बदल रहा है बिजली बिल का खेल! अब नए फॉर्मूले से पढ़ा जाएगा मीटर, क्या हर महीने बढ़ेगा आपकी जेब पर बोझ?
बिजली के बिल से जुड़ा सिस्टम अब बदलने की तैयारी में है. केंद्र सरकार के नए प्रस्ताव ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आने वाले समय में आपके मीटर की रीडिंग का मतलब क्या रहेगा और बिल कैसे तय होगा. क्या राज्यों की भूमिका कम होगी और क्या उपभोक्ताओं पर बोझ अपने-आप बढ़ेगा? पूरी तस्वीर समझने के लिए पढ़ें रिपोर्ट.
Index Linked Tariff Power bill: देश में बिजली के बिल पहले से ही आम आदमी के बजट पर भारी पड़ते हैं, लेकिन आने वाले समय में यह बोझ और बढ़ सकता है. केंद्र सरकार की नई नीति के मसौदे के तहत बिजली की कीमतों को महंगाई और लागत से जोड़ने की तैयारी है. अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो बिजली के दाम हर साल या तय अंतराल पर अपने-आप बढ़ सकते हैं. इसका मतलब यह है कि राज्यों की राजनीतिक या प्रशासनिक हिचकिचाहट के बावजूद उपभोक्ताओं को ज्यादा बिल चुकाना पड़ सकता है.
क्या है नई इंडेक्स-लिंक्ड टैरिफ व्यवस्था
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय बिजली नीति (NEP) के ड्राफ्ट में इंडेक्स-लिंक्ड टैरिफ का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत बिजली की दरें किसी तय इंडेक्स से जुड़ी होंगी. जैसे:
- कोयला महंगा होने से
- बिजली बनाने की लागत बढ़ने से
- डिस्कॉम का खर्च बढ़ने से
- तो बिजली का रेट भी उसी हिसाब से बढ़ जाएगा.
अगर राज्य बिजली नियामक आयोग समय पर टैरिफ में संशोधन नहीं करते, तो अपने-आप बिजली दरों में बढ़ोतरी हो सकती है. नीति का मकसद यह बताया गया है कि बिजली कंपनियों की वास्तविक लागत की भरपाई हो सके और घाटे की स्थिति न बने.
बिजली की लागत का पूरा गणित क्या कहता है
बिजली का बिल सिर्फ मीटर की रीडिंग से तय नहीं होता, इसके पीछे एक पूरा लागत ढांचा काम करता है. आंकड़ों के मुताबिक, देश में बिजली की औसत आपूर्ति लागत करीब 6.8 रुपये प्रति यूनिट है. इसमें बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन, वितरण और प्रशासनिक खर्च शामिल होता है.
लेकिन हकीकत यह है कि कई राज्यों में घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं से इससे कम कीमत वसूली जाती है. यही वजह है कि बिजली वितरण कंपनियों को हर यूनिट पर नुकसान उठाना पड़ता है. सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 में बिजली कंपनियों का औसत रेवेन्यू गैप करीब 0.5 रुपये प्रति यूनिट रहा, यानी जितनी लागत आई, उतनी वसूली नहीं हो सकी.
इस घाटे का असर सीधे कंपनियों की बैलेंस शीट पर पड़ता है. धीरे-धीरे कर्ज बढ़ता है और सिस्टम दबाव में आ जाता है. नई नीति में इसी अंतर को खत्म करने की बात कही गई है. इंडेक्स-लिंक्ड टैरिफ के जरिए बिजली की कीमत को वास्तविक लागत से जोड़ा जाएगा, ताकि जैसे ही खर्च बढ़े, उसी अनुपात में टैरिफ में संशोधन हो सके और कंपनियों को नुकसान न उठाना पड़े.
आम उपभोक्ता पर क्या पड़ेगा असर
इस नीति का सबसे सीधा असर घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है. आंकड़ों के अनुसार, देश की करीब 45 प्रतिशत बिजली खपत इन्हीं वर्गों से आती है. अभी औसतन बिजली आपूर्ति की लागत करीब 6.8 रुपये प्रति यूनिट है, जबकि कई राज्यों में उपभोक्ता इससे कम कीमत चुकाते हैं. इंडेक्स-लिंक्ड सिस्टम लागू होने पर यह अंतर धीरे-धीरे खत्म किया जाएगा. इसका मतलब है कि हर साल बिजली के बिल में कुछ न कुछ बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.
मान लीजिए आज आपके घर का बिजली बिल ₹1,000 आता है.
अभी क्या होता है? : बिजली का रेट तभी बढ़ता है जब राज्य सरकार या बिजली आयोग मंजूरी देता है. कई बार सरकारें चुनाव या विरोध के डर से रेट नहीं बढ़ातीं.
नई नीति में बदलाव के बाद क्या होगा?: अगर बिजली बनाने या खरीदने की लागत बढ़ती है, तो बिल भी ऑटोमैटिक बढ़ जाएगा. इसके लिए सरकार की अलग से मंजूरी जरूरी नहीं होगी.
हर महीने बदल सकता है बिल
नीति में यह भी संकेत दिया गया है कि बिजली खरीद की लागत में अगर महीने-दर-महीने बदलाव होता है, तो उसका असर सीधे उपभोक्ता के बिल पर डाला जा सकता है. इसके लिए डिस्कॉम को स्टेबलाइजेशन फंड बनाने की सलाह दी गई है, ताकि उतार-चढ़ाव को संभाला जा सके. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि उपभोक्ताओं को हर महीने अलग-अलग बिल देखने पड़ सकते हैं.
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फिलहाल यह नीति ड्राफ्ट के स्तर पर है और सरकार ने सभी हितधारकों से सुझाव मांगे हैं. अगर इसे मौजूदा रूप में लागू किया जाता है, तो बिजली क्षेत्र में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन बढ़ सकता है. लेकिन आम उपभोक्ता के लिए यह राहत से ज्यादा चिंता का कारण बन सकती है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार उपभोक्ता हित और कंपनियों की सेहत के बीच कैसे संतुलन बनाती है.