चेक बाउंस मामले में आपसी समझौते से मिल सकती है जेल से राहत, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; HC का आदेश पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर आरोपी और शिकायतकर्ता आपस में समझौता कर लेते हैं तो जेल की सजा से बचा जा सकता है. कोर्ट ने साफ किया कि धारा 138 के तहत चेक dishonour अपराध भले ही आपराधिक माना जाता है, लेकिन यह मूल रूप से सिविल विवाद है और धारा 147 के तहत किसी भी चरण में निपटाया जा सकता है.
Cheque Bounce: सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा कि अगर आरोपी और शिकायतकर्ता आपस में समझौता कर लेते हैं तो आरोपी को जेल की सजा से बचाया जा सकता है. कोर्ट ने साफ किया कि एक बार समझौते पर साइन होने के बाद धारा 138 के तहत हुई सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता. यह फैसला लाखों लोगों को राहत देने वाला माना जा रहा है.
सिविल विवाद को बनाया गया आपराधिक मामला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चेक dishonour मूल रूप से एक सिविल विवाद है जिसे आपराधिक मुकदमे के दायरे में लाया गया ताकि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स की विश्वसनीयता बनी रहे. अदालत ने इसे एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए “Civil Sheep in Criminal Wolfs Clothing” बताया, जिसका मतलब है कि यह निजी विवाद है लेकिन इसे आपराधिक ढांचे में शामिल किया गया है.
समझौते के बाद सजा बरकरार नहीं
जस्टिस अरविंद कुमार और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि जब पक्षकार आपसी सहमति से समझौते पर साइन कर लेते हैं और शिकायतकर्ता पूरी रकम स्वीकार कर लेता है तो धारा 138 के तहत चल रही कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती. अदालत ने कहा कि समझौते का मकसद मुकदमे की प्रक्रिया से बचना है और ऐसे में अदालतें इस प्रक्रिया को रोक नहीं सकतीं.
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का आदेश रद्द
यह फैसला तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक आदेश को रद्द किया. हाई कोर्ट ने समझौते के बावजूद सजा खत्म करने से इनकार कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद को निपटा चुके हैं तो अदालत को उस समझौते का सम्मान करना चाहिए और सजा को खत्म करना होगा.
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किसी भी चरण पर हो सकता है समझौता
अदालत ने यह भी साफ किया कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 147 के तहत चेक बाउंस का मामला किसी भी चरण पर निपटाया जा सकता है. यानी समझौता कार्यवाही के बीच या बाद में भी हो सकता है. अदालत ने कहा कि अगर समझौता स्वेच्छा से हुआ है तो दोषसिद्धि (Conviction) को बनाए रखना संभव नहीं है.
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