Budget 2026: विकसित भारत के लिए इंफ्रा पर रिकॉर्ड खर्च का हो सकता है ऐलान, क्या पार होगा ₹11 लाख करोड़ का आंकड़ा?
पिछले कुछ सालों से सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिकॉर्ड कैपेक्स के जरिए ग्रोथ को रफ्तार देने की रणनीति पर काम कर रही है. बजट 2025-26 में 11.21 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक आवंटन के बाद अब बजट 2026-27 से भी इंफ्रा सेक्टर को बड़ी उम्मीदें हैं. सवाल यही है कि क्या इस बार कैपेक्स का नया रिकॉर्ड बनेगा और क्या इसका असली फायदा ग्रामीण भारत तक तेजी से पहुंचेगा?

Budget and Infrastructure Sector: पिछले केंद्रीय बजट यानी 2025-26 में सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर सबसे बड़ा दांव लगाया था. सरकार ने कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी कैपेक्स के लिए 11.21 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया था. यह बात केवल पिछले साल तक ही सीमित नहीं है, सरकार लगातार पिछले कुछ सालों से कैपेक्स इंफ्रा में बढ़ोतरी कर रही है. इस साल यानी बजट 2026-27 में भी सरकार अपने इस रिकॉर्ड को कायम रखते हुए नया मसौदा तैयार कर सकती है. इंफ्रा बजट में बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि ये रकम न सिर्फ देश की सड़कों, रेल, एयरपोर्ट और शहरी ढांचे को मजबूत करने के लिए है, बल्कि इसका असर रोजगार, निवेश और आर्थिक विकास पर भी पड़ता रहा है. सवाल यही है कि इस बड़े खर्च का असली फायदा ग्रामीण भारत तक कितनी तेजी से पहुंचेगा साथ ही क्या यह रिकॉर्ड इस बार भी बना रहेगा.
कैपेक्स क्या है और क्यों है अहम?
कैपिटल एक्सपेंडिचर वह सरकारी खर्च होता है जो लंबी अवधि की संपत्तियों जैसे सड़क, पुल, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट, बिजली, पानी और शहरी सुविधाओं के निर्माण में लगाया जाता है. बजट 2025-26 में कैपेक्स को 10 फीसदी बढ़ाकर 11.21 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया था. इससे पहले यानी वित्त वर्ष 2024-25 में सरकार ने 11.11 लाख करोड़ का लक्ष्य रखा था, लेकिन खर्च करीब 10.18 लाख करोड़ रुपये तक ही पहुंच पाया. इसके बावजूद सरकार लगातार इंफ्रा पर खर्च बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को गति देने की रणनीति पर कायम है. आगामी बजट यानी 2026-27 में भी इंफ्रा को लेकर बड़ी उम्मीदें हैं. अब 1 फरवरी, 2026 को बजट पेश होने वाला है. ऐसे में पहले की तरह ही तरह इस बार भी इंफ्रा से जुड़े सेक्टर को लेकर उम्मीदें बढ़ रही है.
कैसे-कैसे बढ़ा इंफ्रा का बजट?
अगर पिछले कुछ सालों को देखें तो इंफ्रा बजट में लगातार बढ़ोतरी आ रही है. बजट 2022-23 में सरकार ने तकरीबन 35 फीसदी की वृद्धि के साथ इंफ्रा में कैपिटल एक्सपेंडिचर 7.50 लाख रुपये कर दिया था. उसके अगले ही साल यानी बजट 2023-24 में इस सेक्टर को और बड़ा करते हुए 33 फीसदी तक बढ़ाया और इंफ्रा बजट को 10 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया गया था. इसके बाद यानी बजट 2024-25 में यह एलोकेशन और बढ़कर 11.11 लाख करोड़ रुपये हो गया. यह जीडीपी का 3.4 फीसदी हिस्सा है. आने वाले बजट यानी 2026-27 को लेकर उम्मीद जताई जा रही है कि वह 12 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर सकता है.
सड़क, हवाई कनेक्टिविटी और UDAN पर था फोकस
पिछले बजट में सरकार ने संशोधित UDAN योजना के जरिए हवाई यात्रा को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया था. इस योजना के तहत 120 नए रूट जोड़े गए जिससे अगले 10 वर्षों में करीब 4 करोड़ अतिरिक्त यात्रियों को फायदा मिलने की उम्मीद जताई गई थी. वहीं सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के बजट में भी इजाफा किया गया. 2025-26 के लिए इस मंत्रालय को 2.87 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का आवंटन मिला था. NHAI के बजट में भी बढ़ोतरी हुई है, जिससे राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार और रखरखाव तेज हुआ था.
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राज्यों को कितनी मिली मदद
पिछले साल के बजट यानी 2025-26 में सरकार ने राज्यों के लिए 1.5 लाख करोड़ रुपये का ब्याज-मुक्त कर्ज देने का ऐलान किया था, जिसकी अवधि 50 साल थी. इसका मकसद राज्यों को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स तेजी से पूरा करने में मदद करना है. इससे ग्रामीण इलाकों में सड़क, पानी, बिजली और कनेक्टिविटी जैसे बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की उम्मीद थी. सरकार ने 2025 से 2030 के लिए नई एसेट मोनेटाइजेशन योजना का भी ऐलान किया था, जिसके जरिए करीब 10 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया था. इस रकम का इस्तेमाल नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश के लिए किए जाने की बात कही गई थी. हालांकि इसके जरिए कितनी रकम जुटाई गई, उसका असल खुलासा इस बार के बजट में पता चलेगा.
इंफ्रा बजट को लेकर क्या हैं उम्मीदें?
बजट से इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को इस बार टैक्स से जुड़ी कई अहम स्पष्टताओं और राहत की उम्मीद है, जिससे निवेश का माहौल और मजबूत हो सके. Deloitte की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे बड़ी अपेक्षा यह है कि शेयर ट्रांसफर से जुड़े कंटिंजेंट कंसिडरेशन पर टैक्स को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाएं, ताकि प्रमोटर्स और निवेशकों पर अनिश्चित टैक्स बोझ न पड़े और टैक्स तभी लगे जब वास्तव में रकम प्राप्त हो. InvITs को लेकर भी सेक्टर चाहता है कि माइग्रेशन पर सभी तरह की एसेट ट्रांसफर को कैपिटल गेन टैक्स से राहत मिले, घाटे के कैरी फॉरवर्ड को सुरक्षित किया जाए और InvITs के मर्जर के लिए साफ रेगुलेटरी व टैक्स फ्रेमवर्क लाया जाए. वहीं, इंफ्रा प्रोजेक्ट्स में फंडिंग के लिए जरूरी कॉरपोरेट गारंटी पर 18 फीसदी GST को या तो कम किया जाए या इससे राहत दी जाए, ताकि प्रोजेक्ट्स की लागत घटे और निवेश आकर्षक बने.
वहीं, स्मॉलकेस की एक रिपोर्ट में इस बात पर उम्मीद जताई गई है कि सरकार की रणनीति कैपेक्स और रणनीतिक सेक्टर्स पर ही केंद्रित रहेगी. सर्वे के मुताबिक, पब्लिक कैपेक्स और लंबे समय में मल्टीप्लायर इफेक्ट के जरिए ग्रोथ को रफ्तार देने की सरकार की नीति जारी रह सकती है. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को उम्मीद है कि PLI जैसी योजनाओं के जरिए सरकार का सपोर्ट आगे भी बना रहेगा और घरेलू उत्पादन को मजबूती मिलती रहेगी. वहीं कंजम्प्शन और एग्रीकल्चर सेक्टर को लेकर यह संकेत मिलता है कि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नहीं, बल्कि चुनिंदा और टारगेटेड उपाय देखने को मिल सकते हैं.
ग्रामीण भारत को कितना फायदा?
हालांकि बजट में इंफ्रा पर भारी निवेश की बात कही गई, लेकिन असली परीक्षा ग्रामीण भारत में इसके असर की होती है. सड़क कनेक्टिविटी, जल जीवन मिशन के तहत हर घर तक नल का पानी, ग्रामीण आवास और बिजली जैसी योजनाओं से गांवों की तस्वीर बदलने की कोशिश की जाती रही है. जल जीवन मिशन के लिए फंड बढ़ाकर सरकार ने 100 फीसदी घरों तक पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य दोहराया था, जो ग्रामीण इलाकों के लिए बेहद जरूरी है. पिछले साल बजट में शिक्षा के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को बढ़ावा देने के लिए 500 करोड़ रुपये से सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने का ऐलान किया गया था. वहीं शहरी विकास के लिए 96,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, ताकि टिकाऊ और बेहतर शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा सके.
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