अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियों के झगड़े में फंसे मरीज, कैसे मिलेगा क्लेम, क्या रद्द होगी पॉलिसी, जानें सारे जवाब

बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच एक बार फिर विवाद गहरा गया है. बजाज एलियांज और केयर हेल्थ इंश्योरेंस पर अस्पतालों ने क्लेम सेटलमेंट में देरी और पुराने पैकेज रेट्स लागू करने का आरोप लगाया. जवाब में बीमा कंपनियां कहती हैं कि अस्पताल बिल बढ़ाकर दिखाते हैं और अतिरिक्त चार्ज लेते हैं. इस खींचतान से मरीजों में चिंता है.

बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच एक बार फिर विवाद गहरा गया है. Image Credit: CANVA

Insurance Dispute: देश में अस्पतालों और इंश्योरेंस कंपनियों के बीच खींचतान कोई नई बात नहीं है. हाल ही में बजाज एलियांज जनरल इंश्योरेंस और केयर हेल्थ इंश्योरेंस का विवाद एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स इंडिया (AHPI) के साथ नया विवाद सामने आया. यह विवाद क्लेम चुकाने में देरी, नए अस्पतालों को पैनल में शामिल करने में समय, पैकेज रेट्स को अपडेट न करने और अतिरिक्त कागजात मांगने से जुड़ा है. इसी कारण AHPI ने कुछ समय के लिए बजाज एलियांज की कैशलेस सर्विस रोकने का ऐलान किया था. इससे एक सितंबर से करीब 15000 अस्पतालों में कैशलेस सर्विस पर सीधा असर होगा. ऐसे में अगर आपने भी हेल्थ इंश्योरेंस ले रखा है और आपकी इंश्योरेंस कंपनी का नाम कैशलेस सर्विस से बाहर हो जाता है, तो ऐसे में आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और इस समस्या से कैसे बचा जा सकता है, यह जानना जरूरी है.

विवाद क्यों हुआ

अस्पतालों का कहना है कि इंश्योरेंस कंपनियां इलाज के पैकेज रेट्स बढ़ाने के लिए तैयार नहीं होतीं और क्लेम सेटलमेंट में भी देरी करती हैं. इससे उनकी लागत पूरी नहीं हो पाती. वहीं इंश्योरेंस कंपनियों का कहना है कि कई अस्पताल इलाज का बिल जरूरत से ज्यादा बढ़ाकर पेश करते हैं और सामान्य सेवाओं को भी अलग से चार्ज करते हैं. दोनों तरफ से यह आरोप-प्रत्यारोप लंबे समय से चल रहा है.

इमरजेंसी फंड से तुरंत राहत पाए

जब अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनी के बीच कैशलेस सुविधा को लेकर विवाद होता है, तो सबसे बड़ी दिक्कत मरीज या परिवार के सामने तुरंत पैसे की व्यवस्था करने की होती है. अगर आपके पास इमरजेंसी फंड है, तो आप बिना घबराए शुरुआती खर्च खुद मैनेज कर सकते हैं और बाद में रीइम्बर्समेंट क्लेम के जरिए इंश्योरेंस कंपनी से पैसा वापस पा सकते हैं. यह फंड ना केवल मेडिकल इमरजेंसी बल्कि नौकरी छूटने या किसी और अचानक आने वाले बड़े खर्च में भी आपके काम आता है. इसलिए सलाह दी जाती है कि 6 से 9 महीने का खर्च लिक्विड फॉर्म (जैसे FD, सेविंग्स अकाउंट या लिक्विड फंड्स) में अलग से रखें.

पॉलिसी पोर्ट कर बेहतर विकल्प

अगर आपकी मौजूदा इंश्योरेंस कंपनी बार-बार कैशलेस नेटवर्क को लेकर समस्या पैदा कर रही है, तो आप अपनी पॉलिसी को दूसरी कंपनी में पोर्ट कर सकते हैं. इससे आपके अब तक के फायदे (जैसे नो क्लेम बोनस, वेटिंग पीरियड) बने रहते हैं और आपको बेहतर कैशलेस नेटवर्क, तेज सर्विस और संभवतः सस्ती प्रीमियम का फायदा मिलता है. पॉलिसी पोर्ट करने का रिक्वेस्ट पॉलिसी रिन्यूअल से कम से कम 45 दिन पहले देना जरूरी होता है. इस कदम से आप ऐसे विवादों से काफी हद तक बच सकते हैं और ज्यादा भरोसेमंद इंश्योरेंस कंपनी चुन सकते हैं.

ये भी पढ़ें- AHPI का बड़ा फैसला, 1 सितंबर से Bajaj Allianz के ग्राहकों को 15000 हॉस्पिटलों में नहीं मिलेगी कैशलेस सुविधा

क्या है पूरा विवादडिटेल
विवाद की जड़पैकेज रेट्स, क्लेम अस्वीकृति, अतिरिक्त दस्तावेज़ों की मांग
क्या हुआ है मामला?– AHPI ने बजाज हेल्थ पॉलिसीधारकों के लिए कैशलेस सेवा निलंबित की – केयर हेल्थ को चेतावनी दी गई – GIC ने AHPI के कदम को “एंटी-कंज्यूमर” बताया
अस्पतालों की शिकायतें– बीमा कंपनियां बहुत कम पैकेज रेट्स लगाती हैं – महंगाई के हिसाब से रेट्स नहीं बढ़ाए जाते, क्लेम्स को अस्वीकार या उसमें कटौती कर दिया जाता है, गैर जरूरी दस्तावेज़ मांगे जाते हैं
बीमा कंपनियों का पक्षअस्पताल अनावश्यक प्रक्रियाएं और दवाइयां जोड़कर बिल बढ़ाते हैं ,पैकेज रेट्स में छुपे अतिरिक्त खर्च डालते हैं – मरीजों से शुरुआत में भारी चार्ज वसूलते हैं, अस्पतालों के प्रोटोकॉल सही नहीं हैं.
पॉलिसीधारकों पर असरअभी तक कैशलेस क्लेम निलंबित नहीं हुए हैं,कैशलेस न मिलने पर रीइंबर्समेंट संभव है , पॉलिसी छोड़ने की आवश्यकता नहीं
पॉलिसीधारकों के लिए सलाह– इमरजेंसी फंड हमेशा बनाए रखें – कैशलेस न मिले तो रीइंबर्समेंट का विकल्प लें – बीमा पॉलिसी पोर्ट करने का विकल्प, इसके अलावा विवाद सुझलने की उम्मीद ऐसे में मौजूदा पॉलिसी जारी रख सकते हैं.

आगे का रास्ता

इस क्षेत्र में काम करने वाले जानकारों का मानना है कि अगर पूरे देश में इलाज के रेट्स तय कर दिए जाएं और सभी इंश्योरेंस कंपनियां उसी हिसाब से काम करें तो ऐसे विवाद खत्म हो जाएंगे. लेकिन अभी अस्पताल और इंश्योरेंस कंपनियां एकमत नहीं हो पा रही हैं. इसी कारण समय-समय पर ऐसे टकराव सामने आते रहते हैं.

आगे का रास्ता