GST सुधार पर विपक्षी राज्यों का हल्ला, 2 लाख करोड़ तक नुकसान का दावा; पांच साल मुआवजे की मांग
विपक्ष शासित राज्यों ने केंद्र के जीएसटी सुधार प्रस्ताव पर चिंता जताई है. उनका कहना है कि दरों में बदलाव से 1.5 से 2 लाख करोड़ रुपये तक का राजस्व नुकसान हो सकता है. आठ राज्यों ने केंद्र से अगले पांच साल तक मुआवजा देने की मांग की है. उनका तर्क है कि दरें घटने से शुद्ध कर दर 10 फीसदी रह जाएगी जिससे राज्यों को 15-20 फीसदी तक नुकसान होगा. उन्होंने कहा कि विकास और जनता पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा.

देश में जीएसटी दरों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. विपक्ष शासित राज्यों ने केंद्र के प्रस्ताव पर गंभीर चिंता जताई है. इन राज्यों का कहना है कि दरों में बदलाव से उन्हें भारी राजस्व नुकसान होगा. उनका अनुमान है कि यह नुकसान 1.5 लाख करोड़ से 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. ऐसे में उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि इस घाटे की पूरी भरपाई की जाए. इन राज्यों का कहना है कि अगर राजस्व में गिरावट हुई तो विकास कार्य और जनता पर असर पड़ेगा.
राज्यों को 15 से 20 फीसदी तक नुकसान की आशंका
आठ राज्यों हिमाचल प्रदेश झारखंड कर्नाटक केरल पंजाब तमिलनाडु तेलंगाना और पश्चिम बंगाल ने कहा है कि नए प्रस्ताव से उनके जीएसटी राजस्व में 15 से 20 फीसदी तक की कमी आ सकती है. कर्नाटक के वित्त मंत्री कृष्ण बायरे गौड़ा ने कहा कि जीएसटी में इतनी बड़ी गिरावट राज्यों की वित्तीय स्थिति को अस्थिर कर देगी. इसलिए केंद्र को अगले पांच साल तक मुआवजा देना चाहिए ताकि राज्यों की आय स्थिर रह सके.
दरों में कटौती से घटेगी शुद्ध कर दर
केंद्र ने प्रस्ताव दिया है कि जीएसटी ढांचे को सरल बनाकर दो स्लैब कर दिया जाए. इसमें पांच फीसदी और 18 फीसदी दर होगी जबकि विलासिता और अहितकर वस्तुओं पर 40 फीसदी कर लगेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे शुद्ध कर दर घटकर 10 फीसदी रह जाएगी. पहले जब जीएसटी लागू हुआ था तब राजस्व तटस्थ दर 14.4 फीसदी थी जो अब घटकर 11 फीसदी रह गई है.
विपक्षी राज्यों ने रखी अतिरिक्त मांगें
विपक्ष शासित राज्यों ने यह भी कहा है कि 40 फीसदी कर से मिलने वाली आय राज्यों में बांटी जानी चाहिए. पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि दरों को युक्तिसंगत बनाने का फायदा आम जनता तक पहुंचे इसके लिए मुनाफाखोरी रोकने की व्यवस्था बननी चाहिए. हिमाचल प्रदेश के मंत्री राजेश धर्माणी ने भी कहा कि दरों में बदलाव तो स्वीकार है लेकिन इसके बदले राज्यों को भरपाई मिलनी चाहिए.
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आधार वर्ष पर भी विवाद
राज्यों ने यह भी मांग की है कि राजस्व संरक्षण की गणना के लिए आधार वर्ष 2024-25 तय किया जाए. उनका कहना है कि अगर यह प्रावधान लागू होता है तो उनके नुकसान की सही भरपाई हो सकेगी. उन्होंने साफ किया है कि दरों में बदलाव के साथ राजस्व हितों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है वरना राज्यों की स्वायत्तता और विकास दोनों पर असर पड़ेगा.
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