ईरान युद्ध से एशिया में ऊर्जा संकट की दूसरी लहर, हफ्ते में 4 दिन काम, फ्लाइट्स में कटौती जैसे जुगाड़ अपना रहे देश
सरकारों को कई मुश्किल फैसले लेने पड़े. कारोबार की रफ्तार धीमी होने का जोखिम उठाकर भी बिजली बचाना, उर्वरक (खाद) उत्पादन पर असर पड़ने की परवाह किए बिना घरों के लिए गैस को प्राथमिकता देना और कुछ समय की राहत पाने के लिए ऊर्जा के सुरक्षित भंडारों का इस्तेमाल करने जैसे कदम उठाने पड़े.
ईरान युद्ध से पैदा हुए एनर्जी संकट से निपटने के लिए एशिया के शुरुआती सुरक्षा उपाय अब कम पड़ने लगे हैं और अब इसके असर की दूसरी अधिक गंभीर लहर सामने आने लगी है. जब युद्ध शुरू हुआ, तो सरकारें होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के बंद होने की स्थिति से निपटने के लिए तेजी से कदम उठाने लगीं. यह स्ट्रेट एशिया को ऊर्जा की आपूर्ति करने वाली एक बेहद अहम कड़ी है. सरकारों को कई मुश्किल फैसले लेने पड़े.
कारोबार की रफ्तार धीमी होने का जोखिम उठाकर भी बिजली बचाना, उर्वरक (खाद) उत्पादन पर असर पड़ने की परवाह किए बिना घरों के लिए गैस को प्राथमिकता देना और कुछ समय की राहत पाने के लिए ऊर्जा के सुरक्षित भंडारों का इस्तेमाल करने जैसे कदम उठाने पड़े.
फैल रहा है फ्यूल संकट
लेकिन ये उपाय इस सोच पर आधारित थे कि युद्ध सिर्फ थोड़े समय के लिए चलेगा, जिससे एनर्जी का फ्लो जल्दी से फिर से शुरू हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. युद्ध का कोई साफ अंत नजर न आने से फ्यूल का संकट अब अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं में फैल रहा है.
हवाई किराया, शिपिंग रेट और यूटिलिटी बिल बढ़ रहे हैं, जिससे आर्थिक विकास खतरे में पड़ गया है. यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम के अनुसार, लगभग 8.8 मिलियन लोगों के गरीबी में धकेले जाने का खतरा है और इस संघर्ष से एशिया-प्रशांत क्षेत्र को 299 अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान हो सकता है.
हिल गया बजट
न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार, अमेरिका स्थित थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सामंथा ग्रॉस ने कहा, ‘जिन देशों के पास जवाब देने के लिए सबसे कम संसाधन हैं, या जो उपभोक्ता कीमत चुकाने में सबसे कम सक्षम हैं, वे ही सबसे पहले हर चीज का असर महसूस करते हैं.’ एशियाई सरकारों ने अपने बजट इस अनुमान के आधार पर बनाए थे कि तेल की औसत कीमत लगभग 70 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहेगी. सब्सिडी की मदद से ईंधन की कीमतें स्थिर बनी रहीं. लेकिन युद्ध के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर लगभग 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई.
महंगी सब्सिडी
कुआलालंपुर के स्वतंत्र ऊर्जा विश्लेषक अहमद रफदी एंडुट ने कहा कि सरकारों के सामने अब एक कठिन विकल्प है. या तो वे उन महंगी सब्सिडी को जारी रखें, जिससे सरकारी खजाने पर बोझ पड़ेगा या फिर उन्हें कम करके बढ़ी हुई लागत का भार उपभोक्ताओं पर डाल दें, जिससे उन्हें जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है.
हफ्ते में चार दिन काम
फिलीपींस ने ईंधन बचाने के लिए तेजी से चार-दिन के काम वाले हफ्ते को अपना लिया. इसने गरीब परिवारों के लिए टारगेटेड सब्सिडी भी शुरू की. हालांकि, फिच रेटिंग्स ने बताया कि ज्यादातर उपभोक्ता अभी भी ऊर्जा के लिए ज्यादा कीमत चुका रहे हैं, जिससे मनीला जैसे बड़े शहरों में व्यावसायिक गतिविधियां धीमी पड़ गई हैं.
थाईलैंड ने संघर्ष शुरू होने के एक महीने से भी कम समय में डीजल की कीमतों पर लगी सीमा हटा दी, क्योंकि उसकी ईंधन सब्सिडी खत्म हो गई थी. अब वह तेल की बढ़ती कीमतों को संभालने के लिए दूसरे खर्चों में कटौती कर रहा है, और साथ ही अपने बजट को भी काबू में रखने की कोशिश कर रहा है.
वियतनाम में जेट फ्यूल की कमी
वियतनाम ने घरेलू कीमतों पर दबाव कम करने के लिए ईंधन टैक्स पर लगी रोक को आगे बढ़ा दिया है. जेट फ्यूल की कमी के कारण उड़ानों में कटौती करनी पड़ी है. पर्यटन वियतनाम के ग्रॉस घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 8% हिस्सा है, जो देश में बनने वाले सभी सामानों और सेवाओं का कुल उत्पादन होता है. इसलिए इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
महंगाई का जोखिम
कुआलालंपुर में एंडुट ने कहा कि सरकारें वेलफेयर जैसी दूसरी प्राथमिकताओं पर खर्च में कटौती करके महंगे ईंधन पर सब्सिडी जारी रख सकती हैं, या ज्यादा उधार लेकर अधिक महंगाई का जोखिम उठा सकती हैं. इसके अलावा, वे सब्सिडी कम कर सकती हैं और बढ़ी हुई कीमतें ग्राहकों पर डाल सकती हैं, जिससे वोटरों के नाराज होने का जोखिम रहता है. एक बार जब सब्सिडी खत्म हो जाएगी और महंगाई बढ़ने लगेगी, तो देशों को उस चीज का सामना करना पड़ सकता है जिसे उन्होंने ‘फिस्कल टाइम बम’ कहा.
क्या तुरंत मिलेगी राहत?
युद्ध के आखिरकार खत्म होने से एशिया को तुरंत राहत नहीं मिलेगी. ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के ग्रॉस ने कहा कि ग्लोबल ऑयल एंड गैस व्यापार तुरंत पटरी पर नहीं लौटेगा, और उत्पादन फिर से शुरू होने में समय लगेगा. खराब हुए इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत करने, सुविधाओं को फिर से चालू करने और मिडिल ईस्ट से आखिरी बाजारों तक ट्रांसपोर्ट में लगने वाले समय को देखते हुए इसमें हफ्ते या शायद महीने भी लग सकते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप पर भी एशिया जैसा ही असर पड़ेगा, लेकिन लगभग चार हफ्ते की देरी से यह नजर आएगा.
अमेरिका में भी परेशानी
अमेरिका भर में गैस की कीमतें बढ़ने से अमेरिकियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन यूरेशिया ग्रुप कंसल्टेंसी फर्म के हेनिंग ग्लोयस्टीन ने कहा कि दक्षिण-पूर्व एशिया अभी ‘सबसे बड़ी परेशानी की जगह’ है.
अफ्रीका में भी बजट पर दबाव
अफ्रीका में भी ऊर्जा और आयात की बढ़ती लागतें इसी तरह बजट पर दबाव डाल रही हैं, जिससे घाटा बढ़ रहा है और महंगाई में उछाल आ रहा है. इस युद्ध का असर लैटिन अमेरिका और कैरिबियन पर भी पड़ रहा है, जहां आर्थिक विकास की गति थोड़ी धीमी होने का अनुमान है. सप्लाई चेन रिस्क फर्म Interos.ai के CEO टेड क्रैंट्ज़ ने चेतावनी दी कि वैश्विक सप्लाई चेन में आई ये जटिल बाधाएं आगे भी व्यापक असर डालती रहेंगी.
सिंगापुर स्थित ISEAS-Yusof Ishak Institute की मारिया मोनिका विहार्दजा ने कहा कि यह संकट एशिया के बढ़ते मध्यम वर्ग की कमजोरी को भी उजागर करता है, जहां कई लोगों के दोबारा गरीबी की गर्त में चले जाने का खतरा बना हुआ है.
उन्होंने कहा कि ऊर्जा संकट समय के साथ दक्षिण-पूर्व एशिया की अर्थव्यवस्थाओं का स्वरूप बदल देगा. इसमें रोजगार के बाजारों में आने वाले बदलाव और भविष्य के ऊर्जा संकटों से निपटने के लिए देशों द्वारा बनाई जाने वाली योजनाएं भी शामिल हैं.
लॉन्ग टर्म समाधानों पर चर्चा
विभिन्न देश पहले से ही लॉन्ग टर्म समाधानों पर चर्चा कर रहे हैं और उन्हें लागू भी कर रहे हैं, जैसे कि फॉसिल फ्यूल के आपूर्तिकर्ताओं का दायरा बढ़ाना, तथा परमाणु ऊर्जा और सोलर एनर्जी जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विकास करना.
एशियाई विकास बैंक के अल्बर्ट पार्क ने कहा कि इस युद्ध के चलते दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्थिक परिदृश्य में भू-राजनीतिक जोखिम एक केंद्रीय मुद्दा बन गया है, और यह सीधे तौर पर इस क्षेत्र के आर्थिक विकास की गति को धीमा कर रहा है. उन्होंने कहा, ‘यह युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, इसके नकारात्मक प्रभाव भी उतने ही अधिक गंभीर होंगे.’
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