बैंकों के पास 11 लाख करोड़ कैश, लोन देने के लिए तलाश रहे ग्राहक; RBI ने दी चेतावनी

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों को लोन प्राइस वॉर से बचने की सलाह दी है. बैंकों के पास FCNR डिपॉजिट के जरिए करीब 11 लाख करोड़ रुपये का फ्रेश इनफ्लो आया है. ज्यादा लिक्विडिटी के बीच RBI को आक्रामक लेंडिंग और क्रेडिट मैट्रिक्स में नीचे तक जाने से एसेट क्वालिटी पर दबाव बढ़ने की चिंता है.

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Highlights

  • बैंकों के पास FCNR डिपॉजिट से करीब 11 लाख करोड़ रुपये का फ्रेश इनफ्लो आया है.
  • ज्यादा लिक्विडिटी के बीच RBI ने बैंकों को लोन प्राइस वॉर और आक्रामक लेंडिंग से बचने की चेतावनी दी है.
  • NBFC और फिनटेक लेंडिंग बढ़ने के साथ RBI की नजर एसेट क्वालिटी और क्रेडिट रिस्क पर भी है.

RBI Loan Price War: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों को लोन प्राइस वॉर से बचने की सलाह दी है. RBI को आशंका है कि सिस्टम में ज्यादा लिक्विडिटी होने के कारण बैंक तेजी से लोन बांटने के लिए ब्याज दरों में कटौती कर सकते हैं. ऐसे में बैंक ज्यादा से ज्यादा लोन देने के लिए क्रेडिट मैट्रिक्स में नीचे तक जा सकते हैं, जिससे आने वाले वर्षों में एसेट क्वालिटी पर दबाव बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है. RBI के डिप्टी गवर्नर रोहित जैन ने मंगलवार को वरिष्ठ बैंकरों के साथ हुई बैठक में इस चिंता को सामने रखा. बैठक में बैंकों की लिक्विडिटी स्थिति और तेजी से बढ़ते लोन डिस्बर्समेंट से जुड़े जोखिमों पर चर्चा हुई.

FCNR डिपॉजिट से बैंकों के पास आया भारी पैसा

बैंकों के पास बड़ी मात्रा में लिक्विडिटी आने की एक प्रमुख वजह फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट यानी FCNR डिपॉजिट से होने वाला इनफ्लो है. ET की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने FCNR डिपॉजिट के रिन्यूअल को शामिल करने के बाद बैंकों को करीब 11 लाख करोड़ रुपये का फ्रेश इनफ्लो मिला है.

इस अतिरिक्त लिक्विडिटी को मैनेज करने के लिए RBI ने अलग-अलग उपाय किए हैं. RBI ने फॉरेन करेंसी इंटरवेंशन के जरिए स्वैप और स्पॉट डॉलर सेल के माध्यम से करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी एब्जॉर्ब की है. इसके अलावा ओपन मार्केट ऑपरेशंस के तहत बॉन्ड सेल और बैंकों से लॉन्ग-टर्म रिवर्स रेपो विंडो में बॉरोइंग के जरिए करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी भी सिस्टम से बाहर की गई है.

लिक्विडिटी वापस आने का भी खतरा

हालांकि, RBI की ओर से लिक्विडिटी एब्जॉर्ब करने के लिए अपनाए गए सभी उपाय लंबे समय के लिए नहीं हैं. रिवर्स रेपो जैसे कुछ उपाय शॉर्ट-टर्म नेचर के हैं. ऐसे में एक महीने के बाद यह पैसा दोबारा मनी मार्केट में लौट सकता है. फिलहाल मनी मार्केट में लिक्विडिटी टाइट दिखाई दे रही है, लेकिन गवर्नमेंट स्पेंडिंग बढ़ने के साथ सिस्टम में पैसा वापस आने की संभावना है. यही वजह है कि RBI बैंकों की लोन ग्रोथ को लेकर सतर्क है.

डिपॉजिट कॉस्ट निकालने के लिए लोन में बढ़ सकती है प्रतिस्पर्धा

बैंकों के सामने इस समय बड़ी मात्रा में उपलब्ध पैसे को प्रोडक्टिव एसेट्स में लगाने की चुनौती है. अगर बैंक इस पैसे को गवर्नमेंट बॉन्ड्स या RBI के पास रखते हैं, तो उन्हें सीमित रिटर्न मिलता है. एक बैंक CEO ने ET को बताया कि किसी बैंक के लिए लोन पर करीब 2.5% का मार्क-अप और करीब 3% का नेट इंटरेस्ट मार्जिन हासिल करना जरूरी है.

तभी ज्यादा लिक्विडिटी को लोन में बदलना व्यावहारिक माना जा सकता है. बैंक आने वाले महीनों में क्रेडिट डिमांड, खासकर रिटेल क्रेडिट में तेजी की उम्मीद कर रहे हैं. हालांकि, ईयर-ऑन-ईयर रिटेल क्रेडिट ग्रोथ करीब 16% है, जो कुल क्रेडिट ग्रोथ के करीब 19% से कम है.

NBFC और फिनटेक लेंडिंग पर भी नजर

RBI की चिंता केवल बैंकों के डायरेक्ट लेंडिंग तक सीमित नहीं है. NBFCs को दिए जाने वाले लोन्स की ग्रोथ भी काफी तेज है. ऐसे में बैंकों की ओर से NBFCs को ज्यादा लेंडिंग करने का जोखिम बना हुआ है. एक एनालिस्ट के मुताबिक, NBFCs और फिनटेक फर्म्स आगे इसी पैसे को दूसरे बॉरोअर्स तक पहुंचा सकते हैं.

ऐसे बॉरोअर्स की क्रेडिट-वर्दीनेस हमेशा मजबूत हो, यह जरूरी नहीं है. इसलिए अगर बैंक केवल लोन ग्रोथ बढ़ाने के लिए लेंडिंग स्टैंडर्ड्स में ढील देते हैं, तो आने वाले वर्षों में यह खराब एसेट क्वालिटी के रूप में सामने आ सकता है.

इंटरेस्ट रेट पर भी MPC के फैसले पर नजर

यह चुनौती ऐसे समय सामने आई है, जब मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी यानी MPC को इंटरेस्ट रेट को लेकर फैसला करना है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से रेट इनक्रीज के बाद भारत में भी इंटरेस्ट रेट को लेकर चर्चा तेज है. हालांकि, पॉलिसी मेकर्स के सामने कंजम्पशन और इन्फ्लेशन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है. फेस्टिवल सीजन की शुरुआत में रेट इनक्रीज से कंजम्पशन पर असर पड़ सकता है. इसलिए इंटरेस्ट रेट में बदलाव के टाइमिंग को लेकर भी सावधानी जरूरी मानी जा रही है.

क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड को लेकर RBI की सख्ती

बैठक के दौरान RBI ने बैंक्स को क्लाइंट्स के अनसेटल्ड क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड्स को जल्द से जल्द क्लोज करने की जरूरत पर भी जोर दिया. नई ट्रेड पेमेंट रेगुलेशंस 1 अक्टूबर से लागू होने वाली हैं. इसके साथ ही RBI ने बैंक्स से फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स यानी FPIs के लिए प्रोसीजर्स को सरल बनाने के उपाय तलाशने को कहा है. रिटेल कस्टमर्स के लिए फॉरेन एक्सचेंज और गवर्नमेंट सिक्योरिटीज तक पहुंच आसान बनाने पर भी जोर दिया गया.

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