रुपये में गिरावट और टैरिफ के बीच भारत का बजट, निवेशकों को कैसे साधेंगी वित्त मंत्री सीतारमण; क्या आएंगे बड़े एलान
सरकार इस बजट में आम लोगों की खरीदारी बढ़ाने और रोजगार पैदा करने के उपाय भी कर सकती है. जानकारों का कहना है कि सरकार खर्च और बचत दोनों के बीच बैलेंस बनाए रखने की कोशिश करेगी. घरेलू मांग मजबूत करने और देश के भीतर प्रोडक्शन बढ़ाने पर खास ध्यान दिया जा सकता है.
Budget 2026: कुछ ही घंटों में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार नौवीं बार आम बजट पेश करने जा रही हैं. यह बजट इसलिए खास है क्योंकि दुनिया भर में हालात काफी अनिश्चित बने हुए हैं. अमेरिका के ऊंचे टैरिफ, मजबूत डॉलर, कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव निवेशकों को परेशान कर रहे हैं. वहीं भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था फिलहाल संतुलित स्थिति में मानी जा रही है. ऐसे माहौल में सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार निवेशकों को भरोसा कैसे दिलाएगी और विकास की रफ्तार कैसे बनाए रखेगी.
बजट से क्या उम्मीद कर रहा है बाजार
बाजार की कुल उम्मीदें फिलहाल बैलेंस मानी जा रही हैं. निवेशक किसी बहुत बड़े बदलाव की बजाय नीतियों में Continuity चाहते हैं. लेकिन एक अहम सवाल यह है कि सरकार अब इंफ्रास्ट्रक्चर पर खुद पैसा लगाने के साथ-साथ निजी कंपनियों को निवेश के लिए कैसे प्रोत्साहित करेगी. विदेशी निवेश के बाहर जाने और बाजार के उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे, इस पर भी नजर रहेगी.
वित्तीय घाटे को काबू में रखने की कोशिश
सरकार के लिए एक बड़ा टारगेट सरकारी खर्च और इनकम के बीच बैलेंस बनाए रखना है. एक्सपर्ट को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2025 में Fiscal deficit 4.9 फीसदी से नीचे रखा जाएगा और साल 2026 तक इसे 4.5 फीसदी के करीब लाने की योजना रहेगी. इसका मकसद अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनाए रखना है.
एक्सपर्ट का मानना है कि डिफेंस, सड़क, रेलवे, बिजली, सस्ता घर और मशीनरी जैसे सेक्टर में सरकारी खर्च बढ़ सकता है. अनुमान है कि कुल Capital expenditure 11 से 11.5 लाख करोड़ रुपये के बीच रह सकता है. यह पिछले साल से काफी ज्यादा होगा. इसका मकसद रोजगार बढ़ाना और निवेश को गति देना है.
खपत और नौकरियों पर जोर
सरकार इस बजट में आम लोगों की खरीदारी बढ़ाने और रोजगार पैदा करने के उपाय भी कर सकती है. जानकारों का कहना है कि सरकार खर्च और बचत दोनों के बीच बैलेंस बनाए रखने की कोशिश करेगी. घरेलू मांग मजबूत करने और देश के भीतर प्रोडक्शन बढ़ाने पर खास ध्यान दिया जा सकता है. आठवें वेतन आयोग से जुड़ी घोषणाओं की भी चर्चा है, हालांकि उसका बड़ा असर बाद के सालों में दिख सकता है.
सुधारों की रफ्तार बनी रह सकती है
सरकार आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और PLI जैसी योजनाओं को आगे भी जारी रख सकती है. इससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को और ताकत मिलने की उम्मीद है. कारोबार आसान बनाने के लिए कुछ प्रक्रियागत सुधार भी किए जा सकते हैं. बाजार को शांत रखने के लिए सरकार कुछ टैक्स से जुड़े फैसले कर सकती है. एक्सपर्ट का कहना है कि लंबे समय तक निवेश करने वालों को राहत देने वाले कदम आ सकते हैं.
ग्रामीण इलाकों और छोटे कारोबार को मदद
सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी दिक्कतें बड़ी चुनौती रहेंगी. जानकारों का कहना है कि आयात-निर्यात के नियम आसान बनाए जाने चाहिए ताकि कंपनियों को राहत मिले. कई टैक्स स्लैब और जटिल प्रक्रियाएं कारोबार को मुश्किल बनाती हैं. मुक्त व्यापार समझौतों का फायदा पूरी तरह नहीं मिल पाने की शिकायत भी सामने आती रही है.
खर्च और खपत के बीच बैलेंस जरूरी
सरकार को इस बात का ध्यान रखना होगा कि टैक्स से जुड़े ऐसे फैसले न हों जिससे बाजार में घबराहट फैले. साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बहुत ज्यादा कम भी न किया जाए, क्योंकि इससे विकास की रफ्तार पर असर पड़ सकता है. इस बजट को लेकर यह भी सवाल है कि क्या सरकार बड़े सुधारों की घोषणा करेगी या फिर चुनाव से पहले सतर्क रुख अपनाएगी.
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