तमिलनाडु में ‘विजय’, बंगाल में ‘शुभेंदु’…अब ‘महंगे’ वादे निभाने की बारी, खर्च करने होंगे ₹1.60 लाख करोड़ एक्सट्रा

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनाव नतीजों ने जहां सत्ता समीकरण बदले, वहीं राज्यों की वित्तीय सेहत पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. भारी-भरकम चुनावी वादों से राजकोषीय घाटा बढ़ने का खतरा है, जिससे विकास खर्च प्रभावित हो सकता है और आर्थिक संतुलन पर दबाव बढ़ेगा.

लोकलुभावन राजनीति भारत Image Credit: Money9 Live

West Bengal And Tamil nadu Parties manifesto budget: 4 मई को जारी विधानसभा चुनाव कहीं ‘सरप्राइज’ तो कहीं ‘संतोष’ लेकर आया. पश्चिम बंगाल में जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में दशकों पुराना किला ढाहकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है, वहीं तमिलनाडु में थलापति विजय की पार्टी (TVK) ने दशकों से चले आ रहे द्रविड़ राजनीति की ‘डुओपोली’ (DMK-AIADMK) को ध्वस्त कर दिया है. जीत का जश्न अभी जारी है, लेकिन अब आपको नजर राज्यों की खाता-बही पर भी डालना चाहिए. जो आने वाले समय में मजबूती से निचोड़े जाने वाले हैं ताकि पार्टियों के वादों को निभाया जा सके.

चुनावी वैतरणी पार करने के लिए राजनीतिक दलों ने ‘लोकलुभावनवाद’ का जो सहारा लिया है, उसका सीधा असर अब राज्यों के खजाने पर पड़ने वाला है. एमके रिसर्च (Emkay Research) की ताजा रिपोर्ट चेतावनी दे रही है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में किए गए भारी-भरकम वादे राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को एक मुश्किल स्तर पर ले जा सकते हैं.

बंगाल में BJP का 3000 रुपये का दांव

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत को एक ‘टेक्टोनिक शिफ्ट’ माना जा रहा है. 2016 में मात्र 3 सीटों से शुरू हुआ सफर 2026 में 200 के पार पहुंच गया है. एंटी-इनकंबेंसी के बाद इस जीत का सबसे बड़ा आधार बना महिलाओं के लिए किया गया ‘कैश ट्रांसफर’ का वादा.

भाजपा ने अपने मेनिफेस्टो में महिलाओं को दी जाने वाली राशि को दोगुना करने का वादा किया है. अभी तक राज्य में करीब 1,500 रुपये प्रति माह मिलते थे, जिसे बढ़ाकर 3,000 रुपये करने का प्रस्ताव है. अकेले इस एक स्कीम से बंगाल के बजट पर भारी दबाव पड़ेगा.

योजना (West Bengal – BJP)विवरणअनुमानित खर्च (Rs bn)GDP का %
महिलाओं को नकद हस्तांतरणRs 3,000 प्रति माह8714.1%
युवा बेरोजगारी सहायताRs 3,000 प्रति माह1000.5%
कुल अतिरिक्त बोझइंक्रीमेंटल बजट इम्पैक्ट
(बजट में पहले से शामिल योजनाओं को हटाकर)
7263.4%
नोट- तृणमूल कांग्रेस शासन में GDP का 1.1% हिस्सा राज्य स्कीम में खर्च होता था.

रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल का राजकोषीय घाटा (FD/GDP) जो पहले ही 3% के आसपास रहा है, इन वादों के बाद और अधिक बढ़ सकता है. चुनावी वादों को पूरा करने में राज्य की GDP का लगभग 3.4% हिस्सा अतिरिक्त खर्च होगा.

तमिलनाडु में TVK का ‘बिग-टिकट’

तमिलनाडु में विजय (TVK) की एंट्री ने न केवल समीकरण बदले, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) की नई परिभाषा लिख दी. TVK ने महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को केंद्र में रखकर ‘बिग-टिकट’ वादे किए हैं.

विजय की पार्टी ने महिलाओं के लिए 2,500 रुपये प्रति माह और बेरोजगार स्नातकों के लिए 4,000 रुपये प्रति माह की सहायता का वादा किया है. इसके अलावा मुफ्त बिजली और एलपीजी सिलेंडर जैसे वादों ने उन्हें सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया है. लेकिन क्या राज्य का खजाना इसकी इजाजत देता है?

  • इंक्रीमेंटल इम्पैक्ट: तमिलनाडु पर इन वादों को पूरा करने का अतिरिक्त बोझ लगभग 879 अरब रुपये होगा, जो राज्य की GDP का 2.2% है.
  • शिक्षा और अन्य: स्कूल ड्रॉपआउट रोकने के लिए माताओं को सालाना 15,000 रुपये और किसानों को 15,000 रुपये की सहायता भी इस बोझ को बढ़ाएगी.
योजना (TVK – Tamil Nadu)विवरणअनुमानित खर्च (Rs bn)GDP का %
महिलाओं को नकद हस्तांतरण60 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं को Rs 2,500/माह3450.8%
महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रामौजूदा योजना को जारी रखना400.1%
मुफ्त बिजलीप्रति परिवार 200 यूनिट/माह590.1%
मुफ्त एलपीजी (LPG) सिलेंडरप्रति परिवार सालाना 6 मुफ्त सिलेंडर1140.3%
सामाजिक पेंशनबुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को Rs 3,000/माह540.1%
बेरोजगारी सहायताबेरोजगार ग्रेजुएट्स को Rs 4,000 और डिप्लोमा धारकों को Rs 2,500/माह1110.3%
MSME सहायताघोषित बड़ा पैकेज (अभी विवरण स्पष्ट नहीं)1500.4%
किसानों को सहायताभूमि मालिक किसानों को Rs 15,000/वर्ष सहायता1200.3%
शिक्षा सहायतास्कूल ड्रॉपआउट रोकने के लिए माताओं को Rs 15,000/वर्ष640.2%
कुल खर्चइन सभी योजनाओं का कुल योग1,0572.6%
अतिरिक्त बजट बोझइंक्रीमेंटल बजट इम्पैक्ट 8792.2%
सोर्स- TVK मेनिफेस्टो, एमके रिसर्च

क्या ‘फ्रीबीज’ बन गई हैं जीत की गारंटी?

दोनों राज्यों के एक्सट्रा खर्च को जोड़ें तो आंकड़ा 1.60 लाख करोड़ से ऊपर जाता है. रिपोर्ट एक चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा करती है. 2023 के बाद से जिन 10 बड़े राज्यों में चुनाव हुए, वहां एक पैटर्न दिखा है, चुनाव वाले साल में राजकोषीय घाटा (FD) औसतन 1% बढ़ जाता है और अगले साल भी इसमें कोई कमी नहीं आती. यानी एक बार जो ‘मुफ्त’ की योजना शुरू हो गई, उसे बंद करना राजनीतिक रूप से असंभव हो जाता है.

इससे राज्यों का रेवेन्यू खर्च तो बढ़ रहा है, लेकिन कैपेक्स यानी बुनियादी ढांचे पर होने वाला निवेश स्थिर पड़ा है. सरल शब्दों में कहें तो, राज्य सरकारें सड़कों, पुलों और अस्पतालों पर खर्च करने के बजाय सीधे पैसे बांटने को प्राथमिकता दे रही हैं.

3% की सीमा, अब सीलिंग नहीं, फ्लोर है

आमतौर पर राज्यों के लिए 3% का राजकोषीय घाटा एक सुरक्षित सीमा मानी जाती थी. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब यह ‘मैक्सिमम’ लिमिट नहीं बल्कि ‘मिनिमम’ शुरुआत बन गई है. पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत से केंद्र और राज्य के बीच तालमेल बेहतर होने की उम्मीद है, जिससे प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने में आसानी होगी, लेकिन राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना शुभेंदु अधिकारी की सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

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अगले साल उत्तर प्रदेश, गुजरात और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने हैं. बंगाल और तमिलनाडु की जीत ने यह साबित कर दिया है कि ‘कैश ट्रांसफर’ और ‘मुफ्त बिजली’ जैसे फॉर्मूले चुनाव जिताते हैं. ऐसे में आने वाले समय में राज्यों के बीच मुफ्त उपहारों की यह होड़ और तेज हो सकती है, जो लॉन्ग टर्म आर्थिक स्थिरता के लिए एक रेड सिग्नल है.