भूल जाइए तेल और गैस, उससे भी बड़ा संकट हो रहा खड़ा; जल्द नहीं खत्म हुआ ईरान-इजराइल युद्ध तो दुनिया में मचेगा हाहाकार
ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते युद्ध और मिडिल ईस्ट में तनाव का असर केवल तेल और गैस बाजार तक सीमित नहीं रह सकता. अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो फर्टिलाइजर सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ सकता है. होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के बड़े हिस्से का फर्टिलाइजर गुजरता है, ऐसे में किसी भी रुकावट से यूरिया, अमोनिया और अन्य फर्टिलाइजर की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं. इसका असर वैश्विक खाद्य उत्पादन और कीमतों पर पड़ने की आशंका है. आने वाले समय में गेहूं, चावल और अन्य खाद्य पदार्थ महंगे हो सकते हैं.
Iran-Israel War Fertilizer Crisis: ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया का ध्यान होर्मुज स्ट्रेट की ओर खींचा है. करीब 20 फीसदी ऑयल टैंकर इसी रास्ते से होकर गुजरते हैं. होर्मुज स्ट्रेट को लेकर आई खबरों पर एनर्जी मार्केट ने भी तुरंत प्रतिक्रिया दी है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगी हैं. लेकिन जहां तेल और गैस सुर्खियां बटोर रहे हैं, वहीं एक बड़ा खतरा धीरे-धीरे उभर रहा है, जो लॉन्ग टर्म में बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है. यह संकट फर्टिलाइजर का है, जो लंबे समय में दुनिया में खाने-पीने की चीजों की कमी और उनके दाम बढ़ा सकता है.
सप्लायरों के घर में लगी है आग
सऊदी अरब, कतर, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों सहित पश्चिम एशिया यूरिया, सल्फर और अमोनिया के प्रमुख सप्लायरों का केंद्र है. वहीं ईरान मिट्टी के पोषक तत्वों को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अमोनिया का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है. इन देशों में इस समय ड्रोन, मिसाइल और बम हमलों की घटनाएं हो रही हैं. यह संकट इसलिए भी गंभीर है क्योंकि किसानों की बुवाई का मौसम शुरू होने वाला है.
ऐसे में अगर यह वॉर लंबा खिंचता है, तो किसानों के लिए बड़ा संकट खड़ा हो सकता है. यह युद्ध अगर लंबा चलता है, तो तात्कालिक तेल और गैस संकट से भी बड़ा संकट खेती और खाद्य उत्पादन के लिए बन सकता है. इसमें फसल खराब होने से लेकर फसल चक्र गड़बड़ होने तक की आशंका है.
फर्टिलाइजर सप्लाई को किया जा रहा है नजरअंदाज
तेल और गैस की चर्चा हर जगह हो रही है, लेकिन फर्टिलाइजर सप्लाई चेन की बात कम हो रही है, जो मुख्य रूप से खाड़ी देशों पर निर्भर करती है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले होर्मुज स्ट्रेट दुनिया भर के फर्टिलाइजर ट्रेड का लगभग एक तिहाई हिस्सा संभालता है. यानी अगर दुनिया में एक जगह से दूसरी जगह तक फर्टिलाइजर शिप गुजरते हैं, तो उनमें से लगभग हर तीन में से एक इसी रास्ते से गुजरता है.
दिखने लगा है असर
अभी फर्टिलाइजर की मांग तेजी से बढ़ने वाली है. ईरान-इजराइल वॉर के कारण सप्लाई प्रभावित हो रही है और किसी भी तरह की रुकावट का असर फर्टिलाइजर की कीमतों पर दिखाई दे सकता है. अगर कीमतें बढ़ती हैं और सप्लाई बाधित होती है, तो फसल उत्पादन कम होने की आशंका भी बढ़ जाती है.
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक शिपिंग प्रभावित होने के कारण बाजार में प्रतिक्रिया दिखना शुरू हो गया है. यूरोप में अमोनिया फ्यूचर्स लगभग 725 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गए हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि फर्टिलाइजर सप्लाई में व्यवधान से न केवल इनपुट लागत बढ़ती है, बल्कि यह महीनों बाद तैयार होने वाले खाद्य उत्पादन को भी प्रभावित करती है.
आगे की राह है बहुत मुश्किल
दुनिया का सबसे बड़ा फर्टिलाइजर एक्सपोर्टर देश रूस है और वह पहले ही युद्ध की स्थिति में है. इसी बीच आई रॉयटर्स की रिपोर्ट ने चिंता और बढ़ा दी है. रिपोर्ट के अनुसार रूसी उत्पादक मध्य पूर्व संघर्ष के कारण हुई भारी सप्लाई कमी की पूरी भरपाई नहीं कर सकते.
कई देशों के किसान बढ़ती कीमतों और धीमी सप्लाई के कारण बुवाई के मौसम से पहले फर्टिलाइजर स्टॉक करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन एक्सपोर्टर ब्राजील विशेष रूप से प्रभावित है, क्योंकि वह इम्पोर्टेड फर्टिलाइजर पर काफी हद तक निर्भर है.
भारत की स्थिति भी चिंताजनक
एशिया में उर्वरक की कमी उत्पादन को भी प्रभावित करने लगी है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक कतर में संघर्ष के कारण एलएनजी सप्लाई बाधित होने के बाद भारतीय यूरिया प्रोड्यूसर ने उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है. चूंकि फर्टिलाइजर कच्चे माल के रूप में नेचुरल गैस पर काफी निर्भर करते हैं, इसलिए खाड़ी देशों के गैस बाजार में व्यवधान सप्लाई की समस्या को और बढ़ा सकता है.
भारत को अपनी फर्टिलाइजर जरूरतों को पूरा करने के लिए हर महीने लगभग 2 मिलियन टन विभिन्न प्रकार के फर्टिलाइजर का आयात करना पड़ता है. देश फर्टिलाइजर इम्पोर्ट पर काफी निर्भर है, जिसमें लगभग 100 फीसदी निर्भरता इम्पोर्टेड म्यूरिएट ऑफ पोटाश पर है, जबकि डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के मामले में यह करीब 60 फीसदी है.
फर्टिलाइजर राजनीतिक और रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है. सरकार ने 2024-25 में फर्टिलाइजर सब्सिडी पर लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. इस वित्त वर्ष में भी सब्सिडी का खर्च बजट अनुमान से अधिक रहने की संभावना है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि यूरिया की लागत में 30 से 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है.
असली संकट यहां है
वैश्विक यूरिया एक्सपोर्ट का लगभग 35 फीसदी और सल्फर एक्सपोर्ट का करीब 45 फीसदी होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है, जो फर्टिलाइजर प्रोडक्शन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार फर्टिलाइजर सप्लाई में बाधा आने से आने वाले महीनों में ब्रेड, अंडा, मीट और पोल्ट्री जैसे खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हो सकती है.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इसके परिणाम 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए आक्रमण से पैदा हुए वैश्विक खाद्य संकट के बराबर या उससे भी अधिक गंभीर हो सकते हैं. आने वाले समय में गेहूं, मक्का और चावल जैसी फसलों पर भी इसका असर दिखाई दे सकता है और इनके दाम बढ़ सकते हैं. ऐसे में यह संकट केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया की रोटी पर भी संकट खड़ा कर सकता है.
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