₹5 और बढ़ानी पड़ सकती है पेट्रोल-डीजल की कीमत, OMCs कंपनियों को क्या हो रही है दिक्कत?
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और पश्चिम एशिया संकट के चलते सरकारी तेल कंपनियां अब भी भारी घाटे में हैं. पेट्रोल पर ₹5.5 और डीजल पर ₹4.5 प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी हो रही है. ऐसे में पेट्रोल-डीजल के दाम ₹5 प्रति लीटर तक और बढ़ सकते हैं.
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पिछले तीन हफ्तों के दौरान करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) अभी भी भारी नुकसान झेल रही हैं. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा हालात में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 5 रुपये प्रति लीटर और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक OMCs को पेट्रोल पर करीब 5.5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 4.5 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है.
सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, LPG और ATF पर भी दबाव
रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि एलपीजी (LPG) पर अंडर-रिकवरी अभी भी करीब 680 रुपये प्रति सिलेंडर बनी हुई है. वहीं एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) पर कंपनियों को लगभग 93 करोड़ रुपये प्रतिदिन का नुकसान हो रहा है.
महंगाई बढ़ने का खतरा
इसके अलावा रेटिंग एजेंसी Crisil ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं और OMCs घाटा कम करने की कोशिश जारी रखती हैं, तो पेट्रोल-डीजल की कुल कीमतों में बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच सकती है.
Crisil के अनुसार, पेट्रोल और डीजल में 7.5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी से उपभोक्ता महंगाई (Consumer Inflation) में लगभग 36 बेसिस पॉइंट्स का असर पड़ सकता है. वहीं अगर कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचती है, तो महंगाई पर इसका प्रभाव 48 बेसिस पॉइंट्स तक हो सकता है.
खाने-पीने की चीजें भी हो सकती हैं महंगी
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कुल लॉजिस्टिक्स लागत में माल ढुलाई (Freight Transport) की हिस्सेदारी 54% है, जबकि कुल माल परिवहन का लगभग 71% हिस्सा सड़क मार्ग से होता है. सड़क परिवहन लागत में अकेले ईंधन की हिस्सेदारी करीब 42% है. ऐसे में ईंधन महंगा होने का सीधा असर सप्लाई चेन और वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है.
Crisil का कहना है कि डेयरी उत्पाद, फल, दालें, मसाले, चाय, कॉफी, अंडे, मांस और मछली जैसी कैटेगरी में कीमतों का दबाव बढ़ सकता है क्योंकि बढ़ी हुई ढुलाई लागत आखिरकार उपभोक्ताओं तक पहुंचती है.
कच्चे तेल की कीमतें बनी हुई हैं ऊंची
इसके अलावा चालू वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 112 डॉलर प्रति बैरल रही है. यह Crisil के पूरे साल के बेस-केस अनुमान 95 डॉलर प्रति बैरल से काफी अधिक है. ऐसे में पेट्रोल-डीजल की हालिया बढ़ोतरी के बावजूद तेल कंपनियों का घाटा जारी है. आने वाले हफ्तों में तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति, महंगाई और आम उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले असर को लेकर बहस और तेज हो सकती है.
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