासिल करना एक दूर का सपना नजर आता है.