पिता की मौत के बाद भी तलाकशुदा बेटी को मिलेगी पेंशन, जानें क्या कहता है कोर्ट का फैसला
कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर बेटी पिता के जीवित रहते पति द्वारा छोड़ दी गई थी और उन पर आर्थिक रूप से निर्भर थी, तो केवल इस आधार पर फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि कानूनी तलाक पिता की मौत के बाद हुआ. यह फैसला हजारों महिलाओं के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है.
क्या एक बेटी, जिसका तलाक कानूनी तौर पर पिता की मृत्यु के बाद हुआ हो, अपने पिता की फैमिली पेंशन की हकदार है? अमूमन सरकारी विभाग इसे तकनीकी आधार पर खारिज कर देते हैं, लेकिन दिसंबर 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महिला के हक में फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि ‘इंसाफ कानून की बारीकियों में नहीं, बल्कि परिस्थितियों की हकीकत में छिपा होता है.’ कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर बेटी पिता के जीवित रहते ही पति द्वारा छोड़ दी गई थी और आर्थिक रूप से पिता पर निर्भर थी, तो उसे पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता.
क्या था पूरा मामला?
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला दक्षिण पूर्व रेलवे (South Eastern Railway) के एक कर्मचारी से जुड़ा है, जो 1983 में रिटायर हुए थे. उनके निधन (अप्रैल 2013) के बाद उनकी बेटी ने फैमिली पेंशन के लिए दावा पेश किया.
- बेटी की शादी 1991 में हुई थी, लेकिन 1996 से ही वह अपने पिता के घर रह रही थी. उसके पति ने 1996 में ही तलाक का केस किया था, जो बाद में मेंटेनेंस न देने के कारण रुक गया.
- पिता की मौत के बाद, बेटी ने 2014 में दोबारा तलाक की अर्जी दी और 2016 में उसे कानूनी तौर पर तलाक मिल गया.
- रेलवे अथॉरिटी ने यह कहकर पेंशन देने से मना कर दिया कि पिता की मृत्यु के समय वह ‘कानूनी तौर पर’ तलाकशुदा नहीं थी और उसका केस पिता की मौत के बाद फाइल हुआ था.
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां और तर्क
कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले में ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखते हुए अथॉरिटी की दलीलों को खारिज कर दिया. कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- वास्तविक निर्भरता (Actual Dependency): कोर्ट ने पाया कि पति ने महिला को 1995-96 में ही छोड़ दिया था. निचली अदालत के रिकॉर्ड भी इसकी पुष्टि करते हैं. यानी, पिता की मृत्यु के समय वह पूरी तरह उन पर निर्भर थी.
- सरकारी मेमो (OM dated 19.07.2017) की व्याख्या: कोर्ट ने कहा कि सरकार के 2017 के मेमो का उद्देश्य उन बेटियों की मदद करना है जो संकट में हैं. विभाग इस नियम की इतनी संकीर्ण (Narrow) व्याख्या नहीं कर सकता कि इसका मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाए.
- तलाक का आधार ‘परित्याग’ (Desertion): चूंकि तलाक के डिक्री में यह माना गया कि पति ने महिला को 1995 में ही छोड़ दिया था, इसलिए वह समय (जब पिता जीवित थे) पेंशन की पात्रता के लिए वैध माना जाएगा.
पेंशन के लिए पात्रता की शर्तें
बिजनेस और कानूनी नजरिए से, इस फैसले ने फैमिली पेंशन के नियमों को और अधिक स्पष्ट कर दिया है:
- निर्भरता: बेटी को यह साबित करना होगा कि पिता की मृत्यु के समय उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं था.
- कानूनी प्रक्रिया: यदि तलाक की डिक्री पिता की मौत के बाद आई है, लेकिन अलग रहने या विवाद की शुरुआत पिता के जीवनकाल में हो चुकी थी, तो बेटी हकदार है.
- तलाक का प्रभावी समय: फैमिली पेंशन उस तारीख से शुरू होगी जिस दिन कोर्ट ने तलाक की डिक्री जारी की है, लेकिन पात्रता (Eligibility) पिता की मृत्यु के समय की स्थिति से तय होगी.
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मानवीय पहलू सर्वोपरि
कलकत्ता हाईकोर्ट ने साफ कहा कि वह रिट क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप तभी करता है जब किसी फैसले में भारी विसंगति हो. इस मामले में, ट्रिब्यूनल का फैसला तर्कसंगत था. यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो वैवाहिक विवादों के कारण अपने पिता के घर शरण लेती हैं और पिता की मृत्यु के बाद आर्थिक संकट का सामना करती हैं.
हालांकि इसी तरह के एक मामले में त्रिपुरा हाईकोर्ट का फैसला अलग रहा, लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट का यह आदेश ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की अवधारणा को मजबूती देता है.
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