FIIs ने 17 सेक्टर्स में अपना निवेश घटाया, मजबूत ताकत बनकर उभरे DIIs; इन सेक्टर्स में दिखाया भरोसा
विदेशी निवेश किसी भी तरह का बदलाव बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा. पिछले एक साल में घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने निजी बैंकों, टेक्नोलॉजी, टेलीकॉम, रियल एस्टेट और हेल्थकेयर जैसे प्रमुख सेक्टर्स में अपनी हिस्सेदारी में जबरदस्त बढ़ोतरी की है.
एक स्ट्रक्चरल शिफ्ट ने DIIs को भारतीय इक्विटी बाजार में एक स्थिर शक्ति के तौर पर स्थापित कर दिया है, जो FIIs के अस्थिर आउटफ्लो को संतुलित करता है. हालांकि, विदेशी निवेश किसी भी तरह का बदलाव बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा. पिछले एक साल में घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने निजी बैंकों, टेक्नोलॉजी, टेलीकॉम, रियल एस्टेट और हेल्थकेयर जैसे प्रमुख सेक्टर्स में अपनी हिस्सेदारी में जबरदस्त बढ़ोतरी की है.
कम की हिस्सेदारी
दूसरी ओर, मनीकंट्रोल में छपी मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज की एक रणनीति रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने अधिकांश सेक्टर्स में अपनी हिस्सेदारी कम कर दी है, जो भारतीय इक्विटी बाजार में स्वामित्व के पैटर्न में एक निर्णायक बदलाव का संकेत है.
DIIs ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई
सेक्टर के लेवल पर यह अंतर साफ दिखता है. पिछले एक साल में Nifty-500 के 24 में से 21 सेक्टर्स में DIIs ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है. सबसे अधिक बढ़ोतरी प्राइवेट बैंकों, टेक्नोलॉजी, टेलीकॉम, रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर और हेल्थकेयर में देखी गई.
इसके उलट, FIIs ने 17 सेक्टर्स में अपनी हिस्सेदारी कम की है, जिनमें प्राइवेट बैंक, NBFCs (नॉन-लेंडिंग), टेक्नोलॉजी, कंज्यूमर, इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट शामिल हैं. उन्होंने चुनिंदा तौर पर मेटल्स, PSU बैंकों, टेलीकॉम और लॉजिस्टिक्स में अपना निवेश बढ़ाया है.
DIIs एक
इस बड़े पैमाने पर हुई खरीदारी ने Nifty-500 में DIIs की हिस्सेदारी को मार्च 2026 तक के अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 20.9 फीसदी पर पहुंचा दिया है. यह पिछले साल के मुकाबले 170 बेसिस पॉइंट ज्यादा है, और लगातार आठवीं तिमाही में हुई बढ़ोतरी को दिखाता है. इसके उलट, FIIs की हिस्सेदारी में गिरावट आई है और यह 17.1 फीसदी पर पहुंच गई है, जो इसी दौरान 180 बेसिस पॉइंट कम है.
फ्री-फ्लोट
फ्री-फ्लोट के मामले में यह बदलाव और भी ज्यादा साफ दिखता है. Nifty-500 कंपनियों के फ्री-फ्लोट में अब DIIs का हिस्सा 41.2 फीसदी है, जबकि FIIs का हिस्सा 33.8 फीसदी है. इसके चलते FII-DII मालिकाना रेश्यो घटकर 0.8 गुना रह गया है, जो घरेलू निवेशकों के बढ़ते दबदबे को दिखाता है.
SIP का सपोर्ट
मालिकाना हक के बदलते ढांचे की पहचान, पूंजी के विपरीत प्रवाह से होती है. DIIs ने कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली तिमाही में 27.2 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया, जिसे मजबूत और लगातार SIP प्रवाह का समर्थन मिला. FIIs का रुख अस्थिर बना रहा. फरवरी में हुआ कैपिटल इनफ्लो, मार्च में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच 14.2 अरब डॉलर की भारी बिकवाली में बदल गया, जिससे जनवरी-मार्च तिमाही के लिए कुल आउटफ्लो (outflows) बढ़कर 15.8 अरब डॉलर हो गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि FII के बाहर जाने की रफ्तार में थोड़ी कमी को भी बाजार सकारात्मक नजर से देख सकते हैं, जबकि विदेशी निवेश के लगातार वापस आने से, भू-राजनीतिक जोखिम कम होने पर, बाजार में तेजी से उछाल आ सकता है.
सेक्टर्स में हुए बदलाव
सेक्टर में हुए अहम बदलावों में, टेक्नोलॉजी सेक्टर में FII का निवेश घटकर अब तक के सबसे निचले स्तर 7.3 फीसदी पर आ गया है (उनके Nifty-500 निवेश के मुकाबले). इसके बावजूद, BFSI सेक्टर FII के पोर्टफोलियो में 32.1 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ अपना दबदबा बनाए हुए है, और इंडेक्स के मुकाबले इसमें उनका निवेश ज्यादा बना हुआ है. FII ने मेटल्स, हेल्थकेयर, यूटिलिटीज, कैपिटल गुड्स, PSU बैंकों, ऑयल और गैस, और रिटेल सेक्टर में भी अपना निवेश बढ़ाया है.
DIIs ने कहां बढ़ाई हिस्सेदरी?
इसके विपरीत DIIs ने कंज्यूमर, PSU बैंकों, तेल और गैस, टेक्नोलॉजी, मेटल्स और टेलीकॉम सेक्टर में अपना निवेश (ओवरवेट) बढ़ाया है. वहीं, वे प्राइवेट बैंकों, NBFCs, कैपिटल गुड्स, ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट और हेल्थकेयर सेक्टर में अपना निवेश (अंडरवेट) कम बनाए हुए हैं.
लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप
बाजार के सभी मार्केट कैपिटलाइजेशन में शेयरों को जमा करने का ट्रेंड साफ दिख रहा है. DIIs ने लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर क्रमशः 22 प्रतिशत, 19 प्रतिशत और 17.7 प्रतिशत कर दी है. दूसरी ओर, FIIs ने साल-दर-साल आधार पर इन तीनों ही सेगमेंट में अपना निवेश (एक्सपोजर) कम किया है.
हाई लेवल पर DII की हिस्सेदारी
Nifty-50 इंडेक्स में भी ऐसा ही एक पैटर्न देखने को मिल रहा है, जहां DII की हिस्सेदारी बढ़कर अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 25.4 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जबकि FII की हिस्सेदारी घटकर 22.2 प्रतिशत रह गई है. DII ने Nifty-50 की 82 प्रतिशत कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है, जबकि FII ने इंडेक्स में शामिल 78 प्रतिशत कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी कम की है.
वैश्विक अनिश्चितताओं का दबाव जारी रहने के बीच, FII फ्लो- खास तौर पर भू-राजनीतिक तनाव कम होने पर आने वाला कोई भी बदलाव, बाजार की दिशा तय करने में एक अहम फैक्टर बने रहने की उम्मीद है.
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