‘विजय शो’… थलापति ने लिखी दूर दक्षिण से राजनीति की नई कहानी, जानें- केजरीवाल से कैसे अलग है नया सितारा
भारतीय राजनीति में ऐसा बहुत कम ही देखने को मिला है कि कोई राजनीतिक पार्टी अपने पहले ही चुनाव में सत्ता पर काबिज हो जाए और वह भी अपनी स्थापना के महज एक साल बाद. तमिलनाडु ने छह दशक पहले इतिहास रच दिया था, जब वह किसी क्षेत्रीय पार्टी को सत्ता में चुनने वाला पहला राज्य बना था.

अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी TVK तमिलनाडु में शुरुआती रुझानों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब है. अगर TVK अपनी बढ़त बनाए रखने में कामयाब रहती है, तो यह न सिर्फ तमिलनाडु, बल्कि भारतीय राजनीति में भी एक ऐतिहासिक मोड़ होगा, जिसकी मिसालें बहुत कम मिलती हैं.
TVK की बढ़त किस बात के संकेत
भारतीय राजनीति में ऐसा बहुत कम ही देखने को मिला है कि कोई राजनीतिक पार्टी अपने पहले ही चुनाव में सत्ता पर काबिज हो जाए और वह भी अपनी स्थापना के महज एक साल बाद. TVK की यह जबरदस्त बढ़त इस बात का संकेत है कि तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य, जिस पर पिछले छह दशकों से द्रविड़ पार्टियों DMK और AIADMK का दबदबा रहा है, अब बदलने वाला है और तमिलनाडु इतिहास बनते हुए देखेगा.
राजनीतिक वर्चस्व समाप्त
तमिलनाडु ने छह दशक पहले इतिहास रच दिया था, जब वह किसी क्षेत्रीय पार्टी को सत्ता में चुनने वाला पहला राज्य बना था. इस तरह उसने कांग्रेस के चुनावी और राजनीतिक वर्चस्व को समाप्त कर दिया था. यह बात 1967 की है, वह दौर, जब कांग्रेस का चुनावों में पूर्ण दबदबा था. तब से लेकर अब तक, इस राज्य पर DMK और AIADMK का ही शासन रहा है, लेकिन अब यह स्थिति बदलने वाली है.
विजय कई मायनों में इतिहास रचने जा रहे हैं
किसी पार्टी का अपने पहले ही चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना एक दुर्लभ घटना है. पहली बार किसी राजनीतिक पार्टी ने अपने पहले ही चुनाव में सत्ता तब हासिल की थी, जब अविभाजित आंध्र प्रदेश में 1983 में फिल्मी दुनिया के मशहूर सितारे एन.टी. रामाराव की TDP ने कांग्रेस को बुरी तरह हराया था. रामाराव, जिनकी एक बेहद प्रभावशाली छवि थी, ने मार्च 1982 में TDP का गठन किया था और उसके ठीक नौ महीने बाद ही सत्ता पर काबिज हो गए थे.
तीन साल बाद AGP अपने पहले ही चुनाव में असम में सत्ता में आई. अक्टूबर 1985 में बनी इस पार्टी ने, इसके दो महीने बाद हुए विधानसभा चुनावों में सत्ता हासिल कर ली. दिल्ली में आम आदमी पार्टी 2013 में अपने पहले ही चुनाव में दिल्ली की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.
क्या है फर्क?
लेकिन कुछ अहम फर्क भी हैं. NTR के मामले में, उनका मुख्य नारा था तेलुगू लोगों का आत्म-सम्मान. वे दिल्ली में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा राज्य में पैदा की गई भारी राजनीतिक अस्थिरता के सहारे सत्ता में आए. कांग्रेस, जो उस समय सत्ता में थी, ने पांच साल में पांच मुख्यमंत्री बदले थे और NTR का यह नारा कि दिल्ली राज्य में उथल-पुथल मचा रही है, लोगों के बीच जबरदस्त रूप से गूंजा. इसके अलावा, उन्हें अपने ‘कम्मा’ समुदाय का भी समर्थन हासिल था, जो संख्या में भले ही कम था, लेकिन आर्थिक रूप से काफी प्रभावशाली था. नतीजतन, TDP ने 294 में से 202 सीटें जीत लीं.
AGP का जन्म
असम में AGP का जन्म विदेशियों के खिलाफ हुए आंदोलन से हुआ था. अवैध प्रवासियों के खिलाफ ‘ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन’ (AASU) के नेतृत्व में चला यह आंदोलन छह साल तक चला था. असम समझौते पर हस्ताक्षर होने के तुरंत बाद AGP का गठन किया गया, जिसमें AASU, ‘असम जातीयतावादी दल’ (AJD) और ‘पूर्वांचल लोक परिषद’ का विलय कर दिया गया. इस नई राजनीतिक इकाई का नेतृत्व उन लोगों ने किया, जिन्होंने असम आंदोलन का नेतृत्व किया था. AGP ने इतिहास रच दिया और AASU के नेता प्रफुल्ल कुमार महंता 33 वर्ष की आयु में सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बन गए.
आम आदमी पार्टी
2012 में बनी आम आदमी पार्टी (AAP) ने दिल्ली में बीजेपी और कांग्रेस को चौंका दिया. उसने 70 में से 28 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर लगभग 30% रहा. लेकिन AAP भी AGP की तरह ही एक आंदोलन से पैदा हुई थी. UPA सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से AAP का जन्म हुआ था.
TVK का प्रदर्शन सबसे अलग
TVK के मामले में फर्क यह है कि इसका जन्म किसी लंबे सामाजिक आंदोलन या विरोध प्रदर्शन से नहीं हुआ. इसका कोई ठोस वैचारिक आधार नहीं है. AAP और AGP एक स्पष्ट राजनीतिक विचारधारा पर आधारित थे. TVK में दूसरी पंक्ति के मजबूत नेताओं की भी कमी थी. यह पूरी तरह से विजय का ही शो था. इसके अलावा, इसे न तो किसी जाति का और न ही किसी समुदाय का समर्थन प्राप्त था.
फिल्मों के मशहूर हीरो एम.जी. रामचंद्रन (MGR) से इसकी तुलना करना भी सही नहीं होगा, जो अपने पहले ही चुनाव में सत्ता में आ गए थे. MGR ने DMK से अलग होकर 1972 में AIADMK बनाई थी. वे अपने पहले चुनाव में सत्ता में तो आए, लेकिन यह पांच साल बाद, यानी 1977 में हुआ. इसके अलावा, पार्टी बनाने से काफी पहले से ही MGR राजनीति में सक्रिय थे. जब एम. करुणानिधि के गुट ने उन्हें पार्टी से निकाला, तब वे DMK के कोषाध्यक्ष थे.