RBI का बड़ा फैसला, बैंकों के लिए IFR रिजर्व रखना अब जरूरी नहीं; जानिए क्या बदला
RBI ने बैंकों के लिए इनवेस्टमेंट फ्लक्चुएशन रिजर्व यानी IFR बनाए रखने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है. यह नियम 18 मई 2026 से लागू हो गया है. अब बैंकों को निवेश के वैल्यू में गिरावट से बचाव के लिए अलग अतिरिक्त रिजर्व रखने की जरूरत नहीं होगी.
RBI ने बैंकों के लिए इनवेस्टमेंट फ्लक्चुएशन रिजर्व यानी (IFR) बनाए रखने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है. RBI का यह नया नियम 18 मई 2026 से लागू हो गया है. अब कमर्शियल बैंकों को निवेश के वैल्यू में गिरावट से बचाव के लिए अलग से अतिरिक्त रिजर्व रखने की जरूरत नहीं होगी. केंद्रीय बैंक ने कहा कि बाजार रिस्क और निवेश व्यवस्था में हुए बदलावों को देखते हुए पुराने नियमों में बदलाव जरूरी था. इस फैसले से बैंकों को अपने रिजर्व और कैपिटल मैनेजमेंट में अधिक लचीलापन मिल सकता है. RBI ने इस संबंध में संशोधित दिशा निर्देश भी जारी किए हैं.
क्या होता है इनवेस्टमेंट फ्लक्चुएशन रिजर्व
इनवेस्टमेंट फ्लक्चुएशन रिजर्व (IFR) एक एक्ट्रा सेफ्टी रिजर्व होता था जिसे बैंक अपने निवेश के वैल्यू में संभावित गिरावट से बचाव के लिए रखते थे. जब बांड कंसीडरेशन या बाजार में उतार चढ़ाव के कारण निवेश की कीमत घटती थी तब यह रिजर्व बैंकों को नुकसान से बचाने में मदद करता था. IFR को बाजार वैल्यूएशन नियमों के तहत जरूरी माना जाता था. अब RBI ने इस व्यवस्था को समाप्त करने का फैसला लिया है.
18 मई 2026 से लागू हुआ नया नियम
RBI ने कहा है कि IFR बनाए रखने की अनिवार्यता 18 मई 2026 से खत्म कर दी गई है. इसके साथ ही 17 मई 2026 तक IFR में मौजूद राशि को Statutory रिजर्व, सामान्य रिजर्व या प्रॉफिट और लॉस अकाउंट में ट्रांसफर किया जाएगा. इससे बैंकों को अपने रिजर्व मैनेजमेंट में ज्यादा लचीलापन मिल सकता है और वित्तीय प्रबंधन आसान हो सकता है.
विदेशी बैंकों के लिए भी जारी हुए निर्देश
RBI ने भारत में अकाउंट सिस्टम के तहत काम कर रहे विदेशी बैंकों के लिए भी अलग दिशा निर्देश जारी किए हैं. केंद्रीय बैंक के मुताबिक विदेशी बैंक IFR में मौजूद अमाउंट को भारत में रखे गए Statutory रिजर्व या Non-repatriable surplus में ट्रांसफर करेंगे. यह राशि तब तक भारत में रहेगी जब तक संबंधित बैंक यहां अपना कारोबार जारी रखेगा.
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सहकारी बैंकों और छोटे बैंकों पर भी असर
RBI ने सहकारी बैंकों, स्मॉल फाइनेंस बैंकों और पेमेंट बैंकों के लिए भी अलग सर्कुलर जारी किए हैं. नए नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि IFR में ट्रांसफर केवल कंपलसरी एप्रोप्रियेट के बाद नेट फ्रॉफिट से किया जाएगा. इससे अलग- अलग बैंकिंग कैटेगरी में अकाउंटिंग प्रोसेस को अधिक स्पष्ट और आसान बनाने की कोशिश की गई है.
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