टाटा समूह के भीतर हर दिन दरकती भरोसे की दीवार, ट्रस्ट्स के लिए एक और मुसीबत; अब विजय सिंह ने की जांच की मांग

Tata Sons Controversy: विवाद अब कामकाज और गवर्नेंस की जांच की मांग तक पहुंच गया है. टाटा ट्रस्ट्स के वाइस चेयरमैन और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) के ट्रस्टी विजय सिंह ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर से संपर्क किया है.

टाटा समूह के भीतर कलह Image Credit: money9live

Highlights

  • विवाद अब कामकाज और गवर्नेंस की जांच की मांग तक पहुंच गया है.
  • SDTT और टाटा ट्रस्ट्स की बढ़ती दखलअंदाजी पर चिंता जताई है.
  • बुधवार को टाटा ट्रस्ट्स ने चैरिटेबल कमिश्नर के सामने अपनी बात रखी.

Tata Sons Controversy: टाटा समूह के भीतर भरोसे के दीवार की एक ईंट हर रोज दरकती जा रही है. मामला टाटा संस की लिस्टिंग और एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति से आगे निकल चुका है. विवाद अब कामकाज और गवर्नेंस की जांच की मांग तक पहुंच गया है. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स के वाइस चेयरमैन और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) के ट्रस्टी विजय सिंह ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर से संपर्क किया है.

उन्होंने चैरिटेबल ट्रस्ट के कामकाज और गवर्नेंस की तुरंत जांच की मांग की है, जिसमें टाटा संस के कमर्शियल और स्ट्रैटेजिक मामलों में ट्रस्ट की भूमिका भी शामिल है.

चैरिटी कमिश्नर को लिखा पत्र

सिंह ने ET को बताया, ‘मैंने वेणु श्रीनिवासन के साथ लगभग उसी समय चैरिटी कमिश्नर को पत्र लिखकर वैसी ही चिंताएं जताई हैं.’ टाटा ट्रस्ट्स के वाइस चेयरमैन और टाटा संस बोर्ड में इसके जॉइंट नॉमिनी डायरेक्टर श्रीनिवासन ने नोएल टाटा के ‘परपेचुअल ट्रस्टी’ (हमेशा के लिए ट्रस्टी) के तौर पर नियुक्ति और बने रहने की स्थिति की जांच की मांग की है.

साथ ही, उन्होंने उस आधार की भी जांच की मांग की है जिस पर नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन का पद संभाला और उस पर बने हुए हैं. उन्होंने ट्रस्टी के तौर पर नोएल टाटा के बेटे नेविल टाटा की नियुक्ति की भी जांच की मांग की है.

ट्रस्टियों की भूमिका की जांच की मांग

सिंह ने इस बात की भी जांच की मांग की कि उन्हें (श्रीनिवासन को) फैसले लेने की अहम प्रक्रियाओं से क्यों अलग रखा गया. सिंह की बातें भी इसी तरह की हैं. वे चाहते हैं कि टाटा संस के कमर्शियल और रणनीतिक मामलों में SDTT और उसके ट्रस्टियों की भूमिका की जांच हो. उन्होंने टाटा संस से जुड़े मामलों में SDTT और टाटा ट्रस्ट्स की बढ़ती दखलअंदाजी पर चिंता जताई है.

चैरिटी कमिश्नर को लिखे पत्र में सिंह ने कहा, ‘टाटा संस में SDTT की बड़ी हिस्सेदारी का मतलब यह नहीं है कि ट्रस्ट किसी कमर्शियल कंपनी की तरह काम करने लगे या टाटा संस के बिज़नेस के मामलों में सीधे तौर पर शामिल हो.

टैक्स रजिस्ट्रेशन और छूट पर खतरा

सिंह ने ऐसी दखलअंदाजी से टैक्स से जुड़े संभावित नतीजों की ओर भी इशारा किया. उन्होंने रजिस्टर्ड नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं की कमर्शियल गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले इनकम टैक्स एक्ट, 2025 के प्रावधानों का हवाला दिया. उनका तर्क है कि जो गतिविधियां ट्रस्ट के चैरिटेबल उद्देश्यों से सीधे तौर पर जुड़ी नहीं हैं, उनसे ट्रस्ट के टैक्स रजिस्ट्रेशन और छूट पर खतरा आ सकता है.

उन्होंने कहा कि टाटा संस में SDTT की हिस्सेदारी की बड़ी वैल्यू को देखते हुए, ट्रस्ट और उसके चैरिटेबल फंड पर इसके बहुत बड़े असर पड़ सकते हैं.

कार्रवाई की मांग

श्रीनिवासन और सिंह की ये दोनों बातें अब महाराष्ट्र चैरिटेबल कमिश्नर के सामने हैं. बुधवार को टाटा ट्रस्ट्स ने चैरिटेबल कमिश्नर के सामने अपनी बात रखी और मांग की कि शिकायतों पर कोई भी आधिकारिक फैसला लेने से पहले उनकी बात सुनी जाए.

सिंह ने जांच के नतीजों के आधार पर आगे की कार्रवाई की मांग की है. इसमें जरूरत पड़ने पर ट्रस्टियों को सस्पेंड या हटाना और महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट के तहत ट्रस्टियों की नियुक्ति शामिल है.

मतभेदों के बीच उठा सवाल

उन्होंने एक्ट की धारा 36A(1) के तहत निर्देश देने की भी मांग की है, ताकि इंस्पेक्टर की जांच पूरी होने तक SDTT और उसके बोर्ड को मीटिंग बुलाने, सर्कुलर रिजॉल्यूशन पास करने या ट्रस्ट के एडमिनिस्ट्रेशन, मैनेजमेंट या बनावट से जुड़ी प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने से रोका जा सके. सिंह ने मांग की है कि जांच पूरी होने तक SDTT बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की बनावट को लेकर यथास्थिति (status quo) बनाए रखी जाए.

उनका यह कदम टाटा ट्रस्ट्स के भीतर SDTT के कामकाज और टाटा संस से जुड़े मामलों में उसके ट्रस्टियों की भूमिका को लेकर बढ़ते मतभेदों के बीच उठाया गया है.

यह घटनाक्रम SRTT से जुड़ी कार्यवाही के बैकग्राउंड में भी सामने आया है. मई में, महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर अमोघ एस. कालोटी ने SRTT के बोर्ड को निर्देश दिया कि वे 16 मई की बैठक टाल दें और इंस्पेक्टर की रिपोर्ट जमा होने तक ऐसी बैठकें न बुलाएं. यह निर्देश बोर्ड के गठन और महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट की धारा 30A(2) का कथित तौर पर पालन न करने से जुड़ी शिकायतों के बाद दिया गया था.

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