आजादी से उदारीकरण तक… ये हैं वो आम बजट जो देश में लाए बड़ा बदलाव

भारत में यूनियन बजट सिर्फ आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि देश की ग्रोथ का दिशा तय करने वाला ब्लूप्रिंट है. अब जबकि हम एक नए बजट की तरफ बढ़ रहे हैं, यह समझना जरूरी है कि किन बजटों ने भारत की इकोनॉमी को सबसे ज्यादा प्रभावित किया. आइए जानते हैं आजादी से लेकर उदारीकरण और आज के दौर तक वे 10 बजट, जिन्होंने भारत को बदल दिया.

आजादी से उदारीकरण तक… ये हैं वो आम बजट जो देश में लाए बड़ा बदलाव
26 नवंबर 1947 को RK शनमुखम चेट्टी ने भारत का पहला बजट पेश किया. इसमें रेवेन्यू 171.15 करोड़ और एक्सपेंडिचर 194.39 करोड़ अनुमानित था. देश विभाजन, हिंसा और शरणार्थी संकट की वजह से रक्षा खर्च 93 करोड़ रुपचे रखा गया था. यह बजट आजाद भारत की पहली वित्तीय योजना का आधार बना.
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वित्त वर्ष 1957-58 में टी.टी. कृष्णामाचारी ने पहली बार वेल्थ टैक्स लागू किया. यह टैक्स 5 लाख रुपये से अधिक संपत्ति रखने वालों पर लगाया गया. इसका मकसद अमीर-गरीब असमानता कम करना और विकास के लिए फंड जुटाना था. हालांकि, प्रशासनिक जटिलताओं को लेकर इसकी काफी आलोचना भी हुई.
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वित्त वर्ष 1973-74 के बजट को ‘ब्लैक बजट’ कहा गया क्योंकि Y.B. चव्हाण ने 550 करोड़ रुपये का भारी घाटा सामने रखा. उस समय तेल संकट और सूखे की दोहरी मार थी. बजट में बैंक राष्ट्रीयकरण और सब्सिडी जैसे कदमों को फंड किया गया, इसलिए इसे आर्थिक तनाव और घाटे का प्रतीक माना गया.
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वित्त वर्ष 1986-87 में वी.पी. सिंह ने इस बजट में MODVAT (Value-Added Tax का शुरुआती रूप) लागू किया, जिससे टैक्स क्रेडिट की सुविधा मिली. लाइसेंस राज की पकड़ ढीली की गई और टैक्स चोरी रोकने के लिए सख्त रेड्स भी चलाई गईं. इसे “Carrot एंड Stick Approach” कहा गया यानी प्रोत्साहन भी और दंड भी.
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वित्त वर्ष 1991-92 के बजट को डॉ. मनमोहन सिंह की प्रस्तुति वाला बजट आर्थिक संकट के बीच पेश किया गया. सरकार ने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए रुपये को 18 से 19 फीसदी तक डिवैल्यू किया, इंपोर्ट ड्यूटी 220 फीसदी से 150 फीसदी कर दी और लाइसेंस राज खत्म कर दिया. इसका नतीजा उदारीकरण, FDI और ग्लोबलाइजेशन की राह के रूप में सामने आया. इसलिए इसे “Epochal Budget” कहा गया.
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पी. चिदंबरम ने वित्त वर्ष 1997-98 के बजट में आम लोगों और कंपनियों पर टैक्स का बोझ कम किया. पीक पर्सनल टैक्स 40 फीसदी से 30 फीसदी किया गया, कॉरपोरेट टैक्स 35 फीसदी किया गया और Voluntary Disclosure Scheme शुरू की गई. इससे निवेश बढ़ा और अर्थव्यवस्था में सकारात्मक माहौल बना, इसलिए इसे “ड्रीम बजट” कहा गया. वित्त वर्ष 2000-01 के बजट को यशवंत सिन्हा ने पेश किया. उन्होंने कंप्यूटर ड्यूटी को आधा कर सीधे जीरो किया, IT एक्सपोर्ट को 2009 तक इनकम टैक्स फ्री किया और ई-कॉमर्स को प्रमोट किया. यह बजट भारत को IT हब बनाने और डिजिटल इकोनॉमी का बीज बोने में अहम साबित हुआ.
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वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने वित्त वर्ष 2003-04 के बजट में 75,000 करोड़ रुपये का बड़ा आवंटन किया. फोकस Golden Quadrilateral हाईवे, ग्रामीण सड़कें और शहरी सुधार योजनाओं पर था. यह बजट कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर को गति देने में मील का पत्थर बना. वित्त वर्ष 2017-18 में अरुण जेटली ने 92 साल बाद रेलवे बजट को मर्ज किया, जिससे फैसले तेज हुए. बजट में GST ट्रांजिशन, अफोर्डेबल हाउसिंग और 5 करोड़ गरीब परिवारों के लिए स्वास्थ्य योजना शामिल थी. यह प्रशासनिक सुधारों वाला बड़ा कदम था. वित्त वर्ष 2020-21 के बजट को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2 घंटे 42 मिनट के रिकॉर्ड भाषण में पेश किया. इसमें नया Exemption-Free Tax Regime, Vivad Se Vishwas डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन और 1.34 लाख करोड़ रुपये का आत्मनिर्भर भारत पैकेज शामिल किया गया. इसका मकसद COVID के झटके से अर्थव्यवस्था को संभालना था.
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