बिकवाली से हाहाकार! 4 सत्रों में निवेशकों के ₹11 लाख करोड़ खाक, बाजार में आएगी अभी और तबाही?
ICICI Securities के इक्विटी स्ट्रैटेजिस्ट Vinod Karki का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो Nifty 50 करीब 22,660 के स्तर तक गिर सकता है. यह स्तर प्री-कॉन्फ्लिक्ट लेवल 25,178 से लगभग 10 फीसदी नीचे होगा.
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान युद्ध की खबरों के बीच भारतीय शेयर बाजार पर पिछले दो हफ्तों से भारी दबाव देखने को मिल रहा है. कमजोर वैश्विक संकेत, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और महंगाई व आर्थिक सुस्ती की चिंता ने निवेशकों के सेंटीमेंट को कमजोर कर दिया है. इसी वजह से बाजार में भयानक गिरावट गिरावट देखने को मिली है. पिछले हफ्ते शुक्रवार को बाजार लगातार तीसरे हफ्ते गिरावट के साथ बंद हुआ. गिरावट का आलम ये है कि पिछले 4 सत्रों में निवेशकों के करीब 11 लाख करोड़ रुपये डूब गए.
दो हफ्तों में बाजार की बड़ी गिरावट
पिछले दो हफ्तों में Nifty 50 में भारी गिरावट आई है. यह इंडेक्स 25,496 के स्तर से गिरकर 23,151 तक पहुंच गया, यानी करीब 9.20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. इसी तरह BSE Sensex भी 82,248 से फिसलकर 74,563 के स्तर तक आ गया. इस दौरान सेंसेक्स में करीब 7,685 अंक यानी 9.35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई.


22,600 के नीचे जा सकता है Nifty
ICICI Securities के इक्विटी स्ट्रैटेजिस्ट Vinod Karki का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो Nifty 50 करीब 22,660 के स्तर तक गिर सकता है. यह स्तर प्री-कॉन्फ्लिक्ट लेवल 25,178 से लगभग 10 फीसदी नीचे होगा. कार्की के मुताबिक, ऐसा होने पर इंडेक्स कोविड के बाद के सबसे निचले स्तरों के करीब पहुंच सकता है.
क्यों गिर रहा है भारतीय शेयर बाजार
भारतीय शेयर बाजार इस समय कई वैश्विक दबावों से जूझ रहा है. ग्लोबल सेंटीमेंट कमजोर हो रहा है, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, पश्चिम एशिया में जियो पॉलिटिकल तनाव बढ़ रहा है और विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं. अलग-अलग सेक्टरों में मुनाफावसूली बढ़ गई. इससे हाल के महीनों की सबसे तेज वीकली गिरावट देखने को मिली.
कच्चे तेल की कीमतों का बढ़ना चिंता का विषय
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के लिए चिंता बढ़ा सकती है. जानकारों के मुताबिक, अगर तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो इससे देश का इपोर्ट बिल बढ़ सकता है और महंगाई पर भी दबाव पड़ सकता है. इसका असर अर्थव्यवस्था के साथ-साथ शेयर बाजार पर भी देखने को मिल सकता है. यदि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है, तो कई सेक्टर सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं.
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