FCRA Bill 2026 पर उठे सवालों का विनय मोहन क्वात्रा ने दिया जवाब, बोले- विदेशी फंडिंग पर नहीं लगेगी रोक
FCRA Bill 2026 को लेकर जारी विवाद के बीच भारत के अमेरिका में राजदूत Vinay Mohan Kwatra ने विदेशी फंडिंग और NGO से जुड़े सवालों पर सरकार का पक्ष स्पष्ट किया है. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून Foreign Donations पर रोक नहीं लगाता और इसका उद्देश्य फॉरेन कंट्रीब्यूशन में ट्रांसपेरेंसी, गवर्नेंस और ओवरसाइट को मजबूत करना है.
Highlights
- FCRA Bill 2026 में Foreign Funding पर रोक नहीं लगेगी.
- Kwatra ने NGO और Religious Organisations पर उठे सवालों की सफाई दी.
- 12 अगस्त को Parliament में Bill पर चर्चा की उम्मीद.
FCRA Bill 2026 को लेकर जारी विवाद के बीच भारत के अमेरिका में राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने प्रस्तावित कानून को लेकर उठ रही कई चिंताओं पर सफाई दी है. क्वात्रा ने कहा है कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य विदेशी फंडिंग को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन से जुड़े फाइनेंशियल फ्लोज में ट्रांसपेरेंसी, गवर्नेंस और ओवरसाइट को मजबूत करना है. क्वात्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कई पोस्ट के जरिए FCRA Bill 2026 को लेकर सामने आए 5 प्रमुख दावों और उनके जवाब दिए.
विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं
क्वात्रा ने कहा कि भारत का FCRA फ्रेमवर्क नया नहीं है. इसकी शुरुआत 1976 में हुई थी और 2010 में इसे ज्यादा व्यापक कानून के रूप में बदला गया. इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में इसमें बदलाव किए गए. उनके मुताबिक, FCRA Bill 2026 इसी रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को आगे बढ़ाने की कोशिश है. उन्होंने कहा कि यह कानून भारत में काम कर रहे लॉ-अबाइडिंग सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइजेशंस को विदेशी फंडिंग लेने से नहीं रोकता. क्वात्रा ने बताया कि हजारों एसोसिएशंस FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं और हेल्थ, एजुकेशन, डिजास्टर रिलीफ, रिसर्च तथा ह्यूमैनिटेरियन वर्क जैसे क्षेत्रों में फॉरेन फंड्स प्राप्त कर रहे हैं.
विदेशी योगदान में हुआ इजाफा
FCRA के NGO और चैरिटेबल ऑर्गनाइजेशंस के कामकाज को प्रभावित करने के दावे पर भी क्वात्रा ने आंकड़ों का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि भारत में फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशंस घटने के बजाय बढ़े हैं. उनके मुताबिक, रजिस्टर्ड ऑर्गनाइजेशंस को मिलने वाला फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन 2010-11 में करीब 1.2 बिलियन डॉलर था, जो 2024-25 में बढ़कर 2.67 बिलियन डॉलर हो गया.
क्वात्रा ने यह भी कहा कि भारत में 3 मिलियन से ज्यादा NGOs हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 14,450 ऑर्गनाइजेशंस के पास FCRA रजिस्ट्रेशन है. यानी सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइजेशंस का बड़ा हिस्सा FCRA के दायरे से बाहर है. उन्होंने कहा कि FCRA फॉरेन चैरिटी, रिसर्च ग्रांट्स या ह्यूमैनिटेरियन एड लेने पर रोक नहीं लगाता. इसके तहत ऑर्गनाइजेशंस को रजिस्ट्रेशन कराना, तय प्रक्रिया के जरिए पैसा प्राप्त करना और उसके इस्तेमाल की रिपोर्टिंग करना जरूरी है.
NGO की संपत्ति को लेकर क्या है विवाद
FCRA Bill 2026 को लेकर सबसे ज्यादा विवाद उन प्रावधानों पर है, जिनका संबंध FCRA रजिस्ट्रेशन कैंसल, सरेंडर या रिन्यू नहीं होने के बाद फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशंस और उनसे बनाई गई एसेट्स से है. क्वात्रा ने कहा कि ऐसी स्थिति में एसेट्स से जुड़े प्रावधान मौजूदा FCRA फ्रेमवर्क में भी मौजूद हैं और यह व्यवस्था 2010 से लागू है. प्रस्तावित कानून में डिजाइनेटेड अथॉरिटी बनाने की बात है, जो ऐसी एसेट्स की देखरेख करेगी.
उनके मुताबिक, अगर किसी ऑर्गनाइजेशन का FCRA रजिस्ट्रेशन दोबारा रिस्टोर हो जाता है तो एसेट्स और अनयूज्ड फंड्स उसे वापस किए जा सकते हैं. उन्होंने प्लेसेज ऑफ वर्शिप से जुड़ी संपत्तियों को लेकर भी सफाई दी. क्वात्रा के अनुसार, अगर किसी कैंसल्ड एसोसिएशन ने किसी प्लेस ऑफ वर्शिप से जुड़ी प्रॉपर्टी बनाई है, तो उसे उसी फेथ की किसी दूसरी FCRA-रजिस्टर्ड एसोसिएशन को दिया जा सकता है, ताकि वर्शिप की कंटिन्यूटी बनी रहे.
किसी धर्म को टारगेट नहीं करता कानून: क्वात्रा
FCRA Bill 2026 को लेकर रिलीजियस ऑर्गनाइजेशंस और माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशंस पर असर की आशंकाओं के बीच क्वात्रा ने कहा कि कानून किसी खास रिलिजन या कम्युनिटी को टारगेट नहीं करता. उनके मुताबिक, FCRA सभी ऑर्गनाइजेशंस पर समान रूप से लागू होता है, चाहे उनका रिलिजन, कम्युनिटी या आइडियोलॉजी कुछ भी हो. रिलीजियस एजुकेशन, प्लेसेज ऑफ वर्शिप के मेंटेनेंस और चैरिटेबल एक्टिविटीज जैसे काम करने वाले ऑर्गनाइजेशंस भी नियमों के तहत फॉरेन फंडिंग प्राप्त कर सकते हैं.
हालांकि, प्रस्तावित कानून को लेकर US में भी सवाल उठे हैं. US कांग्रेसमैन रिले मूर ने आरोप लगाया था कि प्रस्तावित बदलाव चर्चेज और रिलीजियस चैरिटीज से जुड़ी संपत्तियों पर गवर्नमेंट कंट्रोल का रास्ता खोल सकते हैं. भारत के मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स ने इस पर कहा था कि भारत के लेजिस्लेटिव मैटर्स देश के इंटरनल अफेयर्स हैं और इन पर फैसला पार्लियामेंट करता है. MEA ने यह भी कहा कि कई दूसरे देश, जिसमें US भी शामिल है, फॉरेन फंड्स के फ्लो को रेगुलेट करते हैं.
भारत अकेला देश नहीं
क्वात्रा ने यह तर्क भी दिया कि फॉरेन फाइनेंशियल फ्लोज को रेगुलेट करना सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. उन्होंने US के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट यानी FARA और फॉरेन अकाउंट टैक्स कंप्लायंस एक्ट यानी FATCA का उदाहरण दिया. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और UK में फॉरेन फंडिंग तथा फॉरेन इन्फ्लुएंस से जुड़े रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का भी उल्लेख किया. क्वात्रा का कहना है कि कई डेमोक्रेसीज में नेशनल सिक्योरिटी और ट्रांसपेरेंसी को ध्यान में रखते हुए फॉरेन फाइनेंशियल फ्लोज पर नियम लागू किए जाते हैं.
12 अगस्त को हो सकती है चर्चा
सरकार का कहना है कि FCRA Bill 2026 फॉरेन डोनेशंस पर बैन लगाने वाला कानून नहीं है. सरकार के मुताबिक, हेल्थ, एजुकेशन, रिसर्च, डिजास्टर रिलीफ और ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले नियमों का पालन करने वाले ऑर्गनाइजेशंस फॉरेन फंडिंग प्राप्त करना जारी रख सकते हैं.
अब इस बिल को लेकर पार्लियामेंट में आगे की चर्चा महत्वपूर्ण होगी. प्रस्तावित कानून पर 12 अगस्त को चर्चा होने की उम्मीद है. ऐसे में आने वाले दिनों में फॉरेन फंडिंग, NGOs, रिलीजियस इंस्टीट्यूशंस और सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइजेशंस पर इसके संभावित असर को लेकर बहस और तेज हो सकती है.
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