Jockey की भारत से हो गई थी एग्जिट, फिर इस देसी कंपनी का मिला सहारा, आज 39880 करोड़ का साम्राज्य, जानें कैसे हुआ चमत्कार

जॉकी भारत में सिर्फ इनरवियर ब्रांड नहीं, बल्कि भरोसे और मजबूत बिजनेस मॉडल की मिसाल बन चुका है. पेज इंडस्ट्रीज के एक्सक्लूसिव लाइसेंस, 54 फीसदी ROE, मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन और वर्टिकल इंटीग्रेशन ने इसे 39,894 करोड़ रुपये के मार्केट कैप वाली कंपनी बनाया है. ऐसे में आखिर जॉकी ने भारतीयों के दिमाग में यह भरोसा कैसे बनाया. कैसे एक समय भारत से बाहर हो चुकी यह कंपनी दोबारा लौटी और आज कपड़ा बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना पाई. आइए जानते हैं.

जॉकी कंपनी की कहानी Image Credit: AI

भारत में अगर किसी ऐसे ब्रांड की बात की जाए, जिसे लोग बिना ज्यादा सोच-विचार के खरीद लेते हैं, तो उसमें Jockey का भी नाम आता है. महानगरों के बड़े मॉल हों या छोटे शहरों की साधारण कपड़ों की दुकानें, जॉकी के प्रोडक्ट लगभग हर जगह आसानी से मिल जाते हैं. पुरुष हों, महिलाएं हों या बच्चे, हर उम्र और हर वर्ग के लिए जॉकी का कोई न कोई प्रोडक्ट जरूर मौजूद होता है. यही वजह है कि दशकों से भारतीय ग्राहकों के लिए जॉकी सिर्फ एक कपड़ों का ब्रांड नहीं, बल्कि भरोसे का दूसरा नाम बन चुका है.

आज जॉकी केवल इनरवियर तक सीमित नहीं है. इसके पोर्टफोलियो में इनरवियर के साथ-साथ स्लीपवियर और एक्टिववियर भी शामिल हैं. कंपनी टी-शर्ट, ट्रैक पैंट, पायजामा और जॉगर्स जैसे प्रोडक्ट्स के अलावा सॉक्स, तौलिये और दूसरी एक्सेसरीज भी बनाती है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर जॉकी ने भारतीयों के दिमाग में यह भरोसा कैसे बनाया. कैसे एक समय भारत से बाहर हो चुकी यह कंपनी दोबारा लौटी और आज कपड़ा बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना पाई. आइए जानते हैं.

जॉकी की शुरुआत

जॉकी कंपनी की स्थापना साल 1876 में हुई थी. यह ब्रांड शुरुआत से ही इनरवियर कैटेगरी में नए प्रयोग और इनोवेशन के लिए जाना गया. समय के साथ जॉकी ने न सिर्फ अपने प्रोडक्ट बदले, बल्कि उन्हें बेचने और मार्केट करने का तरीका भी बदला. आज जॉकी दुनिया के 140 से ज्यादा देशों में अपने प्रोडक्ट बेचता है और कंफर्ट, क्वालिटी और वैल्यू इसकी पहचान बन चुकी है.

भारत में जॉकी की पहली एंट्री साल 1962 में एक लोकल पार्टनर के जरिए हुई थी. हालांकि यह कोशिश ज्यादा सफल नहीं रही. 1970 के दशक में सरकारी नियमों और पार्टनर से जुड़े कुछ मसलों के चलते जॉकी को भारत से अपना कारोबार समेटना पड़ा.

1993 में दूसरी एंट्री और सही पार्टनर की भूमिका

जॉकी ने 1993 में भारत में दोबारा कदम रखने का फैसला किया. इस बार हालात अलग थे. 1991 के बाद हुए लिबरलाइजेशन के चलते भारत का बिजनेस माहौल काफी बेहतर हो चुका था. इसी दौरान जॉकी को सही पार्टनर मिला—जेनोमल परिवार. ब्रिटिश-इंडियन जेनोमल परिवार 1959 से फिलीपींस में जॉकी को सफलतापूर्वक संभाल चुका था और उसे इस ब्रांड की गहरी समझ थी. 1994 में इस साझेदारी से Page Industries Limited की स्थापना हुई. इसी कंपनी को भारत में जॉकी के प्रोडक्ट बनाने, बेचने और मार्केट करने के पूरे अधिकार मिले यानी भारत में बिकने वाला हर जॉकी प्रोडक्ट पेज इंडस्ट्रीज की जिम्मेदारी है.

पेज इंडस्ट्रीज की सबसे बड़ी ताकत.

पेज इंडस्ट्रीज को भारत में जॉकी का एक्सक्लूसिव लाइसेंस मिला हुआ है. इसका मतलब यह है कि भारत में जॉकी के नाम से कोई दूसरी कंपनी प्रोडक्ट नहीं बना या बेच सकती. यह लाइसेंस 1994 से शुरू हुआ और अब इसे 2040 तक बढ़ा दिया गया है. इस लंबे समझौते ने कंपनी को स्थिरता और भरोसा दोनों दिया है.

सिर्फ भारत ही नहीं, पेज इंडस्ट्रीज को श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, मालदीव, भूटान, ओमान, कतर, बहरीन, कुवैत, यूएई और सऊदी अरब में भी जॉकी के एक्सक्लूसिव अधिकार मिले हुए हैं. इसके बदले कंपनी जॉकी को लगभग 5 प्रतिशत नेट सेल्स के रूप में रॉयल्टी देती है. यही एक्सक्लूसिव लाइसेंस पेज इंडस्ट्रीज का सबसे मजबूत इकोनॉमिक मोअट है, जो प्रतिस्पर्धियों को इस बिजनेस में आसानी से घुसने नहीं देता.

फैक्ट्री से ग्राहक तक कंट्रोल

सिर्फ लाइसेंस होना ही काफी नहीं होता. पेज इंडस्ट्रीज़ की असली ताकत उसके ऑपरेशंस में छिपी है. कंपनी अपने करीब 70 से 80 प्रतिशत कपड़े खुद बनाती है. इससे क्वालिटी पर पूरा कंट्रोल रहता है और जरूरत पड़ने पर तेजी से प्रोडक्शन बढ़ाया जा सकता है. कंपनी की ज्यादातर फैक्ट्रियां कर्नाटक में हैं और अब ओडिशा में भी एक आधुनिक फैक्ट्री लगाई जा रही है. इतनी बड़ी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता नए खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसके लिए भारी निवेश, समय और अनुभव चाहिए.

मजबूत ब्रांड और व्यापक डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क

जॉकी आज भारत में हर जगह नजर आता है. छोटे मोहल्ले की दुकानों से लेकर बड़े मॉल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक, इसका नेटवर्क बेहद मजबूत है. जॉकी के प्रोडक्ट 1 लाख से ज्यादा रिटेल स्टोर्स में मिलते हैं, जिनमें करीब 1,500 एक्सक्लूसिव ब्रांड आउटलेट शामिल हैं. साल 2022–23 के आसपास कंपनी ने ऑटो-रिप्लेनिशमेंट सिस्टम यानी ARS शुरू किया. यह AI आधारित सिस्टम हर स्टोर के स्टॉक पर नजर रखता है और जरूरत पड़ते ही नया माल भेज देता है. इससे स्टोर्स में जॉकी के प्रोडक्ट की उपलब्धता बनी रहती है और रिटेलर्स को भी बेहतर मुनाफा होता है.

भारत में इनरवियर को पहले बहुत निजी चीज माना जाता था. पेज इंडस्ट्रीज़ ने अपने विज्ञापनों के जरिए इसे एक कॉन्फिडेंट और प्रीमियम प्रोडक्ट के रूप में पेश किया. यही वजह है कि ग्राहक जॉकी के लिए थोड़ी ज्यादा कीमत देने को भी तैयार रहते हैं और बार-बार इसी ब्रांड को चुनते हैं.

क्या है कंपनी की फाइनेंशियल तस्वीर ?

फिलहाल पेज इंडस्ट्रीज लिमिटेड का मार्केट कैप 39,894 करोड़ रुपये है. शुक्रवार को कंपनी का शेयर 35,755 रुपये पर बंद हुआ, जो पिछले दिन के मुकाबले 0.36 प्रतिशत ऊपर था. Q2FY26 में कंपनी का रेवेन्यू 1,291 करोड़ रुपये रहा, जो Q2FY25 के 1,246 करोड़ रुपये से 3.6 प्रतिशत ज्यादा है. हालांकि Q1FY26 के मुकाबले इसमें 2.0 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. कंपनी का EBITDA 280 करोड़ रुपये रहा और नेट प्रॉफिट 195 करोड़ रुपये पर स्थिर रहा. पिछले पांच साल में कंपनी ने 26.64 प्रतिशत का रिटर्न दिया है. कंपनी का ROE करीब 54.24 प्रतिशत है.

इसे भी पढ़ें- OTT की बढ़ती पकड़ से दबाव में TV इंडस्ट्री, 3 साल में करीब 50 चैनलों ने लौटाया लाइसेंस; बड़े दिग्गज शामिल