IPO में पैसा लगाएं या FPO में? निवेशकों के लिए क्या है बेहतर ऑप्शन, दांव लगाने से पहले जान लें 3 बड़े फर्क

शेयर बाजार में पूंजी जुटाने के लिए कंपनियां IPO और FPO का सहारा लेती हैं, लेकिन दोनों में बड़ा अंतर होता है. IPO के जरिए कंपनी पहली बार शेयर बेचती है, जबकि FPO पहले से लिस्टेड कंपनी का दूसरा या बाद का शेयर ऑफर होता है. जोखिम, रिटर्न और फंड जुटाने के उद्देश्य के मामले में दोनों निवेश विकल्प अलग हैं.

आईपीओ बनाम एफपीओ

IPO vs FPO: शेयर बाजार में निवेश करने वाले ज्यादातर लोग आईपीओ (IPO) के बारे में जानते हैं, लेकिन जब किसी कंपनी का एफपीओ (FPO) आता है तो कई निवेशक दोनों के बीच का अंतर समझ नहीं पाते. दोनों ही तरीके कंपनियों को बाजार से पैसा जुटाने का मौका देते हैं, लेकिन इनके उद्देश्य, जोखिम और निवेशकों के लिए अवसर अलग-अलग होते हैं. ऐसे में अगर आप शेयर बाजार में निवेश करने की योजना बना रहे हैं तो IPO और FPO के बीच का फर्क समझना जरूरी है.

क्या होता है FPO?

FPO यानी Follow-on Public Offer वह प्रक्रिया है, जिसमें पहले से शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी दोबारा अपने शेयर निवेशकों को बेचती है. आसान शब्दों में कहें तो IPO के बाद जब कोई कंपनी फिर से बाजार से पैसा जुटाना चाहती है, तब वह FPO लेकर आती है.

FPO दो तरह के हो सकते हैं. पहला डाइल्यूटिव FPO, जिसमें नए शेयर जारी किए जाते हैं और कंपनी की शेयर पूंजी बढ़ जाती है. दूसरा नॉन-डाइल्यूटिव FPO, जिसमें मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेचते हैं और शेयर पूंजी में कोई बदलाव नहीं होता.

क्या होता है IPO?

IPO यानी Initial Public Offering वह प्रक्रिया है, जिसके जरिए कोई निजी कंपनी पहली बार अपने शेयर आम निवेशकों को बेचती है. इसके बाद कंपनी शेयर बाजार में लिस्टेड हो जाती है और एक निजी कंपनी से सार्वजनिक कंपनी में बदल जाती है. कंपनियां आमतौर पर कारोबार बढ़ाने, नए प्रोजेक्ट्स में निवेश करने या विस्तार के लिए पूंजी जुटाने के उद्देश्य से IPO लाती हैं.

IPO और FPO में 3 बड़े अंतर

1. जोखिम और रिटर्न

IPO में निवेश करना अपेक्षाकृत ज्यादा जोखिम भरा माना जाता है. इसकी वजह यह है कि कंपनी पहली बार बाजार में आ रही होती है और निवेशकों के पास उसके शेयर के प्रदर्शन का कोई रिकॉर्ड नहीं होता.

वहीं FPO में निवेशकों के पास कंपनी का पुराना रिकॉर्ड देखने का मौका होता है. वे कंपनी के वित्तीय नतीजे और शेयर के प्रदर्शन का एनॉलिसिस कर सकते हैं. इसी कारण FPO को आमतौर पर IPO की तुलना में कम जोखिम वाला माना जाता है.

हालांकि, रिटर्न के मामले में IPO अक्सर निवेशकों को ज्यादा कमाई का मौका दे सकते हैं, क्योंकि निवेशक कंपनी के शुरुआती चरण में प्रवेश करते हैं.

2. फंड जुटाने का उद्देश्य

IPO का मुख्य उद्देश्य कंपनी के लिए पहली बार बड़ी पूंजी जुटाना होता है. इसके जरिए कंपनी नए शेयर जारी करती है और कारोबार के विस्तार की तैयारी करती है.

दूसरी ओर FPO आमतौर पर कर्ज कम करने, नए प्रोजेक्ट्स के लिए पैसा जुटाने, कारोबार का विस्तार करने या मौजूदा निवेशकों और प्रमोटर्स की हिस्सेदारी बेचने के लिए लाया जाता है.

3. प्रदर्शन का रिकॉर्ड

IPO में निवेश करते समय निवेशकों के पास कंपनी के शेयर के बाजार प्रदर्शन का कोई इतिहास नहीं होता. ऐसे में उन्हें कंपनी के प्रॉस्पेक्टस, मैनेजमेंट, कारोबार और बाजार में उसकी स्थिति के आधार पर फैसला लेना पड़ता है.

वहीं FPO में निवेशकों के पास कंपनी का पूरा ट्रैक रिकॉर्ड मौजूद होता है. वे यह देख सकते हैं कि कंपनी ने लिस्टिंग के बाद कैसा प्रदर्शन किया है और निवेशकों को कितना रिटर्न दिया है. इससे निवेश का फैसला लेना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है.

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