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रतन टाटा के बुलावे पर Trusts से जुड़े डेरियस खंबाटा, अब दोबारा ट्रस्टी बनने से किया इनकार; चिट्ठी लिख बताई वजह

सीनियर वकील डेरियस खंबाटा ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट में दोबारा ट्रस्टी बनने से इनकार कर दिया है. उन्होंने 2 नवंबर को नोएल टाटा और CEO सिद्धार्थ शर्मा को लेटर लिखकर अपना फैसला बताया. रतन टाटा के निमंत्रण पर दोनों ट्रस्ट से जुड़े खंबाटा ने 17 सितंबर को टाट संस के बोर्ड में हुए फैसले पर भी सवाल उठाए.

टाटा ट्रस्ट

Highlights

  • डेरियस खंबाटा ने Tata Trusts के दोनों ट्रस्ट में दोबारा ट्रस्टी बनने से इनकार किया.
  • उन्होंने 17 सितंबर को Tata Sons के बोर्ड में हुए फैसले पर सवाल उठाए.
  • Harvard Law School से LLM कर चुके खंबाटा महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल भी रह चुके हैं.

Tata Trusts से जुड़े एक अहम घटनाक्रम में सीनियर वकील डेरियस खंबाटा ने दोबारा ट्रस्टी बनने से इनकार कर दिया है. वह सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) में अपनी मौजूदा जिम्मेदारी के बाद नया कार्यकाल नहीं लेंगे. 2 नवंबर को टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा और CEO सिद्धार्थ शर्मा को लिखे पत्र में उन्होंने इसकी जानकारी दी.

खंबाटा ने पत्र में बताया कि उन्होंने ये दोनों जिम्मेदारियां दिवंगत रतन टाटा के निमंत्रण पर स्वीकार की थीं. हालांकि, उन्होंने 17 सितंबर को Tata Sons के बोर्ड में हुए घटनाक्रम पर भी गंभीर सवाल उठाए. उनके इस फैसले को Tata Trusts और Tata Sons के बीच चल रहे मतभेदों के बीच अहम घटनाक्रम माना जा रहा है.

17 सितंबर के फैसले पर क्या बोले Darius Khambata?

दरअसल, 17 सितंबर को Tata Sons के बोर्ड ने 4-1 के वोट से एन चंद्रशेखरन को चेयरमैन बनाए रखने और कंपनी की लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया था. नोएल टाटा बोर्ड में इस फैसले के खिलाफ वोट करने वाले अकेले सदस्य थे. इस वोटिंग के बाद टाटा ट्रस्ट ने कहा था कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को मंजूरी देने वाला प्रस्ताव गैरकानूनी है.

CNBC-TV18 की रिपोर्ट के मुताबिक, खंबाटा ने अपने पत्र में इस फैसले पर सवाल उठाते हुए लिखा, “अगर रतन टाटा आज जीवित होते, तो क्या Tata Sons का बोर्ड 17 सितंबर को वैसा ही फैसला करता, जैसा उसने किया? बिल्कुल नहीं. लेकिन जिम्मेदारियां संस्थानों के प्रति होती हैं, किसी व्यक्ति के प्रति नहीं. जैसा कि Ratan Tata कहा करते थे, संस्था हमेशा व्यक्ति से बड़ी होती है.”

खंबाटा ने यह भी कहा कि ट्रस्टी के तौर पर दोबारा नियुक्ति के लिए बाकी ट्रस्टियों की सर्वसम्मति जरूरी होती है. उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ मौकों पर उनके विचार दूसरे ट्रस्टियों, जिनमें नोएल टाटा भी शामिल हैं, से अलग रहे हैं. सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट में खंबाटा का कार्यकाल 9 नवंबर 2026 को खत्म होने वाला है. वहीं, सर रतन टाटा ट्रस्ट में उनका कार्यकाल भी इसी महीने समाप्त होने जा रहा है.

कौन हैं ये ?

डेरियस खंबाटा देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील हैं. वह सुप्रीम कोर्ट, बॉम्बे हाई कोर्ट और देश के कई दूसरे हाई कोर्ट और ट्रिब्यूनल में वकालत करते हैं. Bahrain Chamber for Dispute Resolution (BCDR) के मुताबिक, वह मुंबई में अपने चैंबर के जरिए प्रैक्टिस करते हैं. इसके अलावा वह लंदन के One Essex Court से भी जुड़े हैं.

खंबाटा ने Harvard Law School से Master of Laws (LLM) की डिग्री हासिल की है. उनका कानूनी करियर संवैधानिक मामलों, कॉरपोरेट और कमर्शियल विवादों के साथ-साथ भारत और विदेशों में होने वाली कमर्शियल मध्यस्थता से जुड़ा रहा है.

महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल भी रह चुके हैं

डेरियस खंबाटा महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल के पद पर 2012 से 2014 तक रहे. इससे पहले वह तीन साल तक भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के तौर पर भी काम कर चुके हैं. अपने लंबे कानूनी करियर के दौरान उन्होंने कई अहम संवैधानिक, कॉरपोरेट और कमर्शियल मामलों में पक्ष रखा है. इसके अलावा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल आर्बिट्रेशन यानी मध्यस्थता से जुड़े मामलों में भी उनका अनुभव रहा है.

कानूनी क्षेत्र में मिले कई सम्मान

कानूनी क्षेत्र में योगदान के लिए खंबाटा को कई पुरस्कार और सम्मान मिले हैं. उन्हें 2014 में कानून के क्षेत्र में Arya Chanakya Puraskar दिया गया था. 2017 में Legal Era ने उन्हें Senior Counsel of the Year चुना. वहीं, 2019 में Bar Association of India ने उन्हें Living Legend of Law पुरस्कार से सम्मानित किया.

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